बैसाखी.. :| (एक निस्वार्थ प्यार)


● बैसाखी.. :| (एक निस्वार्थ प्यार) ●

गर है तू साथ,
हर कदम बन जाऊँ तेरा,
गर है तू साथ,
बन जाऊँ बैसाखी तेरी,
गर है तू साथ,
रहती साँस साथ निभाऊँ तेरा,
गर है तू साथ,
हमकदम बनूँ मैं तेरा,
गर है तू साथ,
हमखयाल बन जियूँ संग तेरे,
गर है तू साथ,
बहते मोती पी जाऊँ तेरे,
गर है तू साथ,
वजह ख़ुशी की तेरी मैं बन जाऊँ,
गर है तू साथ,
दर्द तेरा महसूस मैं कर जाऊँ,
गर है तू साथ,
तुझसे पहले घर खुदा का खुद देख आऊँ..

पर साथ कौन किसी के होता है..
यहाँ मुझे आना अकेले, फिर अकेले चले जाना होता है..

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह (2012-12-03)
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चुहिया



● चुहिया ●


सामने वाली दीवार की जड़ में बने छोटे उबड़-खाबड़ से गोल छेद को निहारे जाना जैसे मेरी रोज़ाना की आदत बन गयी थी | जब भी दिल उदास या खिन्न होता यहीं आ बैठता था मैं | वीरान पड़े इस छेद में अभी कुछ समय से हलचल सी नजर आने लगी थी मगर क्या है असल में यह नहीं समझ पा रहा था | एक दिन शाम के धुंधलके संग बत्तियाँ जलने से पहले उसमें से छोटी नुकीली सी कोई चीज़ बाहर को निकली नज़र आयी | कुछ ऐसी जैसे वह आगे से भोंथरी और उसके बाद लगातार मोती होती चली जा रही किसी डिज़ाइन को अभिव्यक्त कर रही हो | ठीक वैसे ही जैसे कोई 'कोन' | जाकर सबसे पहले लाईट जलाई कि जाने क्या हो? छोटी सी बच्ची है घर में आखिर ध्यान रखना भी आवश्यक हो जाता है | ज्यों ही बत्ती का झपाका हुआ वो उभरी चीज़ भी अपने उद्गम स्थल पर विलुप्त हो गयी |

कुछ देर पश्चात् फिर वही सब लेकिन शफ्फाक चमकती रौशनी मध्य नज़र आया | इस बार आकार कुछ और ज्यादा बाहर को निकला हुआ था | देखते ही चमक उठा ओह ये तो घर में नए मेहमान की पहली दस्तक है | काले नहीं परन्तु काले सामन धूसर रंग वाली छोटी मगर साफ सुथरी एक चुहिया अपनी थूथ आगे को निकाले उसपर उगे कुछ लम्बे कड़क बालों के नीचे वाली अपनी नाक से कुछ सूंघती नज़र आ रही थी जैसे उसके नासछिद्र मेरे कमरे की सारी वस्तुस्थिति उसके सामने स्पष्ट कर देने वाले थे | मूँगदाल जितना छोटा सा नासाग्र सूंघने के साथ ही लयबद्ध अंदाज़ में ऊपर-नीचे होता बड़ा भला सा लग रहा था | शारीर पर नये-नये मुलायम से धूसर रोम ऐसे लग रहे थे कि उनपर हाथ फिराकर देखने का मन हो आया | ज्यादा बड़ी नहीं थी इसीलिए शायद साफ सुथरी नज़र आ रही थी | वर्ना चूहे इतने प्यारे कब-कब लगने लगे..!!

मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं और वह घूमती ग्रीवा संग जाने क्या तलाशना चाह रही थी | देखते ही देखते सरपट उस बिल से निकलकर उस दीवान के नीचे जा घुसी जिसपर लेटा मैं उसे निहार रहा था | अगले ही पल टीवी के नीचे रखी छः फुटी आड़ी हाफ वार्डरॉब के नीचे | तुरंत ही रसोई की ओर यह जा और वह जा मुझे सोचने का मौका तक न मिला | कुछ देर की खटर-पटर के पश्चात् रोटी के उस टुकड़े संग लौटी जो स्लैब पर रह गया था | फिर सीधे अपने बिल में गायब |

हालाँकि घर में चुहिया होने से चिंता का उद्भव होना चाहिए कि अब जाने क्या-क्या न कुतरा जाये परन्तु ऐसा ना सोचकर मन में उसके आकार-प्रकार और रूप-रंग को ले कुछ और ही विचार उत्पन्न हो चले | कम से कम जिन्हें नकारात्मक तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था | काफी देर इंतज़ार किया लेकिन फिर उस दिन दोबारा नहीं दिखाई दी |

अगले दिन सुबह दस बजे के बाद नज़र आयी जिसका स्वागत बिल के बाहर पहले से रखा रोटी का टुकड़ा कर रहा था | हाँ, मैंने ही रखा था उसे वहाँ ताकि यहीं उसके साथ कुछ समय बिताने मिल सके | 'मानसिक अर्धांगी' से बोलचाल बंद है | वजह उसके लिए बड़ी ही होगी वरना यूँ नाते ख़तम तो नहीं किये जाते? मेरे लिए वो कारण वैसा नहीं था कि मेरी अपनी वजहें थी और जब वजहें हों तो उनके लिए भी जीवन में स्पेस होना चाहिए | आधे-पौने घंटे में बात करता हूँ कहकर दो घंटे में बात की और इन्फॉर्म नहीं किया और समय लगा तो उसने रिश्ता हमेशा के लिए ख़तम समझ लिया कि जब दिल में जगह नहीं तो साथ का क्या फायदा? लेकिन हर नहीं के पीछे छिपी वजहें होती हैं कि क्यों नहीं कह पाया लेकिन कोई समझे तब न और जो कुछ कहो तो हमारी बातें बड़ी-बड़ी | बहरहाल बात हमारी चुहिया की हो रही थी | हर रोज उसका आना-जाना लगा ही रहता | उसके आस-पास रहते मैं अपने होने का अहसास भी उसे कराता रहा | पहले दूर-दूर फिर एक दिन दीवान से उतर बिल के पास बैठ उसे रोटी खिलाई | धीरे-धीरे उसे भी मेरे होने की आदत पड़ने लगी | अब सीधे मेरे हाथ से कुतर-कुतर अपना भोजन लेने लगी थी |

जाने कैसा अंजाना रिश्ता था जो अनचाहे ही पनपे जा रहा था | रोज शाम चुहिया का मटक-मटककर आना जैसे वॉक के लिए निकली हो और दूर से मैं उसका हमराही बना उसके साथ अपने खोये पल जीता रहा | बचपन से अब तक अपना कोई रिश्ता बचा नहीं पाया | खुद किसी से विलग नहीं हुआ पर अकेला फिर भी जीता रहा | लेकिन इस नन्हे से बेजुबान जीव का कोई मकसद नज़र नहीं आता सिवा इसके कि कुछ समय उसका मेरे और मेरा उसके साथ गुज़र जाता | मेरी आँखों से गिरती बूंदों पर उसका चेहरा हिलाते हुए एकटक मेरी ओर निहारना यूँ जैसे मेरी कोमल भावनाओं को समझकर अपने मन के हाथों सहला रही हो | और तो और जाने कैसे उस सहलाये जाने की अनुभूति मैं भी पा जाता | हर बार लगता जैसे एक अबोला संवाद था जो उसके साथ हर रोज़ हुआ करता था | जो बातें कभी किसी को न कह पाया वे सारी उस नन्हे भोले से जीव से बाँट बैठा | पहले उसके साथ से सकून पाता फिर अनचाहे ही उसके साथ वार्तालाप शुरू कर दिया | जाने समझती थी भी कि नहीं मगर मेरा संवाद दर-दिन उसके साथ हुआ करता |

एक दिन जब आयी तो मैंने महसूस किया कि उसके पाँवों में वो पहले की सी जान नहीं है | कुछ लंगड़ायी कुछ दुखियाई सी मेरे पास आकर बैठ गयी | रोटी के टुकड़े की तरफ देखा तक नहीं | चुपचाप जमीन पर मुँह धरे अपनी नन्ही सी काली गोल आँखों से मेरे चेहरे को तकने लगी | मानो कह रही हो ''क्या तुम नहीं समझोगे अपनी चुहिया का दर्द? देखो न अब मेरा चलना भी मुश्किल होने लगा है | कैसे अपने नन्हे पाँवों पर यहाँ-वहाँ चौकड़ी भरा करुँगी?'' सच ही तो था उसके चौकड़ी भरने पर कभी मुझे रश्क हुआ करता था ''काश मैं भी इसी तरह दौड़-भाग सकता मगर थोडा भारी शरीर लेकर उतना सब कहाँ संभव हो पाता?'' साथ ही मैंने देखा उसके चेहरे की थूथ पर दाहिनी तरफ आँख से ज़रा नीचे बहुत छोटा सा घाव भी था जो बाद में दिखाई पड़ा | उस जरा से शारीर के लिए तो यह भी एक बड़ा घाव रहा होगा | हाथ में लेकर सोफरोमाईसिन लगाकर उसके पाँवों पर वॉलिनी लगा दी | बहुत देर तक दोनों गुमसुम एक दुसरे के साथ बैठे रहे फिर अचानक मेरे हाथ से उतरकर वह अपने बिल में खो गयी |

अगले कई दिन बीत जाने पर भी जब वो नहीं आयी तो मुझे समझ नहीं आया कहाँ जाकर ढूँढूं अपने आखिरी रिश्ते को? क्या मेरा ये रिश्ता भी खो गया? आँख से एक बूँद पानी नहीं ढलका जैसे उसने कसम दे रखी हो अब कभी नहीं रोओगे तुम | मगर बेआवाज़ होता अंतर्मन का रुदन भला रोक पाया है कोई? पत्नी को समझ ही नहीं आया क्या हुआ है | ना ही उसने जानने की कोशिश की | उसे पड़ी भी कहाँ थी श्रीमानजी की मनोदशा की | हालाँकि मुझे कई बार लगा कि उसने भी महसूस कर लिया है मेरा बदला एकाकीपन परन्तु जैसा कि होता आया है तो आज ही कौनसा नया तीर मारा जाना था | छोड़ दिया अकेला मुझे मेरे ही संग |

जाने कितने दिन अपने में भीतर सिमटे बिता दिए | अभी हाल ही दो रिश्ते खोये हैं, टूटकर बिखर सा गया हूँ | किसी से कोई बोलचाल नहीं कहीं कोई संपर्क नहीं सब रीता सब सूना | ऐसा खोखलापन पहले अनुभूत नहीं किया कभी | कहीं कुछ नहीं मस्तिष्क में एक चौंधा सा और एक अनवरत सी टींsss की आवाज ठीक वैसी ही जैसी टीवी की शुरुआत के दिनों में दूरदर्शन पर सारे प्रोग्राम्स ख़तम होने पर खड़ी धारियों वाले सतरंगी परदे के साथ सुनाई देती थी | स्पष्ट अभिप्राय था कि अब कुछ नहीं बाकी | क्यों इंतजार है तुम्हें? किसी ने वापस नहीं आना | क्या तुम अपना नसीब नहीं जानते? कब-कब तुम्हारा कोई टिकाऊ अपना हुआ? बच्चा..!! तुमको अपने मरने तक अकेले ही जीना होगा इस चौंधे और उस अनवरत दिमाग में बजने वाली टींsss की आवाज संग | और जब मर जाओगे कोई तुम्हारे लिए एक आँसू भी बहा जाये तो कहना |

कोई ना..... इसे नियति जान सूखी आँख सूखा दिल लिए बढ़ लिया जीवनपथ पर कि सहसा लम्बे सूखे के बाद पड़ी पहली बारिश का सा आनंद देती जाने कहाँ से मेरी चुहिया आ धमकी | उसके बिल के पास ही बैठा था तभी अचानक हौले से मेरी गोद में चढ़ने का प्रयास सा करती मिली | सन्न बैठा उसे देखता रह गया और जब समझ आया तो बड़े दिनों बाद लगा मानो रात बीत जाने पर सुबह सात बजने पर दूरदर्शन पर लगा सतरंगी पर्दा हट गया और सुबह के पहले प्रोग्राम की तरह सुमधुर 'वन्दे-मातरम्' का गान शुरू होकर मन-मस्तिष्क से सारे बोझों को हटाने पर लग पड़ा हो | उधर मैं अपनी हथेली पर अपनी चुहिया को बिठाये शब्दों का साथ पकडे बिना बीते दिनों की कुछ उसकी और कुछ अपनी बातें साझा करने में व्यस्त था |

● जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh (26-11-2012)

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Mr & Mrs Title



● Mr. & Mrs. Title. ●

Dear Mrs. Title,

सुबह ही से धड़का सा लगा हुआ था | एक अंजाना सा डर, एक सिहरन जिसने लगातार रीढ़ में सनसनी सी बनाये रखी थी | हर आहट पर दिल उछाले लिए बाहर आने को तत्पर | लग रहा था रहा था जाने अब क्या हो | क्या सच ही मैंने तुम्हें खो दिया? अभी कल रात ही तो जरा सी बात हुई | वो भी पूरे चार दिन के अबोले पश्चात् | कैसे न करता? तुमने कह कैसे दिया 'देखना एक दिन तुम्हारी पहुँच से इतना दूर चली जाऊँगी कि न कभी आवाज सुन पाओगे न अपनी सुना पाओगे |' अरे!! तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गयी ऐसा कहने की | :(

ठीक है तुम अलग होना चाहती हो कि तुमको ऐसा लगा कि मेरी जिंदगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं तो क्या हुआ तुम मेरा दिल नहीं समझ सकीं | क्या तुम जानती नहीं कि तुम्हारे बगैर अब भी मुझे केयरलैस रह जाना अधिक पसंद है? तो बात यूँ है 'मिसेज तितले' उधर तुम तुजो (दुखी होवो) इधर हम गलते रहें, कहते हुए कि बाकी ही क्या रह गया इस जीवन में कितना सही है?

