ये मेरी उदासी



ये मेरी उदासी ● ©

मन के कोने में जा बसी, खामोश सी उदासी,
ह्रदय की देहलीज पर, टहलती सी उदासी,
बाग के कोने में, पतझड़ के पत्ते सी उदासी,
बगिया की सूनी, अबोली चहक सी उदासी ||

तुम्हारे चहरे पर, बरसते मातम सी उदासी,
जोकर की मुस्कान के पीछे झांकती सी उदासी,
तो कभी खोने के मातम तले दबी सी उदासी,
रूखे चुप बेजुबान चेहरे से झांकती सी उदासी ||

काँच की बनी कंचियों सी, लुढकती सी उदासी,
तो कभी मन के विद्रोह जैसी, होती चली उदासी,
असमंजस से उपजी, पीड़ा सी दिखती उदासी,
तो है कभी हाथ आये, फिसले सपने सी उदासी ||

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (30-11-2011)
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● बुतपरस्त ●

चोट दी थी जिस पत्थर से कभी,
उसी पत्थर से बने बुत की,
कर रहे हैं आज वो बुतपरस्ती,
कि बुत से बनी वो शक्ल हमारी थी...

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (जोगी) (23-11-2011)

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सही या गलत


Question Baba

किसी एक पक्ष के कह देने मात्र से कोई चीज़ सही या गलत नहीं बन जाती........... वरन उसके सही या गलत साबित होने के पीछे कई करक एक साथ काम करेंगे......... और ये बात भी है कि जिसे हम सही समझ रहे हैं वाही सही हो ये जरुरी तो नहीं........ व्यावहारिक रूप में एक आदर्श सही स्थिति मानी सकती है और उसके जो जितना करीब होगा उतना ही उसका सोचना भी सही होगा.....

लेकिन इसे तय कैसे करें , समस्या यही है........... ● जोगी 
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"इन्सान" आज इन्सान सा नहीं रह गया है

"इन्सान" आज इन्सान सा नहीं रह गया है |

● कितने हैं जो इस बात में यकीन कर सकते हैं कि उनकी मानसिक बनावट उस पुराने वाले असली इन्सान की सी रह गयी है ? देखा जाये तो वर्तमान में हमारी प्राथमिकतायें समाज और जातिवादी सोच से कहीं आगे निकलकर दुनियावी संबंधों और जरूरतों तक सिमटकर रह गयी हैं | बहुत हद तक हम व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठते नहीं दिखाई देते | इतने मतलब-परस्त कब से होने लग पड़े हम ? वो उज्जड एवं उग्र सोच वाला इन्सान जिसे उसके बदले स्वरुप को देख दर्शक भयंकर की संज्ञा दे दिया करते थे और जिसे हरसंभव मददगार के तौर पर भी देखा जाता था, कहाँ है वह इन्सान ?

● हाँ , मानसिक और बौद्धिक रूप में भी कहीं न कहीं हम अजीब सी कशमकश में घिरे नजर आते हैं | क्यूँ है ऐसा कि अब हमें अपने होने का भान कराने की आवश्यकता भी प्रतीत होने लगी है ?

● क्या किसी के पास इसका जवाब है...?

_____ जोगेंद्र सिंह (21-10--2011)

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सूरत और सीरत



● सूरत और सीरत

काहे पड़े तुम सूरत सीरत की माया में ?
न फरक मिले , मिले फरक तो क्या ?
अरे कहते हम तुम खाते नाहक ही धोखा,
क्यूँ हो खाते तुम धोखा जब दीदे पायें तुमने चार ?
चेहरे पे दो , दो दिल में बसाये बैठे हो,
क्या न होगा बेहतर खोल के मन की आँख,
कर लेते अंतर दूर , बीच से सीरत और सूरत के...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (14-10-2011)

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