निर्झरण से झरण की ओर ::: ©


► निर्झरण से झरण की ओर ::: ©

समय का बहाव, पवन का प्रवाह,
सख्त भौंथरी चट्टान,
अब तीखे नक्श पाने लगी है,

न चाहते हुए भी,
मन का खुद को बरगलाना,
जैसे पानी का बर्फ बन,
चट्टान के भ्रम संग,
खुद को बरगलाना,

वक्ती थपेड़े पड़े हैं मगर,
आज नहीं कल ही सही,
बदलेगा प्रारब्ध मेरा भी,

क्षण-भंगुर हो,
भटक-चटक रही है,
चंचलता-कोमलता, मेरे मन की,
पिघल-बहाल हो रही है,
जैसे बर्फ की मानिंद,

अब और भी करनी है,
मेहनत करारी,
नयी भावुकता है,
नयी दुनियावी सोच है,
खा गए सोच पुरानी को,
मिल सारे दानव कलयुगी,

परन्तु अंत संग उदय भी है,
आँखें मूंदे नहीं दिखेगा,
मिंचमिंचाते ही सही,
खोल पपोटे देखा मैंने,
सामने है तैयार खड़ा,
मेरे स्वागत को आतुर,
सप्त-रंगी इन्द्रधनुष,
नयी आभा है प्रकाश नया,
गमन है मेरा,
निर्झरण की बर्फ से झरण की ओर..!!

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 13 अक्टूबर 2010 )


.
निर्झरण से झरण की ओर ::: ©SocialTwist Tell-a-Friend

बेचारा सतयुग

.
एक विचार ► 
कलयुग में सात्विक शक्तियां क्षीण हो रही हैं , यहाँ चलते रहो निरंतर जैसी बात में हर क़दम पर एक अच्छी चीज़ कम होती चली जाती है.. आसुरी प्रभाव उत्पादक दौर से गुजर रहा है.. सद्गुणों को बचाए रखना उतना ही कठिन जतन हो गया है जितना कि सूखी रेत को ढीली मुट्ठी में सम्हाले रखना.. सतयुग का समानता का अनुपात अब डगमगा गया है.. एक के अनुपात में सौ हैं..

एक के साथ एक-दो हैं , तो वहीं सौ के साथ हजारों हैं.. तामसी से बचने के लिए उसी की छात्र-छाया दिखाई देने लगी है.. बेचारा सतयुग जाये तो जाये कहाँ ? 
► ...जोगी... :(

.
बेचारा सतयुगSocialTwist Tell-a-Friend

भाषाई मर्यादा

 .
 
► एक  विचार
► "सत्यम् वदम् - प्रियं वदम् , न वदम् - सत्यम् अप्रियम्" संस्कृत में कही इस बात से अच्छी बात और कोई नहीं ,,, क्योंकि भाषाई गन्दगी कितनी दूर तक असर डाल सकती है इसका कभी कभी अंदाज़ा तक नहीं लग पाता ... अक्सर बाद में उसे फ़ैलाने वाले भी उसके लपेटे में आ जाते हैं ... बेहतर है कि भाषाई सभ्यता और मर्यादा का भान और मान भी रखा जाये...
 
► जोगी... :)


.
भाषाई मर्यादाSocialTwist Tell-a-Friend

काँटा और गुहार :: ©


Photography by : Jogendra Singh

_____________________________________

काँटा और गुहार :: © ( क्षणिका )


आसान नहीं है ...
पाँव से काँटा निकाल देना ...
हाथ बंधे हैं पीछे और ...
उसी ने बिखेरे थे यह कांटे ...
निकालने की जिससे ...
हमने करी गुहार है ...


जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 02 अक्टूबर 2010 )

_____________________________________
काँटा और गुहार :: ©SocialTwist Tell-a-Friend

कल रात सागर से :: ©


कल रात सागर से उठती-गिरती लहरें...
प्रबलतम वेग से अपनी तीव्रता का अहसास करा रही थीं...
उसी तीव्रता से तुम भी मेरे ख्यालों में थीं...
सोच रहा हूँ काश, खयाल ही जीने का जरिया हुआ करते...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 01 अक्टूबर 2010 )

.
कल रात सागर से :: ©SocialTwist Tell-a-Friend
Related Posts with Thumbnails