मिन्नतें..



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गुजर गया जीवन सारा,
मिन्नतें करते,
न मिलना था,
न मिल सका कुछ कभी हमें,

वो तो तुम थे,
जो आये इस जीवन में,
बन बहार का अहसास,

वरना गुजर लिया था,
ठोकरें खाते,
मेरा यह जीवन सारा..

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (27-06-2011)

Photography by :- Jogendra Singh
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बिन तेरे..


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बात जाती है तो जाने दो उसे दूर तलक,

इसी बहाने हो जायेगी कुछ गुफ्तगू हमारी,

क्या जाने इन्ही के सहारे कट जाये ये जिंदगी,

कि बिन इसके भी है अब गुजर चुकी सी जिंदगी...


● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (26-06-2011)

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कविता बकना आसान नहीं



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उनकी "छवि" ने आकर कहा हमसे,
बक डालो फिर एक कविता नयी,
हम बोले कविता बकना आसान नहीं,
ये कोई पीकदान नहीं कि खाया हर बार,
और उगलकर तुम्हारे नाम कर दिया........ जोगी......... :)


Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह ( 21 May at 01:34 )


यहाँ एक झोल है दोस्तों......
ना तो पीकदान खाया जा सकता है और ना ही पानदान..........
खाते केवल पान ही हैं..... असल में पूरा मतलब यूँ है कि ये कोई पीकदान नहीं है , कि हर बार खाकर , उसमें उगलकर , उगला हुआ तुम्हारे नाम कर दिया जाये.........
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● अभी कल (21 May at 01:31am) किसी दोस्त ने मुझसे पूछा कि रात के इस वक्त कविता लिखते हो क्या...?
● मैंने ज़वाब दिया "नहीं दोस्त..... कविता मैंने कभी लिखने के लिए नहीं लिखी..... वो तो अपने आप निकल आती है....... समय नहीं देखती...... "
● तो मुझसे कहा गया कि एक कविता बोलूं..... साथ ही सोचने तक का समय दिए बगैर यही बात रिपिटेशन मोड में डाल दी कि कविता तो अपने आप निकल आती है ना.....
● इस पर मैंने 21 May at 01:34am पर ये ऊपर वाली कविता लिख दी और उसके बाद जवाब में कहा "तुमने बोला लिखो तो मैंने लिख दी........ और ऊपर से तुमने समय देने की इच्छा नहीं थीं......... क्या करता यही लिख मारी तुम्हारी ओर........... "
● मजे की बात यह कि इसे लिखने में कुल तीन मिनट लगे थे जिसमें भी कुछ समय तो ध्यान भटका हुआ था.....
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चित्रलेखा



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छूने चली सितारों को देखो आसमान तक,
चित्रलेखा बन सजायी लकीर मन्दाकिनी से,
वक्ती चिंता है यह जिसे आँखों में सजाये हो,
गम न करो जल्द इससे पार पा जाओगी,
दूर नहीं है कोई आसमान अब तुम्हारे लिए..!!


● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (17-05-2011)
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मुस्कुराने की कोशिश



: मुस्कुराने की कोशिश :

मुस्कुराने की कोशिश में कुछ बिखरे न बिखरे मेरे दो ओंठ बिफरेंगे जरुर,
हाथ बढ़ाने की कोशिश में कुछ हाथ आये न आये पर हम बिखरेंगे जरुर...

_____ जोगी     :)     16-05-2011

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