चुहिया



● चुहिया ●


सामने वाली दीवार की जड़ में बने छोटे उबड़-खाबड़ से गोल छेद को निहारे जाना जैसे मेरी रोज़ाना की आदत बन गयी थी | जब भी दिल उदास या खिन्न होता यहीं आ बैठता था मैं | वीरान पड़े इस छेद में अभी कुछ समय से हलचल सी नजर आने लगी थी मगर क्या है असल में यह नहीं समझ पा रहा था | एक दिन शाम के धुंधलके संग बत्तियाँ जलने से पहले उसमें से छोटी नुकीली सी कोई चीज़ बाहर को निकली नज़र आयी | कुछ ऐसी जैसे वह आगे से भोंथरी और उसके बाद लगातार मोती होती चली जा रही किसी डिज़ाइन को अभिव्यक्त कर रही हो | ठीक वैसे ही जैसे कोई 'कोन' | जाकर सबसे पहले लाईट जलाई कि जाने क्या हो? छोटी सी बच्ची है घर में आखिर ध्यान रखना भी आवश्यक हो जाता है | ज्यों ही बत्ती का झपाका हुआ वो उभरी चीज़ भी अपने उद्गम स्थल पर विलुप्त हो गयी |

कुछ देर पश्चात् फिर वही सब लेकिन शफ्फाक चमकती रौशनी मध्य नज़र आया | इस बार आकार कुछ और ज्यादा बाहर को निकला हुआ था | देखते ही चमक उठा ओह ये तो घर में नए मेहमान की पहली दस्तक है | काले नहीं परन्तु काले सामन धूसर रंग वाली छोटी मगर साफ सुथरी एक चुहिया अपनी थूथ आगे को निकाले उसपर उगे कुछ लम्बे कड़क बालों के नीचे वाली अपनी नाक से कुछ सूंघती नज़र आ रही थी जैसे उसके नासछिद्र मेरे कमरे की सारी वस्तुस्थिति उसके सामने स्पष्ट कर देने वाले थे | मूँगदाल जितना छोटा सा नासाग्र सूंघने के साथ ही लयबद्ध अंदाज़ में ऊपर-नीचे होता बड़ा भला सा लग रहा था | शारीर पर नये-नये मुलायम से धूसर रोम ऐसे लग रहे थे कि उनपर हाथ फिराकर देखने का मन हो आया | ज्यादा बड़ी नहीं थी इसीलिए शायद साफ सुथरी नज़र आ रही थी | वर्ना चूहे इतने प्यारे कब-कब लगने लगे..!!

मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं और वह घूमती ग्रीवा संग जाने क्या तलाशना चाह रही थी | देखते ही देखते सरपट उस बिल से निकलकर उस दीवान के नीचे जा घुसी जिसपर लेटा मैं उसे निहार रहा था | अगले ही पल टीवी के नीचे रखी छः फुटी आड़ी हाफ वार्डरॉब के नीचे | तुरंत ही रसोई की ओर यह जा और वह जा मुझे सोचने का मौका तक न मिला | कुछ देर की खटर-पटर के पश्चात् रोटी के उस टुकड़े संग लौटी जो स्लैब पर रह गया था | फिर सीधे अपने बिल में गायब |

हालाँकि घर में चुहिया होने से चिंता का उद्भव होना चाहिए कि अब जाने क्या-क्या न कुतरा जाये परन्तु ऐसा ना सोचकर मन में उसके आकार-प्रकार और रूप-रंग को ले कुछ और ही विचार उत्पन्न हो चले | कम से कम जिन्हें नकारात्मक तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था | काफी देर इंतज़ार किया लेकिन फिर उस दिन दोबारा नहीं दिखाई दी |