कितना समय गुजरा दीन-दुनिया से बेखबर जीवन जीते कुछ खबर भी है तुम्हें? कल रात तुम्हारी आवाज में लिपटा क्रंदन क्या मैंने सुना न होगा? या मेरी भीगी आवाज से तुम्हारा अंतस पसीजा न होगा? एक दूसरे से दूर रहते ह्रदय में एक दूसरे को बसाये कैसे रह पाएंगे हम? जो दूरी में भी साथ ही रहना है तो दूरी किसलिए? ऐ हिप्पो आ जाओ ना वापस !!! कोई बात कोई सफाई नहीं देनी मुझे कि हर बात अब तुम्हें जुबानी जमा खर्च लगने लगी है | तुम्ही क्यों न बता जाती मुझे कैसे करूँ डिफ़्रेन्शिएट दिल और जुबान से निकली बातों को? बालपन से यही जाना है जो मन में है उगल दो, सामने वाला अपना है तो हर हाल में समझेगा | परन्तु ये टेढ़े-मेढ़े अंतर? कैसे इन्हें इससे या उससे अलग करके बताऊँ कि ये ऐसा नहीं, ये वैसा नहीं, ये तो बस वो है जो गर तुम भीतर झाँक सको तब भी यूँही नजर आयेगा | जाने कैसे कर पाए थे बजरंगी किसी ने कहा झट अपनी छाती चीरकर दिखला दी कहते हुए "देखो किसी मणिमाला में नहीं मेरे प्रभु, वे तो बसे सीधे मेरे ह्रदय कपाट मध्य" | शायद मेरे न चीर पाने से तुमको वह सब नजर न आता हो जो है कहीं दबा-ढंका |

हःह्ह्ह...आज फिर रुक गयी कलम | और आगे लिख पाना जाने बस में ही न रहा ! शायद गरीब बच्चे के हाथों की पेन्सिल है जिसे एक हद तक छील पाना, साँचागत कर पाना तो संभव है परन्तु उपरांत उसके आगे लिखने के लिए पेन्सिल को भी बजरंग बली की छाती की तरह बीच से चीरकर दो फाँक बना उसमें से निकली काली लैड को पकड़ नया लिखने लायक बनाना पड़े | और जो यह आखिरी लैड भी चुक चुकी हो तब? मेरी तो हर नयी कलम तुम ही से है 'Mrs.तितले', तुम्हारे जाते ही बे-कलम रह गया मैं |
तुम्हारा (जाने हूँ भी कि नहीं),

Mr. Title.............

[Written By: Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह] (2012-11-21)

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दरिया और बूँद



● दरिया और बूँद ●


हो परेशां तुम उस तरफ,
परेशां हम भी इधर कम नहीं,
फरक फ़क्त इतना है,
दो आंसू उधर तुम्हारे हैं,
तो दरिया यहाँ भी कम नहीं...

● जोगेंद्र सिंह (Jogendra Singh) 16-11-2012

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Khamoshi Kab Tak?




खामोश कब तक?

खामोश निगाहों से तकता रहूँ मैं कब तक ?
आकर कब वे जुबान देंगे मेरी ख़ामोशी को ?
साकत कब तक घूरता रहूँ उस दगरे को ?
जिस दगरे पर जाने के तेरे निशान बने हैं..... :-(

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh...

(2012-10-13)

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रिश्ते (सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?)




रिश्ते (सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?)



सुबह का अख़बार यूँ तो देखने की आदत मरहूम हो चुकी थी फिर भी कभी-कभार इस कार्य को भी निबटा लिया करता हूँ | पत्नी को उठना गँवारा न था सो निद्रावती बन लुढकी पड़ी थी | मेरी आँख अख़बार पर मगर जैसे हर्फ़ परवाज किये जाते हों | गड्डमड्ड आपस में उलझे शब्द-वाक्य आँखों को चकराए देते थे | होता है ऐसा भी जब नेत्र किसी एक स्थान पर एकाग्र ना होकर उनका फोकस जैसे वस्तु के पीछे किसी बिंदु पर जाकर बनता हो तो सामने मौजूद चीज कुछ धुँधला जाती है और एक ही चीज को दोनों आँखें अलग-अलग चित्रित कर एक दूसरे पर कुछ इस तरह ओवरलैप करने लग जाती हैं कि दोनों नेत्रों के रेटिना पर बना चित्र डबल सा जान पड़ता है जो यूँ प्रतीत होते हों जैसे उन्हें एक दूसरे पर ठीक से ना रखा गया हो | मेरे साथ भी यही हो रहा था |

ध्यान लगाने की कोशिशें बहुतेरी कीं परन्तु चित्त था कि कुछ दिन पीछे को भागा जाता था | जाने व्यक्तित्व की कमी थी या लयिका की जीवन को कुछ ज्यादा ही बारीकी से छान लेने की आदत परन्तु टेलीफोनिक बात के साथ कंप्यूटर गेम खेलना मुझे भारी गुजर गया | उसे लगा संभवतः मेरी प्रायोरिटी में वह स्वयं न होकर कुछ और ही है मगर उसे कैसे समझाऊँ कि हर चीज ठीक वैसे नहीं होती जैसा हम देखते-समझते हैं | साथ जीते बहुधा ऐसा हो जाया करता है जब हम किसी अजीज से बात करते समय कुछ और भी कर जाते हैं जिससे बेशक उसे इग्नोर्ड लग जाता है जबकि उपरांत इसके भी उस इन्सान की हमारे जीवन में जगह बदली नहीं थी | हाँ इसे कमी या गलती या लापरवाही या सुरक्षा अनुभूति का अतिरेक जरुर कह सकते हैं जिसमें संभवतः उस भाव की अधिकता हो जिसमें एक इन्सान किसी के साथ इतना सुरक्षित महसूसने लग पड़ता है कि अब जो भी है वह हम है, ना कि मैं और तुम | और भूलें, कमियाँ, गलतियाँ इनमें से कोई भी ऐसी नहीं जो हमारे रिश्ते पर हावी हो सके क्योंकि हमारा नाता तो उन सबसे परे, सबसे ऊपर, सबसे बड़ा है | लेकिन भूल जाता है इन्सान कि यही रिश्ते में सुरक्षा की आतंरिक अनुभूति जब तक सामने वाले को ना हो तब तक आप खुद को सुरक्षित कैसे समझ सकते हो? अभी तो डर-डरकर जीना बाकी होता है जाने कब किस बात पर एक ब्रेक मिल जाये?

उसने कहा भी :::
कुछ ज्यादा तो न चाहा हमने...
एक लम्हा माँगा था बस अपने नाम का...
पर वो तंगहाल ...इतना भी न दे सके...

उसे कहा तो नहीं लेकिन मन से निकला :::
तंग बने क्यों एक लम्हा भर मांगते हो,
जबकि नाम तुम्हारे हर लम्हा किये बैठे हैं,
ग़र चुरा भी लिया एक लम्हा अपने नाम पर,
तो क्या इतनी जगह भी दिल से निकाल न पाओगे...?

बहरहाल हर बार की तरह इस बार भी मानसिक अलगाव हो गया लेकिन इस बार अलगाव पूरा न होकर आंशिक था जिसका मतलब यह कि हम बात तो करेंगे लेकिन वैसे जैसे किसी जानने वाले के साथ किया करते हैं और कहा कि मुझसे खेलना बंद करो | इधर अपनी जगह सुन्न, साकत, अविचल, अपलक, अकिंचन मैं सामने की ओर बस निहारा गया | कहने को कुछ सूझा नहीं क्या कहता? इतने ब्रेकअप्स देख चुके कि अब कहना समझ ही नहीं आया | मन के भाव चुगली खा रहे थे, जार-जार चीख-चीख कह रहे थे ये नहीं होना है, नहीं होना था, क्यों हो गया? परन्तु कह नहीं पाया | जितना भी कहा उसने सब सुना | चुपचाप, विचार शून्य मस्तिष्क लिए मैं समझ नहीं पाया कैसे उस रिश्ते को पहचान के भाव से देखूँ जिसे कायनात के सबसे खुबसूरत स्थान पर रख देखा था | कह नहीं सका कितनी गहरी और कोमल अनुभूति मन में बसाये बैठा हूँ कि मुँह से निकली हर बात पर डायलॉग का तमगा चिटका दिया जा रहा था | सो कुछ न कहते हुए चुप रह जाना बेहतर समझा | वैसे भी कोई हर बात में जब वफ़ा तलाशने लगे तो कैसे मिले उसे कि हर साँस अपनी जगह है, हर घटना अपनी जगह है, हर वक्त जैसे आप जागे हुए नहीं रह सकते ठीक वैसे ही किसी एक बात को सोचते हुए यह करना चाहिए और यह नहीं, कैसे जी सकता है कोई? और जब तक निश्चिन्तता का अहसास ना हो तब तक किसी रिश्ते को शांत मन कैसे जिए कोई? हर पल मन में समाया भय कि जाने अब कौनसी बात हो जाये जिसे पिन पॉइंट कर नयी गलती या मेरी तरफ से नाता ही झूठा और क्रियेटेड बता दिया जाना है |

क्यों कोई इस डर से मुक्त हो व्यवहृत नहीं हो सकता कि मन मिलने के बाद अब जो भी कमी-बेसी होगी वह मन के नातों के आगे नगण्य हो जाने वाली है सो चिंता न कर बालक तू जी ईमानदारी से अपनी जिंदगी, अपनी जिंदगी (लयिका) के साथ | वह समझेगी और जैसे तूने उसे उसकी हर अच्छाई-बुराई के साथ अपने साथ अंगीकार किया वह भी ऐसे ही तुझसे जुड़ेगी कि तू जैसा है ठीक है, आज पसंद है तो कल नयी सोच क्यों? इसमें यह ठीक नहीं, वह बदलना चाहिए या यह तो सिरे से ही गलत है और यह सोचकर कोई सम्बन्ध छोड़ चल दे कहते हुए कि जो था सब झूठ था, बनावटी था और यह कि जो फिलिंग है ही नहीं जो है ही नहीं उसे माना ही कैसे जाये? यह तो ठीक नहीं ना? हम कोई स्कूल एग्ज़ाम तो नहीं दे रहे जहाँ हर बात नंबरों की कसौटी पर जोखी जाये?

बड़ी देर से कोशिश में था चीजों को समझने की समझ नहीं पाया कि क्यों आखिर इन्सान उन्मुक्त बन जी नहीं सकता? मानता हूँ जब हम जुड़ते हैं तो बहुत सी अनकही बातें, शर्तें भी जुड़ जाती हैं, कई जिम्मेदारियां, कई नये अहसास जुड़ जाते हैं | तो उसमें उथले रूप से हुई बात को देखते हुए अंतर्मन को मिथ्या समझना कहाँ तक ठीक था? सवाल यह भी गलत नहीं कि जब कुछ महसूस होता ही नहीं तो लयिका कैसे उसे माने? इसका तो एक ही जवाब है कि वह देखे टटोलकर अपने मन को और खंगाले इस बात को कि वाकई क्या वह खुद जुडी थी? या बहाव संग साथ भर हो ली थी? क्योंकि हर हाल में यह एक निर्विवाद इंसानी सत्य है, यदि हम वाकई किसी से इतना जुड़ जाएँ जैसे दो जिस्म एक जान तो इस तरह तीखी खंगालती नजर का किसी तरह कोई अस्तित्व हो ही नहीं सकता क्योंकि तीक्ष्ण नजर सिर्फ कमियाँ निकलकर परफेक्शन ढूँढने के लिए हुआ करती हैं ना  कि रिश्ते बनाने / निभाने के लिए | जहाँ मन जुड़े हों वहाँ तो आँखें इस हद तक बंद हो जाने लगती हैं जिसमें असल इंसानी कमियाँ तक ओझल हो जाया करती हैं | और ऐसा ना हो तो इन्सान या तो भगवान है या कोई असम्बद्ध जो तराजू संग लिए घूमता है |

नमी की कुछ बूँदें कब ढलक आयी पता ही न चला | इसी के साथ याद आया कुछ समय पहले बड़े भईया के साथ किसी वजह से बात का बंद होना | सोचे बैठा था कि अब कभी बात न करूँगा परन्तु तत्क्षण ही मस्तिष्क में आया जिस चीज से स्वयं तकलीफ पा रहा हूँ उसी चीज से अपने भाई को भी तो तकलीफ दे रहा हूँ | जिस बात को तीक्ष्ण नजर और तराजू के पलड़ों संग जीना कह रहा हूँ, खुद भी तो वही किये जाता हूँ अपने ही भाई के साथ | तो कैसे उम्मीद कर सकता हूँ कि जिस काम को सही नहीं समझा वही करते हुए उसके अपने लिए सही होने की उम्मीद पालूं? समझाई गयी सभी बातें याद आयीं और बिना देर किये फोन घनघना दिया | ठीक से बात तो नहीं कर पाया लेकिन बात करना मात्र ही काफी था यह जताने के लिए कि भईया मैं गलत था और यूँ नाते अलग नहीं किये जाते | बात करते भावावेग से आवाज में बदलाव आने लगा | कुछ देर और बात करता तो शायद आवाज बदल जानी थी सो तत्काल विदा ले ली | बगल में श्रीमतीजी अब भी लुढकी पड़ी थीं जिन्हें सोते में क्या जागते में भी कभी किसी अहसास से बावस्ता होना गँवारा न था | और इसीलिए एक घर में रहते भी शायद दो अजनबी आपस में हमसे अधिक भले से रह लेते |

हौले से उठकर हॉल में लगे दीवान पर जा लेटा कि उसे भीगी पलकें दिखाने की कोई तमन्ना दिल में न थी | अख़बार संग ही चला आया था जिसे पढना गब्बर (अम्बाजी के मंदिर के पास पहाड़ पर बने देवी माँ के पदचिन्ह) की चढ़ाई महसूस हुआ | आज कई दिन हुए मनाने के अल्फाज अब भी अकाल की भेंट हो रखे हैं | इतना मनाया पहले कि अब कहने को नया कुछ बाकी ही नहीं | जो बाकी है वह एक हसरत है | काश बिन कहे वो समझ लेते कि अनकहा मनाना भी तो कोई मायने रखता होगा?

