● तुम्हारा अहसास ● Copyright ©
क़दमों के साथ मेरे, चले थे कदम मिलकर,
कुछ दूर जाकर देखा तो पाया,
अब भी कुछ दूरी पर थे वे कदम,
मेरे शब्दों के साथ, वाक्य बने थे शब्द मिलकर,
कुछ वक्त गुजरने पर देखा तो पाया,
खुद में सिमटकर सिकुड़ता मैंने उन शब्दों को,
साथ हैं हम, कुछ भ्रम सा लेकिन बना है,
कुछ आगे जाकर देखा तो पाया,
काल्पनिक महल सा हमारे इस नाते को,
कहने को कह लेता सब, तुमसे मिलकर,
कुछ सोच नयी सी आयी तो पाया,
श्रेयस्कर है कुछ न कहना अब तुमसे,
जड़ता तुम्हारी संज्ञाशून्यता से भरी,
रंग उसमें भरने गया तो पाया,
पड़ चुकी इक आदत सी है तुम्हें इसकी,
बेबस, पलकों के नीचे से तुम्हें तकता रहा,
जानने की कोशिश में तुम्हें, मैंने पाया,
जिन्दा आँखों के पीछे बनी मूरत इक पत्थर की,
ओंठ सिल लिए, मूँद ली मैंने पलकें अपनी,
जो खोल कर पलकों को देखा तो पाया,
मेरी ओर तकता हुआ बेबस निगाहों से तुम्हें..!!
● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 03-08-2011 )
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