अगले दिन सुबह दस बजे के बाद नज़र आयी जिसका स्वागत बिल के बाहर पहले से रखा रोटी का टुकड़ा कर रहा था | हाँ, मैंने ही रखा था उसे वहाँ ताकि यहीं उसके साथ कुछ समय बिताने मिल सके | 'मानसिक अर्धांगी' से बोलचाल बंद है | वजह उसके लिए बड़ी ही होगी वरना यूँ नाते ख़तम तो नहीं किये जाते? मेरे लिए वो कारण वैसा नहीं था कि मेरी अपनी वजहें थी और जब वजहें हों तो उनके लिए भी जीवन में स्पेस होना चाहिए | आधे-पौने घंटे में बात करता हूँ कहकर दो घंटे में बात की और इन्फॉर्म नहीं किया और समय लगा तो उसने रिश्ता हमेशा के लिए ख़तम समझ लिया कि जब दिल में जगह नहीं तो साथ का क्या फायदा? लेकिन हर नहीं के पीछे छिपी वजहें होती हैं कि क्यों नहीं कह पाया लेकिन कोई समझे तब न और जो कुछ कहो तो हमारी बातें बड़ी-बड़ी | बहरहाल बात हमारी चुहिया की हो रही थी | हर रोज उसका आना-जाना लगा ही रहता | उसके आस-पास रहते मैं अपने होने का अहसास भी उसे कराता रहा | पहले दूर-दूर फिर एक दिन दीवान से उतर बिल के पास बैठ उसे रोटी खिलाई | धीरे-धीरे उसे भी मेरे होने की आदत पड़ने लगी | अब सीधे मेरे हाथ से कुतर-कुतर अपना भोजन लेने लगी थी |

जाने कैसा अंजाना रिश्ता था जो अनचाहे ही पनपे जा रहा था | रोज शाम चुहिया का मटक-मटककर आना जैसे वॉक के लिए निकली हो और दूर से मैं उसका हमराही बना उसके साथ अपने खोये पल जीता रहा | बचपन से अब तक अपना कोई रिश्ता बचा नहीं पाया | खुद किसी से विलग नहीं हुआ पर अकेला फिर भी जीता रहा | लेकिन इस नन्हे से बेजुबान जीव का कोई मकसद नज़र नहीं आता सिवा इसके कि कुछ समय उसका मेरे और मेरा उसके साथ गुज़र जाता | मेरी आँखों से गिरती बूंदों पर उसका चेहरा हिलाते हुए एकटक मेरी ओर निहारना यूँ जैसे मेरी कोमल भावनाओं को समझकर अपने मन के हाथों सहला रही हो | और तो और जाने कैसे उस सहलाये जाने की अनुभूति मैं भी पा जाता | हर बार लगता जैसे एक अबोला संवाद था जो उसके साथ हर रोज़ हुआ करता था | जो बातें कभी किसी को न कह पाया वे सारी उस नन्हे भोले से जीव से बाँट बैठा | पहले उसके साथ से सकून पाता फिर अनचाहे ही उसके साथ वार्तालाप शुरू कर दिया | जाने समझती थी भी कि नहीं मगर मेरा संवाद दर-दिन उसके साथ हुआ करता |

एक दिन जब आयी तो मैंने महसूस किया कि उसके पाँवों में वो पहले की सी जान नहीं है | कुछ लंगड़ायी कुछ दुखियाई सी मेरे पास आकर बैठ गयी | रोटी के टुकड़े की तरफ देखा तक नहीं | चुपचाप जमीन पर मुँह धरे अपनी नन्ही सी काली गोल आँखों से मेरे चेहरे को तकने लगी | मानो कह रही हो ''क्या तुम नहीं समझोगे अपनी चुहिया का दर्द? देखो न अब मेरा चलना भी मुश्किल होने लगा है | कैसे अपने नन्हे पाँवों पर यहाँ-वहाँ चौकड़ी भरा करुँगी?'' सच ही तो था उसके चौकड़ी भरने पर कभी मुझे रश्क हुआ करता था ''काश मैं भी इसी तरह दौड़-भाग सकता मगर थोडा भारी शरीर लेकर उतना सब कहाँ संभव हो पाता?'' साथ ही मैंने देखा उसके चेहरे की थूथ पर दाहिनी तरफ आँख से ज़रा नीचे बहुत छोटा सा घाव भी था जो बाद में दिखाई पड़ा | उस जरा से शारीर के लिए तो यह भी एक बड़ा घाव रहा होगा | हाथ में लेकर सोफरोमाईसिन लगाकर उसके पाँवों पर वॉलिनी लगा दी | बहुत देर तक दोनों गुमसुम एक दुसरे के साथ बैठे रहे फिर अचानक मेरे हाथ से उतरकर वह अपने बिल में खो गयी |