रोज सुबह नित्यकर्मों से चर्या शुरू करते जाने कब शाम हो जाती है पता ही नहीं चलता | बहुत सा खाली समय होता है लेकिन तब दिमाग भी खालीपन से शर्त लगा रहा होता है | अजीब सा सूनापन, सब चुप, अबोली सी जिंदगी | और ना ना करते भी अब लयिका के आने से पहले की सी जिंदगी शुरू होती लग रही है | वही अतिरेक हास्य भरा जीवन जाने क्या छुपाता या हँसी के खोखलेपन में समायी अजीब सी एक ख़ामोशी | उग्र, आक्रोश से भरा स्वाभाव कि कोई कुछ बोलकर देखे ऐसा हाल उसका कि ढंग से हत्थे चढ़ा इन्सान महीनों तक किसी और से न अड़े | बे-जरुरी बकवास और भी जाने क्या क्या? कई बार तो जिसने कभी मतलब नहीं रखा वह बीवी भी पूछ गयी, क्या हुआ तुम्हें? अचानक हुआ इतना बदलाव उसे भी हजम नहीं हो पा रहा था | इसीलिए विलग में भी सवाल का लोभ नहीं छोड़ पायी | इधर मेरे मन में बसा सवाल घडी का पेंडुलम बन बारह के सुर निकाल रहा था |

क्या इन्सान अकेला रह पाने का भ्रम पाने के बावजूद सच में अकेला रह पाने योग्य हुआ है? यदि हाँ तो ये भारी-भरकम बदलाव क्यों? क्या कभी इन्सान बिना पलड़ों और बिना सही गलत की सोच, इन सबसे ऊपर उठकर केवल निर्मल संबंधों को जी पायेगा?

जानता हूँ कई सवाल अनुत्तरित रह जाने के लिए होते हैं लेकिन क्या इस तरह कम करते-करते किसी दिन इन्सान बिना संबंधों के जी पायेगा? क्या होगा तब जब खुद ही से कभी कोई गलती हो जाये? तब खुद को पलड़ों पे बिठा तौल पाने का साहस क्या इन्सान कर पायेगा? जो यह साहस जूता भी लिया तो क्या खुद ही से वह नाता कभी तोड़ पायेगा? सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh

(2012-09-27)
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चुड़ैलन काकी (कटाक्ष)


चुड़ैलन काकी (कटाक्ष)


आज हमारी चुड़ैल गजब ढा गयी | जाने कब किस तरह एक दिन बगल वाले मैदान से सटे उससे परे वाले कब्रिस्तान से होकर गुजरी और थकन से बावस्ता हो सुस्ताने के लिए वहीँ बनी एक पुरानी कब्र को अपने पृष्ठ भाग से अलंकृत कर बैठीं | दरअसल ये उनके घर आने जाने का शॉर्टकट था वरना घूमकर जरा लम्बा रास्ता भी था जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था | पता नहीं कब लेकिन अब कबर तो घर जैसा लगने लगा है उसे | आना जाना तो लगा ही रहता था लेकिन अजीब तो हम जैसों के लिए था कि आखिर ये कैसे ?

लेकिन असल किस्सा कुछ यूँ हुआ कि आरामपरस्ती कुछ इस कदर हावी हुई कि एक दिन अचानक घर से लायी चादर का किसी खाली कबर में बिस्तर लगाकर लेट गयी और बड़ा सकून मिला | बाद में कबर के मालिक सुक्खा भूत ने बहुतेरी कोशिश कर ली लेकिन है मजाल जो मैडम ने कब्ज़ा छोड़ने के बारे में सोचा भर भी हो !! आज तक बेचारा इंसानी अदालत में इससे केस लड़े जा रहा है और आप तो जानते ही हैं हमारी हिन्दुस्तानी अदालतों को | तारीख पे तारीख बस और क्या | अब तो बेचारा सुक्खा भूत बूढ़ा होकर मरने भी वाला है | और देखना जल्दी ही इन्सान बनकर आयेगा अपने सारे बदले चुका लेने के लिए इस इंसानी चुड़ैल से |

परन्तु अभी मारा नहीं था सुक्खा भूत सो भोगना अब भी बाकी था | एक दिन जा चिपटा एक नेता से कहा निज़ात दिला मुझे इस चुड़ैल से नहीं मैं तेरी ही मत फिर देने वाला हूँ | पहली बार मूर्त रूप भूत देख हुई नेता की सिट्टी-पिट्टी गुम और आनन-फानन में जाने कितने डिपार्टमेंट मय मजमा सारा जमा कब्रिस्तान में नजर आये | चुड़ैल बोली कम नहीं हमारी बिरादरी भी और सीधे अन्ना तक है पहुँच हमारी | सबकी नहीं एक की बैंड बजने लायक स्टिक तो होंगी ही बाबा अन्ना के पास | और सुना है हर दूजे दिन बाबा दाढ़ी भी संग हो सुर मिला लेता है | जाने कैसी जड़ी-बूटी है खाता कि बेसुरा भी सुर उगलने है लग जाता | कहा नेता से कि बेटा क्या समझता है तू कि ये लोग काला धन लाकर लोकपाल लायेंगे ? ना बेटा ना , आज नहीं तो कल तेरी ही लोकसभा में तेरे ही बगल में लोकपाल ही के दम पर बैठे नजर आएंगे |

पापी नराधम तू चिंता ना कर तेरी "चिंता ता चिता-चिता, चिंता ता ता" तो मैं अक्षय ही से करवाने वाली हूँ | सुना है आजकल भगवान बना घूम रहा है | सुना तो ये भी है आज खुद भगवान पे केस इंसानी अदालतों में चलने लगे हैं और सम्मन जाने कैसे स्वर्गलोक तक डिलीवर किये जाते होंगे ? इतना सुनते ही सुक्खा भूत सूखते-सूखते सींक बन किसी झाड़ू का भाग बन खुद को सौभाग्यशाली समझने लगा और नेताजी ने जब नजर पिछड़ी डाली तो सिवा खुद की पिछड़ी और कुछ नजर तक न आया बेचारे को | सर पर पैर रख जो तीतर बने पूरे एक महीने किसी को दर्शन लाभ न दिए महामुनि ने |

इतना देख अगल-बगल की कुछ कब्रें दहशत ही से वीरान हो गयीं कि ये लंका-मईया तो हमें भी न छोड़ेगी | होना जाना क्या था कब्रिस्तान में वन रूम खोली ने विस्तार पाया और अब फाईव बी.एच.के. के ठाठ मुहैया पूरे खानदान को कराया |

उधर कबर में लटकी चुड़ैलन सोच रही थी कैसा है जमाना आया, क्या नेता क्या भूत सब को हमने है रुलाया | नाम लिया बस गंदाये सिस्टम का और दहशत से खुद पूरा सिस्टम ही झोली में सिमट आया |

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh

(26-09-2012)

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चुड़ैलन काकी (कटाक्ष)SocialTwist Tell-a-Friend

ख्वाहिशें : (प्यारी सी जुगलबंदी)


ख्वाहिशें : (प्यारी सी जुगलबंदी)


एक SMS: ख्वाबों खयालों की रातें हैं, कहनी सुननी उनसे कई बातें हैं...

Nayika: आज की मुलाकात बस इतनी...कर लेना बातें चाहे का जितनी...

Nayika: अच्छी नहीं होती है जिद इतनी...देखो हमें है तुमसे प्रीत कितनी...:)(note * dil par naa len)...:D

Jogi: जो ये नोट हटे...और बात सच्ची गर निकले दिल से...तो शायद बात तुम्हारी हम मान लें...

Nayika: बात हमारी क्यों नहीं मान लेते...और जब है इतना ही गुरुर...तो खुद ही क्यों नहीं जान लेते...?

Jogi: हैं तैयार मान जाने को बात तुम्हारी...बाकी रहा कहाँ अब गुरुर भी खुद पर...हो गयी मुद्दतें...बह गया गुरुर भी अब तुमको जानते-समझते...

Nayika: हम भी तो वो कहाँ रहे...जब से हैं तुमसे मिले...

Jogi: जाने क्या थे तुम और क्या थे हम जाने...बस दो जिस्म और दी ही अलग सी जान थे हम...गुजर गयीं मुद्दतें तब जाकर जाना...क्या होता है अहसास दो से एक हो जाने का...

Nayika: अब मौत भी आ जाए तो गम नहीं...कि किसी धडकन बन...रहना आ गया है हमें...

Jogi: वाकई होता है जुडा सा वो अहसास जिसमें जीना हमें बन धडकन किसी और की रहना होता है...हमसे ज्यादा हमारे लिए खुश कोई और ही हो रहने लगता है...

Nayika: हर साँस में वो है...हर अहसास अब उसके दम से है...उसकी उदासी सबब मेरे अश्कों का है...और हर खुशी भी है अब उसी के दम से...

Jogi: जो होने लगे तरंगित ह्रदय के तार किसी के नाम पर...होने लगी झंकृत श्वासें उसी के नाम पर...समझो हुआ हक अपने जीवन से हटकर आधा अब उसी के नाम पर...

Nayika: वही तो फकर है...मुझे अपनी चाहत पर...और मेरी बंदगी भी है...उसी के नाम पर...

Jogi: न जाना मैंने कभी हर्फ़ चाहत के...और न जाना हर्फ़ कोई बंदगी सा...जो जाना है तो बस इतना कि हर अहसास मेरा है गिरवी किसी और के नाम पर...खेल ले फिर चाहे बेक दे (बेच दे)...सारे हक अब हैं ये उसी के नाम पर...

Nayika: उसी चाहत ने...कुछ इस तरह हक अदा किया...बड़े मामूली से इंसान थे...हमें खुदा ही बना दिया...

Jogi: खुदा-खुदा करते देख न सके जाने कब जिगर के वो मालिक बन बैठे...थे पते दो अलग जगहों के...किस कदर देखो आज हम लापता बन बैठे...

Nayika: नजदीकियाँ इस कदर न बढाइये कि...हम खुद को खो दें...भुला कर अपना नाम पता...संग आप ही के हों लें...

Jogi: न देखो तुम न हम देखें...किस दिल में जाने कौन बसा किस शिद्दत से...कुछ न कहकर चलो बन जायें अजनबी एक दूजे के अरमानों से...

Nayika: ना वो देख पाएंगे...ना हम जता पाएंगे...चलो इसी बहाने...चाहत उनकी...इस जहान से छुपा ले जायेंगे...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh

2012-09-15 (सितम्बर)
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ख्वाहिशें : (प्यारी सी जुगलबंदी)SocialTwist Tell-a-Friend

