
पीते हैं वे दर्द भागने को, मैं पीता हूँ दर्द बुलाने को..
फर्क बस नाम ही का है, अंजामे दिल जुदा नहीं होता..
_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 29 मई 2010_04:50 pm )
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Jogendra Singh ~ जोगेंद्र सिंह..

गूँज उठी..
चिर-प्रतीक्षित कुहुक..
घुल गया शहद सा..
अरसे से भूली कुहुक..
हुलरा गया फिर सुनना तुम्हें..
याद है मुझे..
अपना बचपन..
अमराई के आते बौरों संग..
आता कोकिल स्वर तुम्हारा..
इस डाल तो कभी उस डाल..
स्वादु संगीत सा..
आता तुम्हारा स्वर..
और तुम...!!
डाली-डाली फुदक-फुदक..
नन्हे बालकों मध्य..
करती संगीत समारोह अपना..
सुर में तुम्हारे सुर मिलाते..
कुहू-कुहू करते बच्चे..
यही प्रसंशा थी शायद..
हाँ.. याद है मुझे..
मंद होता नीलाभ आकाश..
धूप चढ़े..
आरोह-अवरोह इक संग..
चमक सह..
मंदित होती नीली आभा..
मुन्दित पलकों की झिर्री से..
दीठ पड़तीं कृष्ण वर्णी तुम..
कौए और तुम में कभी फर्क न मिला..
पीछा किया सदैव कुहुक का..
दो-फुटी ऊंची मेंड खेत की..
दौड़-भाग अंतिम किनारे तक..
था डेरा वहीँ तुम्हारा..
अबके बौर ना आया..
तुम कैसे आती..
रत प्रतीक्षा में तुम्हारी..
सूने खलिहान..
सूनी हैं बागिया..
न थीं तुम शहर में..
गाँव भी अब तरसे..
बिन मिले कुहुक से..
कैसे पकेंगे आम..
कि अब स्वाद नहीं..
बेस्वाद हैं आम..
_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 26 मई 2010_05:00 pm )
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