अगले कई दिन बीत जाने पर भी जब वो नहीं आयी तो मुझे समझ नहीं आया कहाँ जाकर ढूँढूं अपने आखिरी रिश्ते को? क्या मेरा ये रिश्ता भी खो गया? आँख से एक बूँद पानी नहीं ढलका जैसे उसने कसम दे रखी हो अब कभी नहीं रोओगे तुम | मगर बेआवाज़ होता अंतर्मन का रुदन भला रोक पाया है कोई? पत्नी को समझ ही नहीं आया क्या हुआ है | ना ही उसने जानने की कोशिश की | उसे पड़ी भी कहाँ थी श्रीमानजी की मनोदशा की | हालाँकि मुझे कई बार लगा कि उसने भी महसूस कर लिया है मेरा बदला एकाकीपन परन्तु जैसा कि होता आया है तो आज ही कौनसा नया तीर मारा जाना था | छोड़ दिया अकेला मुझे मेरे ही संग |

जाने कितने दिन अपने में भीतर सिमटे बिता दिए | अभी हाल ही दो रिश्ते खोये हैं, टूटकर बिखर सा गया हूँ | किसी से कोई बोलचाल नहीं कहीं कोई संपर्क नहीं सब रीता सब सूना | ऐसा खोखलापन पहले अनुभूत नहीं किया कभी | कहीं कुछ नहीं मस्तिष्क में एक चौंधा सा और एक अनवरत सी टींsss की आवाज ठीक वैसी ही जैसी टीवी की शुरुआत के दिनों में दूरदर्शन पर सारे प्रोग्राम्स ख़तम होने पर खड़ी धारियों वाले सतरंगी परदे के साथ सुनाई देती थी | स्पष्ट अभिप्राय था कि अब कुछ नहीं बाकी | क्यों इंतजार है तुम्हें? किसी ने वापस नहीं आना | क्या तुम अपना नसीब नहीं जानते? कब-कब तुम्हारा कोई टिकाऊ अपना हुआ? बच्चा..!! तुमको अपने मरने तक अकेले ही जीना होगा इस चौंधे और उस अनवरत दिमाग में बजने वाली टींsss की आवाज संग | और जब मर जाओगे कोई तुम्हारे लिए एक आँसू भी बहा जाये तो कहना |

कोई ना..... इसे नियति जान सूखी आँख सूखा दिल लिए बढ़ लिया जीवनपथ पर कि सहसा लम्बे सूखे के बाद पड़ी पहली बारिश का सा आनंद देती जाने कहाँ से मेरी चुहिया आ धमकी | उसके बिल के पास ही बैठा था तभी अचानक हौले से मेरी गोद में चढ़ने का प्रयास सा करती मिली | सन्न बैठा उसे देखता रह गया और जब समझ आया तो बड़े दिनों बाद लगा मानो रात बीत जाने पर सुबह सात बजने पर दूरदर्शन पर लगा सतरंगी पर्दा हट गया और सुबह के पहले प्रोग्राम की तरह सुमधुर 'वन्दे-मातरम्' का गान शुरू होकर मन-मस्तिष्क से सारे बोझों को हटाने पर लग पड़ा हो | उधर मैं अपनी हथेली पर अपनी चुहिया को बिठाये शब्दों का साथ पकडे बिना बीते दिनों की कुछ उसकी और कुछ अपनी बातें साझा करने में व्यस्त था |

● जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh (26-11-2012)

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Comments

2 Responses to “चुहिया”

3 December 2012 at 2:20 PM

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

Jogendra Singh said...
28 December 2012 at 1:12 AM

▬● मदन मोहन सक्सेना जी ... समय देने और इसे समझने के लिए आपका आभार दोस्त ... :)

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