
मैं तेरे गर्भ में पली हूँ माँ..
नौ माह फिर बरस बीस..
खुद का जीवन गुजरने निमित्त..
हक क्यूँ नहीं है मुझे..
फैसले लेने का..?
गया कहाँ लाड-दुलार तुम्हारा..?
लिया जो कोई फैसला गर मैंने कहीं..
अपने फैसले संग..
आज पड़ी हूँ मिटटी पर..
मिटटी बन जाने निमित्त..
कहाँ हैं तेरी वे लोरियाँ..?
क्यूँ झूठ कहा तुमने..?
क्यूँ ख़त्म करी तूने..
इहलीला मेरी..?
दिल भी न पसीजा तेरा..
क्यूँ आते हैं माईक-मीडिया वाले..?
क्यूँ नाम धरा ऑनर-किलिंग इसका..?
छोटे चोर को तुम चोर कहते..
फिर क्यूँ होता है फर्क हत्या-हत्या में..?
हत्या का दोषी हत्यारा है..
क्यूँ पाता मुझ मासूम का दोषी..
किलिंग संग ऑनर भी..?
मारी जाती थी मैं गर्भ में..
अब भी बात वही है..
पहले गर्भ में, अब मारी जाती हूँ बाहर भी..
जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 05 जुलाई 2010_04:53 pm )
▬► पारिवारिक ईज्ज़त के ढकोसले के नाम पर सजातीय व विजातीय विवाहों की परिणिति वीभत्स हत्या के रूप में होती है ! मीडिया भी अपनी सही भूमिका भूल कर इसे "ऑनर-किलिंग" जैसा नाम दे देता है ! क्यूँ भाई इसमें ऑनर जैसी क्या बात है ! जैसे बड़ा कारनामा है यह !
▬► अरे जब चोर को चोर और पॉकेटमार को पॉकेटमार कहते हैं तो इन हत्याओं के दोषियों को सम्मान-ज़नक उपमान क्युओ..? इनका इन्तर्विएव लिया जाता है जैसे कितना बड़ा कारनामा कर आये हों !
▬► पुलिस दाम लेकर इनका ऑनर कर देती है, बदले में प्रेरणा पाकर ये या कोई नया ऑनर-होल्डर फिर एक नया कारनामे को अंजाम दे आते हैं !
▬► कब तक होगा यह सब..? कब तक क़ानून हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा..?
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