तुम्हारा अहसास
Wednesday, 3 August 2011
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कविता कोष
● तुम्हारा अहसास ● Copyright ©
क़दमों के साथ मेरे, चले थे कदम मिलकर,
कुछ दूर जाकर देखा तो पाया,
अब भी कुछ दूरी पर थे वे कदम,
मेरे शब्दों के साथ, वाक्य बने थे शब्द मिलकर,
कुछ वक्त गुजरने पर देखा तो पाया,
खुद में सिमटकर सिकुड़ता मैंने उन शब्दों को,
साथ हैं हम, कुछ भ्रम सा लेकिन बना है,
कुछ आगे जाकर देखा तो पाया,
काल्पनिक महल सा हमारे इस नाते को,
कहने को कह लेता सब, तुमसे मिलकर,
कुछ सोच नयी सी आयी तो पाया,
श्रेयस्कर है कुछ न कहना अब तुमसे,
जड़ता तुम्हारी संज्ञाशून्यता से भरी,
रंग उसमें भरने गया तो पाया,
पड़ चुकी इक आदत सी है तुम्हें इसकी,
बेबस, पलकों के नीचे से तुम्हें तकता रहा,
जानने की कोशिश में तुम्हें, मैंने पाया,
जिन्दा आँखों के पीछे बनी मूरत इक पत्थर की,
ओंठ सिल लिए, मूँद ली मैंने पलकें अपनी,
जो खोल कर पलकों को देखा तो पाया,
मेरी ओर तकता हुआ बेबस निगाहों से तुम्हें..!!
● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 03-08-2011 )
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भीड़ में अकेला....
Saturday, 2 July 2011
- By Unknown
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● भीड़ में अकेला....
● कैसा लगता है जब आपके चारों ओर जमघट लगा हो और तब भी आप अपने आप को पूर्णतया अकेला पाते हैं.....? जिन्हें अपना समझ रहे हों उन्हें अजनबी पाना , सच बड़ा पीड़ादायक होता है..... आसान नहीं है इस अहसास या इस नकली भीड़ के साथ जीना.....
● हाँ आज थोडा सा अपसेट हूँ..... या शायद थोडा सा और.....
● हाँ आज थोडा सा अपसेट हूँ..... या शायद थोडा सा और.....
● जोगी :( ( 02-07-2011 )
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तुम्हारा भ्रम..
Friday, 1 July 2011
- By Unknown
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● तुम्हारा भ्रम.. ● Copyright ©
ना सही,
तुम पास मगर,
तुम्हारा भ्रम सही,
सूखे फूलों से,
हम तुम्हारी,
खुशबू पा लेते हैं,
तुम ना सही,
तुम्हारा अहसास पाकर,
जिन्दा रह लेते हैं,
तनहा सही,
महफ़िल में हम,
तुम्हारे तसव्वुर से,
जश्न-ऐ-ज़दा हो लेते हैं...
● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 01-07-2011 )
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वीराने..
- By Unknown
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● वीराने.. ● Copyright ©
नहीं चल रहा कुछ,
दिल के इन वीरानों में,
कि भला खंडहर भी,
कब से कहीं बसने लगे ?
वो तो हो लेती है,
कुछ गुफ्तगू तुमसे,
वरना,
चमगादड भी है कहाँ,
नसीब में,
इन वीरानों को..
● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 30-06-2011 )
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