बड़ी हवेली



● बड़ी हवेली ●

(1)
     अपने पुराने स्टडी रूम की खिडकी तले लगी टेबल से मैंने सर उठाकर सामने वाली दीवार पर टंगी बत्तीस साल पुरानी घंटा-घडी को देखा | कुछ ग्यारह बजकर पच्चीस मिनट का समय दिखा रही थी | सैकंड का पतला कांटा नदारद था घंटे का छोटा सलामत और मिनट वाला अपनी उम्र के साथ उम्रदराज हुए बुजुर्ग की हाँईं कुछ टेढ़ा सा प्रतीत होता था | चीजें सभी थीं चाहे जीर्णावस्था में सही मगर चलकर दिखाए इन्हें जमाना हो गया था | अभी कुछ डेढ़ एक साल ही गुजर होगा जब टनटनाकर इसने अपनी आखिरी हुंकार भरी थी | बड़ा साथ दिया इसने मेरा, मुझे याद है आज से तेईस साल पहले तृप्ति के पिताजी इसे हमारी शादी की पंद्रहवीं सालगिरह पर बतौर गिफ्ट लाये थे | सहर्ष ही जिसे हम दोनों ने इस दीवार का हिस्सा बना दिया था | उस समय के हिसाब से शायद घड़ियों के नाम पर जरुर सबसे महँगा तोहफा रहा होगा | होता भी क्यों नहीं तीन गाँव के चौधरी जो थे ससुरजी | और हमारा ही रुतबा कौनसा कम था, साहेब बहादुर का ख़िताब हाँसिल था पिताजी को अंग्रेजी हुकूमत से | दिन-रात का हुक्का पानी चला करता था कभी गोरों का हमारे यहाँ | अपने इलाके के सबसे बड़े धनकुबेर थे पिताजी | आह.. कहाँ गये दिन वो सारे कि अब तक उन उमंगों भरे माहौल को जीने की हसरतें बाकी हैं |
(2)
    अनायास ही सामने का द्वार खुलने से आये चौंधे ने ह्रदय को भी चौन्धियाकर जताया कि बुलावा यथार्थ का भिजवाया हुआ है | आ गये जी कल्पलोक छोड़ क्षणभंगुर हकीकी संसार में जहाँ स्वयं मैं भंगुर हो जाने की उम्र में बैठा सोच रहा था अब कौन आया मुझसे मिलने ? देखा तो क्या पाता हूँ मेरा बरसों पुराना यार खुराना जिसके साथ जाने कितने बरस स्याह-सफ़ेद करते गुजार दिए थे | दौलत बहुत देखी मगर अब वही दौलत औरों के पास जब नजर आती है तो दाँत पीसकर रह जाता हूँ कि क्यों कभी मेरे घर में बरसों पुरानी चीजों के बदलाव की उमर आयी ही नहीं | क्यों मेरी उस पुरानी इम्पाला में सिर्फ हॉर्न ही बजकर रह जाता है ? क्यों मेरे दोनों बच्चे अब मेरे नहीं वरन अपनी जोरुओं के संग रहा करते हैं ?
(3)
     उठा भुनभुनाता हुआ मगर सामने ना पहुंचकर तिरछे लहराता हुआ झौंका खा गया और बायीं दीवार के सहारे रुक पाया | खुराना ने कहा भी था "आ जाऊँगा काके तू ना उठ, अब तेरे बस का नहीं ज्यादा चलना लेकिन तू सुनता ही कहाँ है?" खैर सहारा दे मुझे भी ले आया और चिल्लाकर कहने लगा "ओ, भाभी जी एक चाय कड़क वाली" | अरे काहे की चाय, कल से एक ही थैली दूध घर में आया था उसी की चाय पिए जा रहे हैं पानी मिला-मिलकर, कब समझेगा ये फोकटिया | बिजनेस में एक साथ घटा हुआ था तभी से दोनों फाकों पर जी रहे हैं | काम के नाम पर कुछ बचा नहीं, जमा पूँजी कुछ बना नहीं पाए, ऊपर से ये पनौती, बड़े बाप की बेटी "तृप्ति" | राज गये पर ठाठ न गये | बाप दारू पीते-पीते यमलोक सिधार गया और बेटों के लक्खन बाप से कुछ कम न थे हो गये धंधे लंबे | इधर महारानी की किटी पार्टीज कम न होंगी | उधार लेकर भी शौक पूरी करेंगी फिर चाहे कुछ भी गिरौ रखना पड़ जाए | नासपीटी अब जाकर समझी है जब एक थैली दूध के सहारे कई दिन गुजारने पड़ते हैं और खाने के लिए बहाने से लोगों के घर मिलने जाना पड़ने लगा है | कभी दो पैसे प्रॉपर्टी कमीशन से मिल गये तो ठीक वरना भिखारी हमसे बेहतर नजर आते हैं |
(4)
     किसी को कह भी नहीं सकते किस दशा में हैं | बड़ी हवेली के मालिक जो हैं | सत्तर की उमर हो चली अब स्वास्थ्य भी कुछ साथ नहीं देता | तृप्ति भी अपने गंठिया और कमर को लेकर हाय-हाय करती नजर आती है | रोजाना किसी न किसी की ठुकुर-सुहाती (मनुहार) करके जीवन की जरूरतें पूरी कर रहे हैं | एक दिन बड़ा बेटा पुरुषोत्तम सिंह दनदनाता आया और बिरादरी में फ़ैल रही बदनामी को लेकर चार बात सुना गया | उसके चले जाने के बाद धीरे से मेरे मुँह से बोल फूटे "इतनी ही चिंता थी अपने मान की तो लोगों से भीख लेने के पहले खुद ही क्यों नहीं दे जाता?" पर सुने कौन? जाने वाला तो फुर्र |
(5)
     दीमक लगी किताबों के कई चट हो चुके कई पन्नों को अज्यूम करके पढ़ना होता था फिर भी पढ़ने की आदत छोड़ नहीं पाया, वो अलग बात है कि सही अज्यूम इसलिए हो पता था कि सारे पन्ने बीते बरसों में जाने कितनी ही बार लगभग कंठस्थ हो रखे थे | बुढिया से ठीक से बन नहीं पायी | शादी के कुछ साल बाद ही से अलग रह रहे हैं जो आज तक चल रहा है | पत्नी सुख क्या होता है ये बात सिर्फ नये शादीशुदा ही बता सकते हैं, पुराना होने पर तो वे भी हसरतों भरी नजर से औरों को बस ताकते भर रह जाते हैं | ऐसा ही कुछ कहना हमारी अर्धांगिनी का भी था फिर जाने कौन सही कौन गलत | बहुधा कहा करता किसी दिन बाहर जाऊँगा तो लौटकर मुँह देखने भी नहीं मिलेगा क्यों करती है इतनी हत्या? हर बार कहती बुढऊ तुम एक बार शहीद होकर तो दिखाओ, एक कतरा भी बहा दिया ना तो मेरा नाम नहीं |
(6)
     आज सुबह से ही मन कुछ विचलित सा हो रहा था | खुराना चला गया लेकिन अपने पीछे कई सारे अबूझ सवाल छोड़ गया | बोला कौन है जो तेरे साथ रहेगा? मान ले भगवान न करे तू अकेला रह गया या तृप्ति भाभी ही अकेली रह गयीं तो कौन होगा जो साथ होगा या काम आयेगा? और जिन्दा रहे तब भी कब तक दूसरों के यहाँ बहाने से पाए चाय-नाश्ते के सहारे पलते रहेंगे? कभी तो लोग दुत्कारेंगे या खुद हम ही नहीं जा पाएंगे कहीं | अशक्त हो जाने के बाद भी कभी माँ-पिताजी की परवाह नहीं की और अब जब अपना समय आया तो वे सारे दिन चलचित्र बन सामने गर्दिश कर गये | बेशक ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन घर के कोने में जरुर रखा था लेकिन ये पुरु और रिपु ने तो खाने तक की सुध नहीं ली | इज्जत के नाम सैंकडों दुहाई दे जाते हैं लेकिन कभी ये न सोचा कैसे पलेंगे दो अशक्त प्राणी |
(7)
     बड़ी देर से पेट में कुलबुल सी हो रही थी | उधर तृप्ति भी इसी अवस्था में अपने कमरे में करवटें बदल रही थी जो उसके चरमराते पुराने पलंग की आ रही आवाजों से समझ आ रहा था | जाने कितने अरसे बाद फिर से प्रेम और दयाभाव का प्रादुर्भाव हुआ अपनी अर्धांगिनी के लिए | बड़ा तरस आया बेचारी पर और पहली बार सीधे असल वजह बता किसी से माँगकर भरपेट भोजन की व्यवस्था करने हिलते शरीर के साथ बाहर को चल दिया | हवेली से निकलते ही किसी उद्दंड बालक की साईकिल से टकराते-टकराते बचा | मुझे लगा ही था कि अभी दर अधिक बुरी नहीं हुई है लेकिन जब कई दरों से बैरंग लौटना पड़ा तब जाकर समझ आया कि क्यों आये दिन बेटे अपनी इज्जत का हवाला लेकर दो बात सुना जाते थे |
(8)
     यूँ ही भटकते बड़े चौक तक जा निकला जहाँ सबसे ज्यादा ट्रैफ़िक और चहल-पहल रहा करती है | किनारे से चल ही रहा था कि किसी जल्दबाज के टकरा जाने से मिले धक्के ने पीछे से आ रही किसी गाड़ी से टक्कर का आयोजन करवा दिया | धडाक की आवाज ब्रेक्स की चरमराहट अचानक उठाई चीखें दर्द की गहरी लकीर दिमाग से कमर तक और एकदम से सब घुप्प | निहायत ही बुरी किस्म का सन्नाटा | अपनी जगह खड़े होकर देखता क्या हूँ कि हर कोई मुझसे कुछ दूर देखे जा रहा है और किसी को मेरी पड़ी नहीं जबकि अभी हाल ही ठुका था | फिर जैसे ही उस ओर देखा जहाँ लोग आकर्षित थे एकदम से साकत अपनी जगह सुन्न खड़ा रह गया | नीचे फैलते लहू के छोटे तालाब के ऊपर कोई और नहीं मैं ही पड़ा था निश्छल, साकत, पूरी तरह शांत | चेहरा सड़क से खाक चाटता नजर आ रहा था और अजीब तरीके से ऐंठा शरीर सामने ही तो पड़ा था | बमुश्किल यकीन आया कि वो अब मैं नहीं रहा और ये मैं जाने क्या बन गया हूँ | लोगों से बात करने की कोशिश की परन्तु जैसे किसी ने न देखा न सुना | बाद का घटनाक्रम शांत होकर अपनी आँखों से देखा |
(9)
     गाड़ी बुलाई गयी, छोटा शहर होने से लोगों को पता था सो शहादत गुमनाम नहीं रही और पार्थिव सीधे हवेली पहुँचा दिया गया | बुढिया जो अपने कमरे से कम ही निकलती थी लोगों का सहारा लिए चुपचाप बाहर आयी और एकटक नीचे पड़े मुझपर नजरें टिकाकर वहीं पास बैठ गयी | सीधा करके मुझे चित्त लिटाया गया था और आने वालों की संख्या बढती जा रही थी | पास की दीवार की टेक लगाये एकटक देखती तृप्ति से किसी ने कुछ कहा और प्रतिसाद न पाकर हिलाया तो लद्द से बेजान अपनी जगह पर लुढक गयी | सैंतालीस साला वैवाहिक जीवन खत्म हो जाने के बाद पता चला कि मेरे जाने का गम उसे इतना विकट होगा कि देखते ही देखते परिंदा बाद वह भी मुक्त हो लेगी | वहीं दूसरी तरफ धीमी आवाज में पुरुषोत्तम और रिपुदमन में सह-पत्नी हवेली के बंटवारे को लेकर बहस हो रही थी कि किस तरह बहन को हिस्सा ना देना पड़े और खुद भी आधे से अधिक कैसे पा जायें | सामने ही खुराना खड़ा था मेरा यार | एक उसी के ओठों पर मंद-मृदुल सी मुस्कराहट थी जैसे कह रहा हो "जाओ दोस्त तुमने मेरी बात को सुनकर ऐसा हल निकाल लिया जिसके बाद आने वाली कोई परेशानी तुम दोनों को छू भी न पायेगी"| फिर चुपचाप से आँखों के कोरों पर आयी दो बूंदों को रुमाल में समेटते वहाँ से निकल लिया |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (30-08-2012)
● Instant: +91-787-819-3320
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ढेर हूँ मैं मिटटी से बना



ढेर हूँ मैं मिटटी से बना
(1)
ढेर हूँ मैं मिटटी से बना,
भूल मुझे, मेरी भूल को वजह बना,
छोड़ बिखरता, परवाज यहाँ-वहाँ,
चल दिए उठकर तुम जाने किस राह?
(2)
है मोह तुम्हें अब भी इसे जानता हूँ,
खयाल अपना रखने को कहकर,
चल देने का खयाल क्यों निकाल न पाते हो,
ऐ हमसफ़र मेरे, चल देने का खयाल ही फिर,
क्यों मन में तुम ले आते हो ?
(3)
अपना न समझ पाए जिन्हें,
मरा उन्हें क्यों न जान पाए,
भूल जाना था मरने वालों को,
खास उन्हें जिन्हें अपना ही न समझ पाये,
(4)
समझो उसे कि ढेर था रेत का एक,
जिस पर कि फूँक तुमने थी दे मारी,
गया कहाँ उड़कर क्यों करते हो परवाह,
ढेर साथ है पूरा, या कि बिखर गया तुम्हें क्या,
(5)
छोड़ दीना जब टीला मिटटी का,
बिन बैठे भी उसके अंजाम का अब मोह कैसा?
क्यों कहते हो मिटटी से कि अपना ध्यान रखना?
मुर्दों संग जिया नहीं करते, जानते हो ना?
(6)
समझ लिया कम जिसे जीवन से,
मरे-जीये चाहे उसकी चिंता क्यों,
और तुम देखोगे, हर बार उड़कर,
हवा के झोंकों संग मैं ढेर बना,
जा जमने लगूंगा फिर तुम्हारे ही नीचे,
बैठ जाना उठकर फिर चाहे किसी और जगह...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (29-08-2012)
● Instant: +91-787-819-3320
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दोष किसे दें?

दोष किसे दें?

दोष किसे दें ऐ मेरे हमसफ़र,
जब साया ही साथ छोड़ने लगे,
तो अंधेरों को दोष कोई कैसे दे.....? :'(

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh
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बहरे लोग

बहरे लोग

कहते तो सब बातें हैं ये अश्क,
मगर सुना है आज,
बहरे कुछ ज्यादा ही होने लगे हैं संसार में........ :'(

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh
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अश्कों की जुबान

अश्कों की जुबान

अश्कों की जुबान कहाँ होती है दोस्त,
ख्वाब टूटें तो टूटें चाहे,
बेजुबान उन्हें बह जाना होता है.........

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh
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जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है?

जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है?

जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है...? ...(A songs line)
कुछ नहीं बस क़त्ल इरादों का किये जाना है... (Jogi)
Kiske iradon ka katal karna hai janab...? (एक दोस्त)
अपने ही इरादों का होगा और किसी का क्या करना है जी... (Jogi)
Koi khanjar wanjar hai ya...? (एक दोस्त)
क्या जरुरत...? सपने हमेशा बिना खंजर ही क़त्ल किये जाते हैं... :'( Jogi

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh
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जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है?SocialTwist Tell-a-Friend

विध्वंस

विध्वंस

● विध्वंस दूर से हमेशा खूबसूरत ही दिखाई देता है...... फिर चाहे वह परमाणु विस्फोट हो या कोई ज्यलामुखी या फिर और किसी तरह का......... वो जीवन में रिश्तों के नाश-रूप में भी नजर आ सकता है...... जबकि लोग समझते हैं कि जो हमने किया अच्छा ही किया....... शायद देखना भूल जाते हैं कि वे पास नहीं दूर खड़े हैं...........

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh

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तटस्थ आँखें

तटस्थ आँखें

तटस्थ,
कोने में,
विलग दुनिया से,
खड़ी अकेली,
दुनिया को निहारती आँखें.....

जोगी...
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जज़्बा-ऐ-दिल

जज़्बा-ऐ-दिल

जज़्बा-ऐ-दिल की कुछ ना कहो ऐ दोस्त......
मेरे दिल के जखम हैं कुछ इस कदर कि.......
न सहते होता है और न भरते होता है........

............(जोगी)
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अपनापन (लघुकथा)


अपनापन (लघुकथा) ●

[1]

● आज शाम यूँही उदास मन मूक बना स्तंभित अपने नये किराये के मकान की बालकॉनी से अस्पष्ट सी दिशा की ओर एकटक निहारे जा रहा था कि कहीं से भागता छोटा सा एक बालक वातावरण की निस्तब्धता को भंग कर गया | अचकचाकर सम्हलकर चारों तरफ घुमा नज़रें एक बार फिर उसी दिशा में टिका दीं परन्तु इस बार बनने वाले दृश्य रेटिना पर भी सुस्पष्ट थे | सामने दिखाई देने वाली मारुतीधाम सोसाइटी के बीच से निकली गली के आखिरी सिरे पर दीवालीपुरा गार्डन की दीवार पार से झूलते बच्चे साफ नजर आ रहे थे | नीचे हरियाली से आच्छादित सड़क से गुजरती किसी अम्माजी की बगल में कमर पर लटका बिलखता दूधमुँहा साफ दृष्टिगोचर हो रहा था | लेकिन मेरे ह्रदयपटल पर किसी बात का कोई प्रभाव पड़ता प्रतीत नहीं होता था | होता भी कैसे ? हाल ही तो अपने सोचने के तरीके पर अनकहा आक्षेप पाकर आ रहा था | वह भी उसके हाथों जिसके होने न होने से जीवन में गंभीर बदलाव आ जाया करते थे | कितना समझाया मगर जैसे कोई समझने को तैयार ही नहीं | सभी के सोचने का अपना एक तरीका हुआ करता है तो उसका भी अपना था कुछ मैं किसी को अपने अनुसार सोचने पर बाध्य तो नहीं कर सकता ना | परन्तु जब कोई मन को समझाने के स्थान पर तर्कों से बातों को परखना चाहे तो क्योंकर समझ दिशा बदलेगी ?

