अंजाम-ए-दिल




 पीते हैं वे दर्द भागने को, मैं पीता हूँ दर्द बुलाने को..
फर्क बस नाम ही का है, अंजामे दिल जुदा नहीं होता..




_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 29 मई 2010_04:50 pm )





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बेवफाई

Bevafai (JPEG)


उन्हें भेजे थे कुछ गुलाब,
नज़रें इनायत हों इस चाहत में..
वापस लौटा गए मेरी देहरी पर,
वो उन चाहत के फूलों को..
है बेवफाई तुम्हारी, पर..
हमने इसे नज़रें करम समझा..
आज तक सहेजे बैठे है,
कि सूखे फूलों में अब खुशबु तुम्हारी है..

_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 28 मई 2010_05:49 pm )
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विरासत

Virasat (JPEG)
मेरी शर्ट का बटन तो लगा देना..
रुमाल, घडी या कुछ इसी तरह..
दिन की शुरुआत..
ऊंह.. घडी होना..!
यह भी एक सम्भावना है..
एक आम.. कुछ ज्यादा ही आम घर..
वही दो कमरे का घर.. टूटी चारपाई..
रस्सी बंधी कुर्सी की टांग..
टूटे-फूटे से तीन चार बच्चे..
दो-तीन साडी में गुज़र करती..
खुद को आया सा समझती माँ..
वे जानते ज़रूर हैं प्यार को..
पर मतलब समझने की फुर्सत ही किसे है..
फूँकनी से चूल्हे में फूँक मारते-मारते..
गैस तक का सफ़र जाने कब तय हुआ..
इस पर ध्यान किसी का न गया होगा..
घर से दफ्तर.. दफ्तर से घर..
अपने लिए कैसे जीना है..
यह समझ सीमाओं से परे की कौड़ी है..
काँय-किलबिल करते बच्चे..
हर रोज़ ठुकते बच्चे..
रोटी के टुकड़े पर भी लड़ जाते..
पानी वाली वाली चाय सभी को..
निपनिया दूध छोटे बेटे को..
ज़िम्मेदारी समझ..
बहनें इसे अपने हाथ से निभातीं..
दही एक कटोरी पानी में..
एक-एक चम्मच बँट जाता..
फोड़-फोड़ दाने दही के..
हो जाता पानी सफ़ेद शक्कर मिला..
खा जाते उससे रोटी सारी..
सब चाहें सुन्दर बेटी उसकी..
पर घर की ज़ीनत कोई न करता..
अपने से नीचा बेटी संग..
घर अपना भर लेना चाहे..
अंत समय बिस्तर पर बीते..
खाँसी बलगम जाने क्या क्या..
एक तरफ कौने में खड़ा..
रो रहा.. पा रहा बेटा..
शर्ट, बटन,रुमाल, घडी की विरासत..

_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" (27 मई 2010_ 02:30 am )
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चिर-प्रतीक्षित कुहुक

Chir Pratikshit Kuhuk (JPEG)

गूँज उठी..
चिर-प्रतीक्षित कुहुक..
घुल गया शहद सा..
अरसे से भूली कुहुक..
हुलरा गया फिर सुनना तुम्हें..
याद है मुझे..
अपना बचपन..
अमराई के आते बौरों संग..
आता कोकिल स्वर तुम्हारा..
इस डाल तो कभी उस डाल..
स्वादु संगीत सा..
आता तुम्हारा स्वर..
और तुम...!!
डाली-डाली फुदक-फुदक..
नन्हे बालकों मध्य..
करती संगीत समारोह अपना..
सुर में तुम्हारे सुर मिलाते..
कुहू-कुहू करते बच्चे..
यही प्रसंशा थी शायद..
हाँ.. याद है मुझे..
मंद होता नीलाभ आकाश..
धूप चढ़े..
आरोह-अवरोह इक संग..
चमक सह..
मंदित होती नीली आभा..
मुन्दित पलकों की झिर्री से..
दीठ पड़तीं कृष्ण वर्णी तुम..
कौए और तुम में कभी फर्क न मिला..
पीछा किया सदैव कुहुक का..
दो-फुटी ऊंची मेंड खेत की..
दौड़-भाग अंतिम किनारे तक..
था डेरा वहीँ तुम्हारा..
अबके बौर ना आया..
तुम कैसे आती..
रत प्रतीक्षा में तुम्हारी..
सूने खलिहान..
सूनी हैं बागिया..
न थीं तुम शहर में..
गाँव भी अब तरसे..
बिन मिले कुहुक से..
कैसे पकेंगे आम..
कि अब स्वाद नहीं..
बेस्वाद हैं आम..


_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 26 मई 2010_05:00 pm )

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मुस्कराहट

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जाने क्यूँ पसंद है हमें... तेरे होटों की प्यार भरी मुस्कराहट...
जी कर चाहे ना सही.. मर कर ही सही.. तेरे आँसू की एक मुस्कराहट दे दे..

_____जोगेंद्र सिंह "Jogendra Singh" ( 24 मई 2010_10:04 pm )

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