[2]

● यही सब सोचते साँझ हो चली कि सामने क्या देखता हूँ दो स्वान आपस में भावों का आदान-प्रदान करते नजर आये, जैसे मूक अंदाज में एक दूसरे को अपने मन की कही-अनकही समझाने में लगे हों | जाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे उनमें भी किसी तरह का मतभेद चल रहा हो | नर स्वान बार-2 अपनी मादा के पास आने का यत्न करता और कुछ ही क्षणों में मादा द्वारा खदेड़ दिया जाता, कभी भौंके जाने द्वारा तो कभी सीधे आक्रामक मुद्रा अख्तियार करने की वजह से | हर बार स्वान पास आकर धीरे से निकटता पाने की कोशिश करता | हौले से बैठकर उसकी ओर मासूम निगाहों से बेबसी के साथ कुछ यूँ ताकता जैसे कह रहा हो 'तुम्हें समझ लेना चाहिए, कि अभी मुझे तुम्हारे साथ की जरुरत ताउम्र लगने वाली है, या शायद तुम भी साथ की जरुरत महसूस करती हो' | मगर उसने तो जैसे सुनना ही न था | हर बार, बार-बार धकियाया हुआ बेचारा कुक्कुर वहीं आस-पास मंडराता रहा, शायद कोई आस रही होगी कि तब न सही अब नाराजगी कुछ कम हो चुकी हो |

[3]

● उनकी इस बातचीत को अपनी कल्पना के माध्यम से बुनते हुए खुद को उन्हीं में से एक परिकल्पित करने लगा था और उस अबोली भाषा को तर्कसंगत बनाते तकते नयन मुझे अपने ही लगने लगे जैसे मैं स्वयं अगले दो पंजों के बल खुद को ऊपर की ओर उठा थूथनी सामने किये नये सिरे से मेल की उम्मीद में टकटकी लगाये बैठ हूँ | कुछ अपनी कुछ उनकी अनुभूति के बीच नुक्कड़ वाले उस खम्भे के पास से जिसके निकट यह सारी कवायद हो रही थी के पास से जाने कितने दुपहिये-चौपहिये निकल गये और जाने कितने पैदल असंबद्ध से निकल गये |

[4]

● सारी कवायद में खोया स्वप्निल दुनिया से तब निकला जब उस मादा ने एक और बार गुर्राकर नर को सामने की ओर खदेड़ दिया | उचटकर भागते कुक्कुर ने सीधी उछल ली और सड़क के बीच से होता किनारे की ओर भागा, लेकिन अभागा उस एक्टिवा स्कूटर से नहीं बच पाया जो उसे बचने की कोशिश में खुद एक किनारे से जा भिड़ा था | जाने किस तरह की कैसी भिडंत थी कि कुछ पल पहले तक जो कुक्कुर अपने चार पाँवों पर दौड़ता भागा फिर रहा था वही अब अपनी तीन टांगों के सहारे उठने की कोशिश में था | चौथी टांग एकदम सीधी हुई पड़ी थी जैसे उसे मोड पाना या उसके बल अपना शरीर उठा पाना उसके बस की बात ही ना रही हो | सीधी भी कहाँ बल्कि आखिरी टांग अपने असली आकार से कुछ पीछे को ऐंठी हुई सी लग रही थी जैसे किसी ने मूल आकार में आमूलचूल परिवर्तन कर दिए हों और उसका प्रयोग असफल हो गया हो |

[5]

● पीड़ा से कराहता कुत्ता बेरहम टायर जिसने उसे कुचला था से परे जाने की कोशिश में वहीं अपनी जगह घिसटकर रह गया | उधर स्कूटर सवार एक कम उम्र लड़की थी, रही होगी कुछ बीस के आस-पास | उक्त घटनाक्रम से उसकी बोलती भी बंद और वहाँ से गुजरते किसी राहगीर ने सांत्वना देते हुए उसे वहाँ से निकल जाने के लिए कहा और अगले ही पल लड़की यह जा और वह जा | सब इतने कम समय में हुआ कि इससे उबरने में मुझे कुछ पल लग गये | फुर्ती से सीढियाँ उतरकर सीधा कुक्कुर के पास पहुँचा | सबसे पहले उसे सड़क से हटा दीवार के सहारे किया और जस्ट-डायल से नंबर लेकर म्युन्सिपैलिटी में फोन किया | पानी पिलाकर कुछ बिस्किट्स रखे और देखा मादा अपनी जगह अब भी विराजमान है | अंतर सिर्फ इतना था कि अब उसकी आँखों में कुछ नमी सी नजर आ रही थी | जाने कैसा जज़्बा था कि सारी कवायद करके भी जिस अपनेपन को न पा सका वह अपनापन एक पाँव गंवाते ही पके फल समान झोली में आ गिरा | 
और अपनी जगह खड़ा मैं सोच रहा था 'क्या मुझे भी अब अपना एक पाँव गंवाना होगा' ?

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (19-07-2012)

http://web-acu.com/
http://acu5.weebly.com/
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हलचल


हलचल


क्या जाने क्या हिस्से आया, क्या ना आया,
खड़े हैं अब तक निस्तब्ध-मूक-अविचल,
कौन जाने होगी कब जाकर फिर ह्रदय-हलचल.....

 Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह  :(


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एक बूंद आँसू

एक बूंद आँसू

एक बूंद आँसू,
दूजी नाली का पानी,
किसेफरक पड़ जाना है,
ना इसे किसी ने देखा,
ना उसे किसी ने देखा...

जोगेन्द्र सिंह


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तडप

तडप...

सपने उनके, आँख हमारी,
नींद उनकी, जाग हमारी,
पीर उनकी, नम आँख हमारी,
अमानत किसी की,  तडप हमारी..... जोगी..... :-(
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सच्ची साधना

सच्ची साधना....... 



● सच्ची साधना....... हाँ, यही तो है वह , जिसे करने से बहुधा हम बच लिया करते हैं........ कितने कमाल की बात है ना, कि जागृत होने के लिए हमें प्रेरक प्रसंगों की जरुरत हुआ करती है....... और हम जागते भी कितना हैं........? कुछ क्षण.....? कुछ घंटे.....? या कुछ दिन.....? ना..... कतई ना..... हम जगे ही कहाँ होते हैं..... शायद सपने ऐसे ही असर रखते हों....... 


 जोगी...
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बेवफा

० बेवफा ०

जिन्दगी है जी, बेवफा है...
तू बेवफा, तो कभी मैं बेवफा...

० जगेन्द्र सिंह ०
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लापता

० लापता ०

जब से तुम्हें मंजिल जान दर-दर खोजा किया,
क्या जानो पता खोजते हो गये अब हम भी लापता...

० जोगेन्द्र सिंह...
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शिकवा

० शिकवा ०

गर चाहे कोई शिकवा करना.....
तब भी सुना है पत्थरों से शिकायत नहीं होती...

० जोगेन्द्र सिंह ०
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शुकर था

० शुकर था ०

मुश्किल है किसी से ये कहना,
किस कदर हुआ दिल तार-तार अपना,
वो तो शुकर था मेरी आँख ही बह निकली,
वरना आज भी वो चल देते फिर एक बार मुस्कुराकर..

० जोगेन्द्र सिंह ०

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जिन्दगी


क्या है जरुरत किसी को भूल जाने की,
जिन्दगी ही जब किसी संग इकसार हो जाने लगे..

जोगेन्द्र सिंह :-)

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कोई बिखर कैसे सकता है...?

कोई बिखर कैसे सकता है..?

कोई बिखर कैसे सकता है...
गर हो कोई अपना साथ हमारे,
जो हो वादा यह उमर भर के साथ का,
कयामत भी कैसे फिर कजा ला पायेगी...

जोगी (06/05/2012)
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काश.. ये बुढिया जवान होती..!!

● काश.. ये बुढिया जवान होती..!! ● 


कोई बुढिया अगर चिलचिलाती धूप में ट्रैफ़िक सिग्नल पर कुछ बेचती नजर आ जाए तो इसे कोई कैसे रोक सकता है जब इसके अपने ही इसे बाहर का रास्ता दिखा चुके हों... रेयर केस में इनकी मज़बूरी परिवार चलाना रहती होगी वरना अक्सर घरेलू मानसिक अवहेलना या प्रताड़ना ही एक कारण हो सकती है जिसके चलते ऐसे लाचारों को पेट की खातिर आराम करने की उम्र में भी काम करना या सामान बेचना पड़ता होगा... जो कारें इनको इग्नोर करके चल देती हैं उनकी अपनी समस्याएं होंगी... किसी के काँच गहरे होंगे तो किसी के गोगल्स गहरे कलर के रहे होंगे... वहीं अपने मतलब की चीजें गहरे काँच के पीछे से देखने की कला सभी सीख जाते हैं... काश...ये बुढिया जवान होती.....

जोगी ..... :'(
( 21-04-2012 )

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हवा का झौंका


हवा का झौंका


हवा का झौंका ,,,
ज्यों आता , त्यों चला जाता है ...
न रूप न रंग , बस तुम ही सा नजर आता है ...


जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (18-04-2012)

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बेघर अरमान


बेघर अरमान


अरमानों का क्या है जी.......
वो तो होते ही हैं बाजारों के खैरख्वाह......
इन्हें हावी न होने दो दिल पर........
उनका बेघर होना फिर वक्ती रस्म रह जाना है.......

Jogendra Singh ( जोगेन्द्र सिंह ) 11-04-2012
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ज़हानत


ज़हानत


कितने ज़हीन हो तुम ,
हर शै को समझते हो तुम,
जज्बातों को भी समझते हो तुम,
फिर खेल उन्हीं संग क्यों जाते हो..?

● जोगी 09-04-2012

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अब यहाँ आने का दिल नहीं करता


अब यहाँ आने का दिल नहीं करता ● 

अब यहाँ आने का दिल नहीं करता,
यहीं कहीं दबी हैं, आस-पास मेरी यादें,
सुमधुर कुछ विलगाव से भारी यादें,
कुछ कुंद-भौंथरी-प्रखर सी यादें हमारी,
बुना था काप्पुस से जहाँ इक नीड हमारा,

कुहुक के स्वरों से सजा एक आशियाना,
यहीं तो रचा बसा था वह उपवन,
जहाँ उदर क्षुधा से क्षुब्ध,
कीट खोजती हुट्टूटी के पंजों के,
चिह्नों सजा था एक सपनीला आंगन,
हाँ वही जो था हमारे सपनों से सजा नीड,
वही जो भ्रमित क़दमों तले यहीं रौंदा गया,

चूने-गारे से बने सदियों टिके मजबूत महल,
किस कदर एक झोंके भर से भरभरा जाते हैं,
फिर राख ही क्या बुरी थी उन्हें बनाने को,
भरभराने के बाद बनना उन्हें राख ही तो था,
नींव का एक पत्थर कम रह गया था शायद,
अन्यथा हमने कोई कसर भी तो न छोड़ी थी,

वाकई अब यहाँ आने का मन नहीं करता,
कि यहाँ मैं और तुम तो हैं लेकिन,
वो आशियाना, वो नयनाभिराम नीड हमारा,
बस एक वही है जो बिखरा नजर आता है,

बिखरे घरौंदे के भग्नावशेषों बीच कहीं,
खुद को खंड-खंड बिखरा पड़ा पाता हूँ,
बैठा हूँ जाने कब से जड़वत यहीं सामने,
इस आस में कि तुम आकर कह जाओ,
अब न रहा वह भ्रम है बाकी और,
न वह खलिश है मन में बाकी रही,

टकटकी लगाये नैन सूख चले मेरे,
इस बार शायद तुम न आओ,
कुंद बातों को प्रखर बना दिल पे लेने की,
आदत जो है तुम्हें,
शायद फिर एक चाँद और चकोर होगा,
निहारेगा चकोर तुम्हें और तुम चल देना,
तिमिर भरे अंतरालिक अपने नित्य पथ पर..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh (08-04-2012)
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सूरत-ऐ-हालात



● सूरत-ऐ-हालात ● ©

जाने कितना समझाया बेबस दिल को,
बेकस दिल पे रहम किसी को न आया ||
सूरत- ऐ -हालात इतने संगीन न होते,
हमारी खताएं जो वो मुआफ कर जाते ||


● Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह (07-04-2012)
http://web-acu.com/
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गुड्ड वाली नाईट Good Knight

गुड्ड वाली नाईट Good Knight


जे चक्कर क्या हो रिया है बंधु.............?

जिसे देखो वही सोने चल दिया है बंधु........?

जा जाके जाने फिर कैसे आ रिया है बंधु............?

गुड्ड वाली नाईट बोले बगैर कैसे जा रिया है बंधु........? ● जोगी

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क्यूँ आज भी ?


● क्यूँ आज भी ? ●

क्यूँ पाकर भी आज अधूरे हैं हम दोनों...........?
क्यूँ मिलकर भी बिछड़े से हैं हम दोनों..............?
क्यूँ आज भी धुँध से अक्स बनाते हैं हम दोनों...........?
क्यूँ आज भी सर्द हवाओं से डर जाते हैं हम दोनों..............?

...●... जोगी ● 19-03-2012

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ढक्कन बाबा की जय


ढक्कन बाबा की जय ● © (हास्य-व्यंग्य कहानी)


● ढक्कन बाबा की जय ● © (हास्य कहानी)
(मुख्य पात्र : विशाल, हरबंस गुप्ता, अपर्णा, रामेश्वर, संजीव, रश्मि)
Instant talk for commercial writing ●>  +91-900-404-4110
[ १ ]
     एम.ए. पास टेलेंटेड नौजवान विशाल आज अपने जीवन के सबसे अहम इंटरव्यू के लिए कमर कसे बैठा था | आज पास होना उसके लिए उतना ही जरुरी था जितना किसी भूखे के लिए रोटी का टुकड़ा | सामने सोफे पर धँसे फंसे बुजुर्गवार हरबंस गुप्ता ने ज्यों ही पहला प्रश्न उछाला लपक के उससे पहले ही विशाल का जवाब था- "चिंता न करें अंकल अपर्णा मेरे साथ हमेशा सुखी रहेगी | कभी उसे किसी तरह की कमी नहीं होने दूँगा उसके लिए मुझे चाहे कितने ही झंझावातों से गुजरना पड़े"| अंकल ने कुछ यूं घूर के देखा जैसे नजरों ही से कच्चा चबा जायेंगे | क्यों न घूरते सवाल के बिना आया जवाब कौन है जो पसंद कर लेता | हुलिया उनका कुछ यूं रहा- "बिचकी सी आँखें जिनपर रखी कम ऊँचाई की ऐनक जैसे वो आँखों से छोटेपन की शर्त लगा जीतने की फ़िराक में हों, मस्तक पर शंकरी चार आडी लाईनें चेहरे के रुबाब को बढाती ही थीं, ऊपर से नीचे को सपाट आती नासा के अग्र भाग का फैला होना इस प्रकार था जैसे किसी ने धम्म से घूंसा ठांसकर पिचका दी हो, ओंठ सामान्य थे मगर बड़े लम्बुतरे चेहरे में कुछ पतले प्रतीत होते थे और उनका मटमैला गहरा वर्ण उनके लगातार सिगरेट पीने की आदत को दिखाता था जिसे बीते आधे घंटे में पूरी तीन बार सुलगाकर उन्होंने साबित भी किया, नैनों से टपकती धूर्तता पुराने महाजनी के व्यापार को छुपाने में नाकाम रही, मोटे गले से नीचे को आते वक्त कहने को बहुत कुछ था लेकिन ज्यादा नहीं देखकर पेट ही पर अटक जाते हैं जिसकी अचानक आयी ऊँचाई ने ऊपर से आती नजरों की तेज रफ़्तार फिसलन को भी ब्रेक थमा दिए और उस नाशपाती समान धँसके-लटके गोल पेट तक जाकर हुलिए की बयानी को फुल स्टॉप लगा दिया"| अपनी बड़ी बेटी अपर्णा के लिए विशाल को पसंद करने आये थे आज लेकिन उनके लिए प्रश्नोत्तर भी संभवतः व्यापार हुआ करते थे | यूं तो कोई कमी न थी विशाल में परन्तु दो बहनों के होने से प्रश्नों में बेटी के सीक्योर भविष्य की चिंता साफ झलका गये और बदले में विशाल को अपनी नौकरी के लिए दिया पहला इंटरव्यू इससे कहीं ज्यादा सुगम जान पड़ा |
[ २ ]
     मुँह के आगे बिछी टेबल पर छरहरे बदन वाली पच्चीस वर्षीया खूबसूरत कल्पलोक की नायिका सी अपर्णा कागद रूप धर पड़ी नजर आ रही थी और सामने से हिटलरी अंदाज में जिरह | जाने किसे देखूँ किसे जवाब दूँ यह सोचते समझते टेबल व सामने देखने के बीच उलझा जाने कितने सवालों को अजीब लगने वाले जवाबों से शुशोभित करता चला गया | परिणामतः विशाल की अपर्णा से उतनी ही दूरी भी बढती चली गयी | एक सवाल तो इतने कमाल का जिसने होश ही उड़ा दिए उसके | हिसाब लगाकर पिछले पाँच साल की कमाई जोड़कर बोले- "इतना रूपया तो होगा ही तुम्हारे पास? कहीं बैंक में, कैश या किसी और तरह?" सुनकर विशाल को गुस्सा आ गया | तपाक से कहा उसने- "हाँजी है, सारा पैसा थाली में सजाकर रखा है | आपकी बेटी आयेगी तो उसके राज में भी यही काम कर दिखाऊंगा | खाना-पीना, ओढना-पहनना, आना-जाना ये सब खर्चे तो आप दे ही देंगे आकर ! हमें करना ही क्या है? कमाई तो ससुरी सगरी बैंक में ही जानी है"| भड़क गये, कहने लगे- "रामेश्वर जी ! क्या इसी बेइज्जती के लिए आप लड़की वालों को बुलाते हैं ? किसी की कोई इज्जत नहीं क्या ? शरम आनी चाहिए आप लोगों को जो घर आये मेहमान के साथ ऐसी बदजुबानी करवाया करते हैं | और ऐसे बदतमीज बददिमाग लड़के से मैं अपनी बेटी तो क्या कोई अपनी कुतिया भी न ब्याहेगा"| इसके साथ ही फोटो टेबल पर भूल उठकर चल दिए |
[ ३ ]
     सन्नाये से बाप-बेटे उसी मुद्रा में साकत हुए रह गये | शून्य में घूरती विशाल की आँखें पूर्णतः शून्य को नहीं पा सकी थीं | उनमें गर्दिश कर रही थी टेबल पर पड़ी अपर्णा की वह फोटो जिसने पहली नजर का तीर बन दिखाया था | सकता पहले रामेश्वर पर से टूटा, सीधे द्वार को भागे कहीं बच्चू हाथ लग जायें तो कुछ खरी-खोटी सुना आऊँ मगर तक़दीर के खेल उनकी दौड से तेज निकले और हरबंस गुप्ता जी का स्कूटर यह जा और वह जा | हाथी देखते ही एवं उसके गुजरने पर जिस तरह कुत्तों का भौंकना शुरू हो जाता है ठीक वैसे ही रामेश्वर जी के श्रीमुख से अमृतरस बरस रहा था पर सुनता ही कौन था इसे | तिरछे सामने वाले घर की खिडकी फटाक से बंद हुई तब जाकर तन्द्रा लौटी | भीतर आकर दूनी भडकन से फिर शुरू हो गये "नासपीटे, घुस जा इस फोटू में, बाप की इज्जत भरे बाजार लुटाकर कलेजा ठंडा नहीं हुआ जो अब इस कागद की चिंदी पे लट्टू हुए जाता है? ला इधर"| कहते हुए फोटो के चार टूंक यों किये जैसे जीती छोरी को ही चीरे जाते हों | वहीं सामने बैठे विशाल को लगा जैसे फोटो नहीं उसके दिल के टुकड़े चार हुए जा रहे हों |
[ ४ ]
     थोड़ी देर बाद डस्टबिन से बीने गये चारों टुकड़े विशाल के व्यक्तिगत कमरे में मौजूद टेबल की शोभा कुछ यूं बढ़ा रहे थे जैसे वो कोई ऑपरेशन टेबल हो और वहाँ अपर्णा का चिरा हुआ शरीर फिर टाँक दिया जाना हो | कांपते हाथों संग ट्रांसपरेंट टेप का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए फिर जुड गयी अपर्णा और हर्ष से अपना विशाल एकदम बावला हुआ जाता था | कुछ देर पहले का जोश अब ठंडा हो चुका था, उस पर कन्या कुंवारी अधिक भारी प्रतीत होने लगी थी | सम्बन्ध टूट जाने के दुःख ने ऑफिस से तीन दिन बिना खबर दिए गायब करवा दिया | फोन बंद, दिमाग बंद, सब बंद | तीसरे दिन जैसे बिजली का करंट लगा हो ऐसे भागता हुआ सीधे अपने कंप्यूटर पर जा चिपका वह तो शुकर है किसी ने देखा नहीं वरना बिजली से छुड़ाने के बहाने ज्यादा नहीं तब भी दो-चार डंडे तो रसीद हो ही गये होते | फेसबुक, ट्विटर, लिंक्ड-इन, ऑरकुट और जाने कहाँ-2 नहीं छान मारा | वे सारी जानकारियाँ सर्च में इस्तेमाल कर डालीं जो संभावित ससुरजी भूलवश छोड़ गये थे |
[ ५ ]
     आखिरकार फेसबुक पर मिली, परन्तु प्रोफाईल फोटो मैच नहीं हो पायी लेकिन जानकारियाँ बाकी सब टिंच लग रही थीं | आव देखा न ताव भेज दी रिक्वेस्ट, नसीब इतना जोरदार तुरंत एक्सेप्ट भी हो गयी | ऑनलाइन जानकर उससे पंचायती भी शुरू हो गयी, सारी जानकारियाँ अपने पहलु पर झाड़ू मारकर अपर्णा के इनबॉक्स में पेल दीं | एक तो बंदा स्मार्ट और ऊपर से ठीक-ठाक जॉब, पूरी तरह इग्नोर कैसे कर देती, पापा का क्या है पहले ही से जानती है कि नंबरी खडूस हैं | बड़ी बहन का रिश्ता ही लगभग बुढ़ापे में प्रवेश करते तय किया था, जाने उसके साथ क्या करते? अपने-अपने कमरों में बंद होने के बाद क्या गुल खिला रहे थे कोई न जान पाया | इधर दोनों घरों में रिश्तों की बाढ़ आ रखी थी मगर अब तक विशाल को अपर्णा का विकल्प सा कुछ नजर नहीं आया | यही हाल हरबंस गुप्ता जी के घर का भी था, कई लड़के देखे लेकिन कोई भी अपनी समूची कमाई रकम बैंक में नहीं दिखा पाया |
[ ६ ]
     अचानक से विशाल को लगने लगा यदि उसका प्रेम (पता नहीं पंचायती को प्रेम कैसे समझ बैठा) नहीं मिला तो रो-रोकर अपनी जान दे देगा | पता चलने पर अपर्णा ने बिना मरे ही उसकी सच्चाई का यकीन कर लिया और प्रेम के भरोसे उसी शाम भिड गयी पिता हरबंस गुप्ता से | ताने-विताने, चुटिया तक खींचकर लंबी कर दी गयी गयी मगर हरबंस जी ने न मानना था न माने | आखिरी हमले के तौर पर घर छोड़ भागकर शादी कर लेने की धमकी पर कुछ नरम पड़े लेकिन अकड अभी बाकी थी, खाते के रुपये देखने की साध पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी | कहने लगे "पूरी ना सही आधी तनख्वाह ही दिखा दे | बनिए की छोरी से ब्याहेगा, पैसे जोड़ना नहीं सीखेगा तो और क्या है जिसके बल शादी पा पायेगा?"
[ ७ ]
     अगला दिन, रामेश्वर जी के घर सुबह ग्यारह बजे का माहौल कुछ इस तरह का था - बाएं सोफे पर पिछली बार ही की तरह धँसे फंसे बुजुर्गवार हरबंस गुप्ता अपने मुँह से धुँए के बगोले उड़ाते नये प्रश्न जड़ते चले जा रहे थे और रामेश्वर जी चुपचाप बिना जवाब दिए अपनी जगह जमे बैठे थे | चेहरा एक ही दिशा में जड़ हो रखा था जैसे कसम खा रखी हो इस चेहरे के सिवा कुछ और है ही नहीं जिसे देखाने की चाहत हो | वहीं विशाल नये सिरे से इंटरव्यू में पास होने की कोशिशों में आज एक बार फिर अपनी तैयारियों को अन्जामित होते देख रहा था | जैसे ही हरबंस गुप्ता ने रिश्ते पर मोहर लगायी रामेश्वर जी के चेहरे और गिरगिट नामक जंतु के सारे बदलते रंग आपस में गड्ड-मड्ड होने लगे | बिना वक्त गंवाए उन्होंने हरबंस जी को हाथ पकड़कर चौखट से बाहर का रास्ता दिखा दिया | अजी मौका कैसे छोड़ देते बदला लेने का, पिछली बार तो जनाब इनके बाहर पहुँचने से पहले ही चम्पत हो लिए थे, अब कोई आकर बचाए इन्हें | हरबंस जी दीन दुनिया से बेखबर बेदिमाग से खिंचे चले जा रहे थे जैसे किसी की नाक पर मुक्का मार दिया जाए तो किस तरह दिमाग कुछ क्षणों के लिए कुंद अथवा निष्क्रिय सा हो जाता है बस उसी तरह हरबंस गुप्ता जी का दिमाग भी संभवतः अंतरिक्ष की किसी निहारिका (आकाश-गंगा) में परवाज करने गया होगा | होश आया तो घर के द्वार पर खड़े शरीर को मानसिक शक्तियों के जोर से बिलकुल बेदम सा पाया | क्यों न होता बेदम? बेइज्जती का जो स्वाद अब तक दूजों को चखाते आये हैं वही अब उनकी अपनी जिव्हा पाए बैठी थी | कुछ कहने की कोशिश करी मगर मस्तिष्क की वे वाली तंत्रिकाएँ अधिक सक्रीय थीं जिनमें निकाले जाने का दृश्य रिपीट मोड में दिखाई दे रहा था | गुस्से और शर्मिंदगी की अधिकता से फूलते-पिचकते नथुनों से निकलती तीव्र वायु के कारण किसी बैल से कम नजर नहीं आ रहे थे, जाने कैसे बस किया वरना साधारण कद काठी वाले रामेश्वर जी का तो सच ही रामपुरी का टिकट कट लिया होता | लिहाजा लौटकर घर को आये और फिर एक बार अपर्णा की चुटिया लंबी कर दी गयी | इस बार छोरी के शरीर के दूसरे अंग भी दरद दे रहे थे | कई अंग भीतरी रूप से आपस में बेताली ताल मिलाये जा रहे थे |
[ ८ ]
     अकड़ी गर्दन लिए रामेश्वर जी ने अन्तःपुर में प्रवेश किया और लगे डींगें हाँकने, किस तरह उस दबंग आदमी की दुर्गत मचाई जिनकी सारा नहीं तो तिहाई शहर अवश्य दबंगई मानता होगा |  विशाल की हिम्मत नहीं पड़ी अन्तःपुर में प्रवेश की वह सीधा सोसाइटी पार्क के पीछे बहने वाले नाले पर रखे लंबे पत्थर वाली पटड़ी पर जा मातम मानाने में व्यस्त हो गया | प्रेम हार चुका था, प्रेमिका के पिता की नाक (इज्जत) बह निकली थी, कुछ दिन पहले अपनी और अपने बाप की नाक से बहते नाले दिखाई न दिए हों मगर ससुरजी की बात ही कुछ और थी | शाम का समय था इसी पटडे पर यार लोगों की बैठक जमा करती थी | नीचे बहता-रुका गंदले पानी को समेटे संकरा नाला और ऊपर तीन से पाँच दोस्त रोजाना हाथों में बोतलें लिए कै-किलबिल में लगे होते | एकाध बार इस नाले की डुबकी लेकर भी घर को जा चुके हैं कि होश का दमन छूटते ही सुध कहाँ रह जाती है | दुर्भाग्य से आज एक ही दोस्त आया था लेकिन माल पूरा था भाई के पास, आते ही शुरू को गये दोनों और दुखड़े को गाने में घंटा निकल गया | पूरे सवा घंटे बाद जब संजीव (दोस्त) ने अपर्णा का नाम सुना तो बगल में बैठे देसी आवारा कुत्ते से बाजी लेते उसके कान खड़े हो गये | कहने लगा- "ये वही अपर्णा है ना जिसका बाप हिटलर की पीढ़ी का है? जो नूतन कॉलेज के लास्ट इयर में पढ़ रही है? जिसके फेसबुक अकाउंट में ताजा फोटो एक बिलौंटी की है?" चमक कर विशाल ने कहा "हाँ-हाँ संजीव, ये वही है"| संजीव ने कहा-"कमीने तू दोस्त नहीं दोस्त के नाम पर कलंक है, पिछले एक साल से मेरा उसके साथ अफेयर चल रहा था, अचानक बोलती है उसे कोई बढ़िया नौकरी वाला लड़का बाप ने देख दिया है | वो लीचड तू निकलेगा मैंने सोचा तक नहीं था"|
[ ९ ]
     "धोखेबाज़, तूने मेरी लौंडिया उड़ाई है और मैं सोचे बैठा था जिस दिन उस नामुराद का पता मिलेगा उसका जीना मारना एक कर दूँगा"| इसी के साथ घूंसे की शक्ल में संजीव का बायाँ हाथ नशे की पिन्नक में झूमते विशाल के कान के ठीक नीचे जबड़े की जड़ में पड़ा | प्रत्युत्तर में गिरते-गिरते भी विशाल ने बाँहों से संजीव की कौली भर ली | क्षणों में दोनों नाले में पड़े कर्दम (कीचड़) संग होली मना रहे थे | लोटपोट होते कितनी कीचड़ आँख-नाक में गयी और कितनी मुँह से थूकनी पड़ी दोनों में से कोई न जान पाया | रोजाना इनके दारू के चखने से बोटियाँ पाने वाले कुत्ते मोती को शायद यह सब पसंद नहीं आया सो उसकी भऊ भऊ की आवाज भी इन दोनों के सुरों में मिलती चली गयी | थोड़ी देर बाद गिरते-पड़ते-लड़खड़ाते निकले बाहर और एक दूसरे को कानों से कीड़े झाड़ने में सक्षम शब्दावली से नवाजते हुए धीरे से उठकर अपने अपने घरों की राह चल दिए |
[ १० ]
     माँ बोली- "नासपीटे, अब तक तो झूमता ही आता था और अब ये ज़माने भर की कीचड़ भी साथ लाने लगा?" दो झापड ज़माने का मन होकर भी माँ ऐसा करने की हिम्मत न जुटा पायीं, ऐसी विष्ठा से भरे चेहरे को छूने भर की भी इच्छा कौन कर सकेगा? घिन और बदबू से कै आने को थी, अपने नसीब को कोसते हुए नहाने की हिदायद देकर चलती बनीं | नहाते वक्त कई जगहों पर हाथ नहीं फेरा जा रहा था, दर्द भरी ऐंठन से सारा शरीर टूटा जा रहा था | नहाकर सबसे पहले शीशे में निहारा खुदको, अपने सूजे थोबड़े को देख संशय में पड़ गया कि मारा तो मैंने ज्यादा था पर ये परसादी मेरे हिस्से ज्यादा कैसे कैसे आ गयी? बाहर गया तो फिर एक झोंका माँ-बाप के जोड़े के श्रीमुख से निकले प्रवचनों का आया, जिस गति से बाहर आया था दूनी रफ़्तार से भीतर भी समा गया |
[ ११ ]
     कमरा बंद करके विशाल ने फोन लगाकर पूछा जरुरत क्या थी तेरे बाप को एक बार फिर नौटंकी वाले तरीकों से बात करने की? और ये संजीव शुक्ला का क्या चक्कर था तेरे साथ? एक पल को तो अपर्णा सुट्ट खींच गयी लेकिन जवाब तो देना ही था और चोटी का लम्बापन सिर की खाल को हजारों छिद्रों पर से दुखाये जा रहा था सो यह जान कि इस रिश्ते का कोई अंजाम नहीं भड़क पड़ी- "तुमने मुझे खरीदकर कोई लौंडी बांदी बना रखा है क्या जो मैं तुम्हारी हर बात का जवाब दूँ? दो कौड़ी का आदमी और उसके लिए इतनी तकलीफें झेलो? अब झेले मेरी जूती | तेरे बाप की प्रोपर्टी और तेरी नौकरी देखकर तुझे हाँ की थी वरना अच्छी सूरत तो हर गली में एक मिल जाती मुझे | आज के बाद फोन करने की जुर्रत तक न करना वरना कुत्ते छुडवा दूंगी |" इतना बोल काट दिया फोन | अपनी जगह साकत कुछ सोचने से लाचार खड़ा नसीब को कोसने लगा | हाय रे! मेरे ही मत्थे पड़ने थे इत्ते सारे दुष्ट? ओये! नरक मिलेगा सालों, कीड़े पड़ेंगे सबको (भूल गया था कि उनमे एक उसका बाप भी था) |
[ १२ ]
     भरपेट बददुआएं दे चुकने के पश्चात दरवाजा खोलकर स्टोररूम से बेगोन-स्प्रे की बोतल उठा लाया | सुसाइड करूँगा सोचकर ढक्कन खोलकर बोतल मुँह से लगाने का प्रयास किया परन्तु मरने के लिए भी हिम्मत चाहिए होती है, हिम्मत कम होने से अधपका इरादा ढक्कन चाटने जितनी दूरी ही तय कर पाया कि ढक्कन पर भी कभी न कभी बेगोन लिक्विड लगा ही होगा | अरे भईया बिना बोतल हिलाए नया ताजा माल ढक्कन तक जायेगा कैसे? और जो चला भी गया तो तू कोई मच्छर तो है नहीं कि चाट लिया और दुनिया से चट हो लिया? सुसाइड नोट लिखकर दरवाजे के पास उसी बोतल से दबाकर बीचों-बीच रख आया कि कोई आये तो पहले यही देखे |
[ १३ ]
     सबसे पहली नजर पड़ी छोटी बहन रश्मि की जिसने आज तक चैनल को भी पीछे छोड़ दिया और सबसे तेज खबर माँ बाप से कहीं आगे जाकर मौहल्ले तक के दीदार कर आयी | अब क्या था एक तो छोटा शहर ऊपर से लगभग सभी आपस में जानने वाले | जो ताने मिलने शुरू हुए पापियों को नगर भर में कि पूछो मति | बड़ी देर बाद घरवालों को सुधि आयी तो दो-झापड, दो-पुचकार और दो-फोन हॉस्पिटल और पुलिस के नाम हो गये | इधर विशाल साहब अपने स्प्रिंग बेस से बने उछाल वाले गद्दे पर पड़े सोच रहे थे- "मौत का दर्द कैसा होता होगा? कितना तडपन मिलती होगी? मुझे मिलने वाली तड़पन आखिर शुरू कब होगी? कहीं ऐसा न हो कि पता भी न चले और खुदागंज का टिकट कट ले मेरा? हाय मेरा बलिदान व्यर्थ चला जाना है"| उधर इकलौते बेटे को खोने का भय पितृपक्ष को दहलता जा रहा था | उसके बाद शुरू हुआ इलाज का दौर, जो न हुआ उसके इलाज का दौर | जाने क्या अजीब घोल सा पिलाकर सुबह से अब तक का सारा खाया-पीया कै करवा कर निकलवा लिया गया, इतनी उल्टियाँ आयीं जिनमें आँतें तब बाहर को उबल पड़ीं | गले और पिछवाड़े से होकर जाने कैसी-कैसी नलिकाएं पेट तक पहुँचाई जाने लगीं | "हाय! मैंने ढक्कन काहे चाट लिया?" अगले छः घंटों में पेट को दुधारू गाय बना पूरा दुह लिया गया, कुछ न बचा उसमें, आँतें फिर भूख से कुड़कुड़ाने लगीं | बोलने की सोची भी लेकिन दो नलियाँ मुँह में फंसी होने से आवाज निकली जरुर मगर उससे शब्द रचना नहीं हो पायी |
[ १४  ]
     खबर जंगल की आग बनी हरबंस गुप्ता जी के दर पर भी ठोकरें खाने लगी | मान-सम्मान वाले भगत मानुस थे, पहुँच गये हस्पताल इस घोषणा के साथ- "अब यही मेरा दामाद होगा | इतनी सच्ची चाहत और भला कौन दे पायेगा मेरी छोरी को?" अपर्णा भी हैरान-परेशान समझ नहीं पायी क्या प्रतिक्रिया दे इस सब पर | माँ-बाबा भी मिन्ट में रेडी हो लिए शादी के लिए | बेहोश तो हुआ न था लेकिन जैसे ही विशाल ने ये खबर सुनी खुशी से अर्ध-बेहोशी की अवस्था में पहुँच गया | वाह जी वाह, हींग लगी न फिटकरी रंग सतरंगी आयो | अगले कुछ दिनों में सगाई और शादी भी संपन्न हो गयी | घोड़ी दुल्हन के द्वार चढ़ते ही पंडित के कहने पर कुलदेवता को याद करने के बदले जो जयकारा निकला वो था "ढक्कन बाबा की जय हो"| सारे खानदानी भी सोचने लगे ये कैसे कुलदेवता हैं हमारे जिनका नाम आज ही सुनने में आया? ऐसे कुलदेवता कभी किसी ने न सुने थे सो सबकी नजरें अपने ज्ञानकोष को खंगालने लग पड़ीं परन्तु समझ कुछ न आया | इसीलिए कहता हूँ दोस्तों एक-एक ढक्कन हमेशा अपनी जेब में रखा करो क्या जाने कब काम आ जाए?

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (18-03-2012)
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आह


● आह ●

आहों की तासीर में जो इतना दम हुआ करता,
हर गली-कूंचे में दिलों का तडपना आम हुआ करता...

जोगी ● 18-03-2012

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मुस्कराहट का एक पल / हास्य

●  मुस्कराहट का एक पल / हास्य 

● केवल सोच भर का फर्क होता है वरना बुरा कुछ नहीं होता...... यदि रूखे-सूखे से जीवन में किसी प्रकार मुस्कराहट का एक पल भी नसीब हो जाए तो समझो जीवन में एक छोटी सी उपलब्धि को पा लिया...... वरना पैदा होकर मरने का इंतजार तो सभी करते हैं........

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● हास्य के स्तर को लेकर कोई गलत नहीं होता लेकिन एक सच सबसे बड़ा है और वो ये कि जिस तरह उँगलियाँ नाना-आकार में होती हैं वैसे ही लोग भी भिन्न-२ प्रकार के होते हैं...... कुछ लोग हास्य के उस स्तर तक पहुँच ही नहीं पाते जिसपर कि कथित प्रबुद्ध लोग हास्य को समझते हैं..... यदि आमजन को हास्य से परिचित कराना हो तो इसके लिए उन्हें उन्ही के स्तर से उठाते हुए ऊपर की ओर ले जाना पड़ता है, वरना हम अकेले ही हँसते नजर आते हैं..... और अकेले हँसना कैसा होता है इसे कौन नहीं समझता.........

जोगी...
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झबरू क्या जाने? © (कहानी)


झबरू क्या जाने? ● © (कहानी)
(मुख्य पात्र : झबरू बैल, जानकी गाय, बिरजू, रामदीन)

"अरे ओ बिरजू ! जा, झबरू को जाके बाँध आ" चिल्लाकर कहा रामदीन ने | बडबडाते हुए बिरजू का इंतजार किये बिना ही दडबे की ओर चल दिया "जानकी तो ऐसी न थी, छुटपन में भी काबू में बनी रहती थी और एक उसकी औलाद है कि संपट ही नहीं बैठने देती | हर बार इनके लिए नयी रस्सी लाओ और ये महाराज हैं कि इनकी उछल-कूद कम होने का नाम ही नहीं लेती | पता भी है रस्सी का एक छोटा सा टुकड़ा कितने दाम में मिलने लगा है? एक समय था जब परचूनिया बिना दाम लिए ही रस्सी थमा दिया करता था बदले में चाहे मुट्ठी भर अनाज दे आओ या ना भी दो कोई पूछने वाला नहीं था"| यूँ ही बकते झींकते रामदीन झबरू पड्डे के पास तक जा पहुँचा | देखा मियाँ झबरू रस्सी तुडाये शान से छोटी सी अपनी थूथनी ऊपर किये गर्दन से नीचे लटकने वाली लिबलिबी (खाल) को बिरजू के हाथों सहलवाने का आनंद लिए जाते थे | यह देख खून खौल उठा रामदीन का, अब फिर एक नयी रस्सी लानी पड़ेगी | "हाल ही तो लाया था पूरे पन्द्रह रुपयों के सौदे में और अब फिर से? एक तो बछिया की उम्मीद में ये बैल हाथ आ मारा और ऊपर से हर रोज का इनका चारा-पानी | हे भगवान इससे तो अच्छा ये पैदा ही न होता |" कहते हुए लाठी लेकर पिल पड़ा मासूम पर | "खा जा मुझे नासपीटे, काहे आ मारा बोझ कहीं का | सेर भर रोज तुझे चराओ, नखरे सहो, जाने कितने खरचे भी सहो | पहले ही क्या कम फकीरी थी जो कोढ़ में खाज ये जम भी आ मरा"|

उधर बिलबिलाता हुआ झबरू दडबे में यहाँ से वहाँ और जाने कहाँ-2 उछलता भागता फिर रहा था | कभी पींठ पर सीधे लट्ठ पड़ता तो कभी पसलियों का कीर्तन तो कभी जबड़ा ही जूडी का मरीज बना दिखता | खाल पर बैठी मख्खियों को उड़ाने की सी कोई चाल कामयाब ना हुई कि खाल को झरझरा के ही पड़ते लट्ठ उड़ा देता | ये सब नये नुस्खे थे जो पैदा होने बाद इन कुछ महीनों में उसने सीखे थे | सारे उपाय धराशायी होते देख और तेजी भी से बिदकता सा भागने लगा | बचना तो क्या था बल्कि इस चक्कर में कोने में रखे सानी और खल वाले तीन पक्के मटके और भूसा चरने की एक मढेंनी जरुर चकनाचूर हो गयीं | यह सब देख रामदीन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा | उसके बाद वहशत का जो नंगा नाच हुआ उसने झबरू को दोबारा उठने लायक नहीं छोड़ा |

मन भरने पर नहीं बल्कि पूरी तरह थक चुकने के बाद जाकर आराम की पहली साँस ली उसने | दूसरी तरफ बेचारा झबरू क्या जाने कि ये तो महज एक शुरुआत थी असली पीड़ा का तांडव तो ताजा मिले घावों से लगातार उठती टीसों के रूप में कई दिनों तक झेलना बाकी है | कुछ देर डरा सहमा जस का तस पड़ा रहा उसके बाद जब उठने की पहली कोशिश की तो अपनी ही जगह लद्द से गिर पड़ा | धरती पर आँख खोलने से लेकर अब तक ऐसा कुछ सोचा तक न था लेकिन बिना सोचे हो जाने का असर भी अलग ही होता है | जानवर बुद्धि : आखिर कितना समझती बातों को लेकिन दर्द समझती थी | वजह जानने समझने की कोई कोशिश नहीं की बस दर्द में कराहता-रंभाता अपनी माँ को पुकारता रहा | लेकिन उसके जख्मों को चाटकर साफ करने के लिए माँ नहीं थी | वो बंधी थी उस खूंटे पर जो रामदीन की बाँस के कनाठों वाली खाट के पास वाली मढेंनी के बगल में गडा था |

जानकी इस पूरी पिटाई के बीच अपनी जगह से निकल आने के लिए जाने कितना जोर लगा गयी लेकिन गले की पतली लोहे वाली चेन से निजात नहीं मिल पायी | हर बार मचलते आँखों से बहती गीली लकीरें उसके दिल का हाल साफ बयान किये दे रही थी | वहीं झबरू ने भी गंगा-जमुना से साक्षात्कार पा लिया था | उसे तो पता ही न था आँखों से पानी जैसी कोई गीली चीज निकल भी सकती है | खुश होना, उछालना-कूदना, बिदकना, मस्ती-मजे के सिवा किया ही क्या था अब तक | कुछ देर बाद घिसटते हुए कैसे भी करके पहुँच गया अपनी माँ के पास | उसकी हालत देख जानकी को जैसे समझ ही न आया क्या करूँ | बावली हुई बस उसके जख्मों को चाटने लगी | उसकी आँखों से बहते नाले बेरोकटोक बहिर्गमन में व्यस्त थे |

गाँव का एक गरीब गुरबा परिवार जहाँ स्वयं के भरण पोषण के लिए जद्दोजहद रोजमर्रा का हिस्सा हो वहाँ एक अनुपजाऊ नया जीवन वह भी जानवर के रूप में बोझ बन लद जाए तो अंजाम इससे कम क्या होना था | बड़े होने तक पूरा जीवन सिर्फ चराते ही जाना था इसे | कौन जाने बड़ा होने पर भी कितना काम आता? हर रोज इसे देख रामदीन का सेर भर खून कम हो जाता |

कई दिनों गर्दन उठाकर लिबलिबी सहलवाने की हिम्मत न हुई, उसे लगा शायद इसी वजह से बिरजू के नाम पर उसकी धुनाई हुई थी | बिरजू को झबरू संग खेलने का प्रतिसाद न मिलने के कारण झबरू का इकलौता मित्र भी छिन गया | अब बिरजू फिर गली के नाक पौंछते मिटटी से लिपे-पुते बच्चों के साथ खेलने का आदि हो गया | होता भी क्यों नहीं, जो उसे चाहिए था उसके लिए पुराना स्तरित विलुप्त हो जाने पर नया तो तलाशना ही था, सो तलाश लिया | दिन बीते महीने बीते अब जानकी बूढी हो चली थी | झबरू के बाद जानकी ने सात बछियायें भी दी | माँ बेटे दोनों को कभी समझ नहीं आया जो बछियायें पैदा होतीं वे कुछ महीनों के बाद कभी नजर क्यों नहीं आती थीं | क्या जानें बेचारे कि भविष्य की दुधारू गायों को मनचाहे दाम मिलने पर अलग-अलग घर दिखा दिए जाते हैं | लेकिन झबरू हमेशा यहीं रहा | भगवान ने चार थन जो नहीं बख्शे थे | एक बड़े होते सांड को कौन खरीदना चाहेगा जिसकी काया हमेशा मरियल ही रही |

कुछ साल बीत चुकने पर उसकी खुराक में अचानक ही इजाफा हो गया | पता चला उम्रदराज होते रामदीन ने उसके लिए छकडा बनवा लिया है जिसके आगे बंधकर झबरू मियाँ को घर और खेत के सारे सौदे ढोकर ले जाने होंगे | पहली बार छकड़े के आगे बाँधे जाने तक कुछ नहीं लगा लेकिन सामान लादे जाने पर जब गर्दन और पसलियों पे दोनों तरफ बोझ बढ़ने लगा तब जाकर सुध आयी कि वो बढ़ी हुई खुराक इस बोझे के लिए पूर्व तैयारियाँ थीं | टहनी वाली सटकी के किनारे पे सूत के मुलायम धागे से बंटी रस्सी के अगले सिरे को दो गाँठें बाँधकर कोड़े की तरह इस्तेमाल तय किया गया | शुरुआती हर कदम पर झबरू की पींठ सड़ाक की एक शानदार आवाज का स्वागत करती | पृष्ठ भाग की खाल सिंहर कर रह जाती | लगातार मिल रही सड़ाक-2 से बेहतर चलना को जान छकडा लिए झबरू आगे को बढ़ लिया | कई बार दगरे से गुजरते समय बिछड़ी बहनों से सामना हुआ परन्तु ज़माने बीते बिछड़ने की वजह से कोई किसी को पहचान नहीं पाया |

खाने पर रामदीन का दिया अतिरिक्त ध्यान अब फिर से कम हो गया था कि संभवतः उससे लिए जाने वाले काम की कीमत और मिलने वाले चारे की जंग में बचत नामक अर्थशास्त्र ज्यादा भारी पड़ा | रात दिन की कड़ी मेहनत और सामान्य से कम खुराक से झबरू की काया कुछ अधिक ही दुबला गयी थी | साथ ही बिरजू के कहने पर पिता रामदीन ने ट्रैक्टर किराये पर लेना छोड़कर झबरू का सदुपयोग करने की सोची | "आजकल ट्रैक्टर का किराया कितना महँगा हो चला था? ऊपर से डीजल के भाव तो जान ही लेने पर तुले थे | जे नासपीटी सरकार खा जायेगी जनता को मगर दाम नीचे को नहीं आएंगे"| लिहाजा झबरू अब खेतों और छकड़े दोनों में इस्तेमाल होने लगा था | कई दिनों से खाने के वक्त उसे घर से बाहर कर दिया जाता | भूख लगने पर खेतों के चक्कर लगा आता | हर बार किसी लाठी से मिली नयी चोट या किसी पालतू कुत्ते के काटे के निशान शरीर पर जगह बनाते जा रहे थे | यूँ तो बचपन के बाद ही से बहुधा उसे छोड़ दिया जाता था मगर अब यह हर बार की घटना होने लगी थी | पहले घर लौटने पर बची हुई भूख के नाम पर कुछ चारा मिल जाया करता था लेकिन कुछ दिनों से मढेंनी अकालग्रस्त हो गयी थी | यहाँ तक कि पुराने खाए भूसे के अवशेष तक समाप्त होने लगे थे |

इधर जानकी ज़माने हुए लतिया (दूध न देना) गयी थी | उसका दूध देखे परिवार को कई माह हो गये | पिछली बार भी उसने बहुत कम दूध दिया था | फिर एक दिन कोई कडियल सी मूँछों वाला तहमत पहने आदमी उसकी माँ को जबरन खींचते हुए ले गया | छकडा खींचते समय कई बार इसी आदमी को बाजार में लटकते माँस वाली दुकान में बैठे देखा था तब ही से इसे देख अंजनी सी दहशत होने लगी थी और आज उसकी अपनी माँ जानकी को ये दुष्ट लिए जा रहा था | सहमकर खूंटे के पीछे वाली दीवार से लगकर एकाकार हो जाने की कोशिशों में संलग्न हो गया | उस दिन के बाद अपनी माँ को फिर कभी न देखा झबरू ने |

एक दिन हल खींचते झटके से गिर पड़ा | कोई पत्थर था जिससे अटककर तेजी से चलता झबरू गिर गया था | टखने के बल उस पर गिरने और पत्थर के तीखेपन से घायल खुरों और टखने ने उसका चलना बाधित कर दिया | पहले से ज्यादा चाबुक मिलने लगे परन्तु बिगड़ी चाल फिर कभी सुधर ही नहीं पाई | कई बार की कोशिशों के बाद घर से उसे निकाल बाहर कर दिया गया | गाँव के सारे दगरे और गैलें जानी पहचानी होने से पूरा दिन यहाँ वहाँ पिटते-कुटते पेट भरकर हर शाम चौखट पर आकर सो जाता | दूसरी तरफ उसके घाव अब नासूर बन चले थे साथ ही कई कई दिन बुखार या जाने किस तरह की खुमारी में एक ही जगह पड़ा रहने लगा था | द्वार पर मिलने वाले संभावित परिणाम से आतंकित घरवाले गाँव की सीमा तक खदेड़ आते मगर हर बार की तरह वह फिर उसी दर पर मत्था टेक ही लेता |

एक रात जंगल से आने वाले गेधुए (सियार/ब्रज भाषा का एक शब्द) ने झबरू को गैल में अकेला देख पूरा भम्भोड़ डाला | आवाज सुन लाठियाँ लिए आये गाँववालों ने गेधुए को भगा तो दिया लेकिन इसके नुंचे माँस के टुकड़े कैसे लौटाते जिन्हें जाते जाते भी वह दुष्ट नोंच ले गया था | बिट्टू की ट्रॉली में पटककर गाँव की सरहद पर कूड़े के ढेर के पास ले जा फेंका गया | "झबरू क्या जाने" अब यहाँ से उसके बचे तन को भी नौंच लिया जाना है | रात सियार और दिन में आवारा कुत्तों ने पसलियाँ तक बाहर निकल दीं | दूसरी रात कुत्तों और सियारों के बीच की खींचातानी में जाने कब कब प्राण निकल गये खुद भी न जान पाया |

गाँव का भला चाहने वालों ने फिर उसे उठाकर खेतों से आगे वाले जंगल के मुहाने पर फिंकवा दिया | लेकिन इस बार बिट्टू की ट्रॉली नहीं थी | चमार ने बची-खुची चमड़ी उधेडकर फेंकने का वादा करके उसी रात कई टुकड़े करके अपनी बस्ती में जश्न मना लिया | सुनने में बेशक अजीब और अविश्वसनीय लगे लेकिन असल जिंदगी में मैंने कई बार इस तरह के कर्म वालों के बारे में सुना है जो मरे जानवर की चमड़ी उधेडकर रख लेते और बाकी बचे शरीर को अपने जश्न में इस्तेमाल किया करते हैं | गरीबी की एक दशा ऐसी भी होती है जहाँ सड़ते माँस से परहेज खत्म हो जाता है |

बहरहाल जंगल के मुहाने तक पहुँचा जरुर लेकिन जश्न में शामिल लोगों के सुबह वाले विसर्जन की शक्ल में | उधर उसके पिंजर पर कुत्ते आज भी पिले पड़े थे | विष्ठा खाने वाले कुछ पक्षी जैसे कौव्वे, गिद्ध आदि भी मंडराने लगे | जो जिसके हाथ लगा ले उड़ा | इसी बीच टूथपेस्ट बनाने वाली किसी कंपनी के एजेंट ने चमार से हुए सौदे के बाद आखिरी बचे अवशेष का इंतजाम भी कर लिया | पिंजर का चूरा अब ऊँची बिल्डिंगों वाले घरों के वाशबेसिन में हर रोज सुबह कुल्ले के साथ बह जाना था | कहानीकार के भेस में उस एक इकलौती आँख को मैं तलाशता ही रह गया जिसमें झबरू के लिए नमी की हलकी सी एक चमक तक उभरी हो |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (15-03-2012)
http://web-acu.com/ (मेरा व्यापार)

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कुछ बातें


कुछ बातें ●

तेरे जाने से रीत चुकी हैं दर-ओ-दीवारें मेरी ...
ठहर जा ऐ वक्त कुछ बातें अभी रह गयीं हैं अधूरी..!!

● जोगिन्दर (14-3-2012)

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कुछ सवाल खुद से (अनजान डायरी के पन्नों से)


कुछ सवाल खुद से ● © (अनजान डायरी के पन्नों से)
(मुख्य पात्र : नायक, जान्हवी, साढ़े तीन फेरे)

सुबह ही से मन में कोई अंजानी सी अनुभूति पैठ जमाए बैठी थी | यूँ तो जान्हवी मेरे मन की समझती थी मगर जानते-मानते होने के बावजूद उसने कभी इसे सीधे से एक्सेप्ट नहीं किया | करती भी कैसे, ज़माने भर के रेस्ट्रिक्शन्स जो पाल रखे थे मन में | उधर मैंने भी कभी जोर नहीं दिया कि वह भी वैसे ही सोचे जैसे कि मेरा सोचना था | उठ तो मैं तडके ही गया था मगर हमेशा की तरह आज बिस्तर छोड़ने की हिम्मत न जुटा पाया और उठते-उठते भी सुबह के दस बजा दिए | करने को काम कुछ था नहीं क्या करता कुछेक मेल्स निबटा दिए, कुछ सोसियल नेट्वर्किंग कर आया फिर टहलकदमी के लिए जरा बाहर की ओर चल दिया |

जाने कहाँ से एक पिल्ला संग संग चलने लगा जैसे कह रहा हो, चिंता न करो जब कोई न होगा तब भी मैं ऐसे ही तुम्हारे साथ कदम मिलाकर चलता दिखूंगा | यह वही नवजात है जिसे यदा-कदा मेरे पाँवों या जूतों के साथ खेलने मिल जाया करता है, हाथों तक तो बेचारे की पहुँच आज तक हो ही नहीं पाई थी | सोसाइटी की अंदरूनी मुख्य सड़क के आखिरी छोर तक आकर पलटकर चल भी दिया कि इतना साथ बहुत हुआ अब सम्हालो अपनी दुनियादारी | आगे मेडिकल वाले ऑटो स्टैंड पर एक नवयुवक मिन्नतें करने में लगा था और उसकी मालकिन (प्रेमिका होकर भी उसके हाव-भाव मालकिन के से ही लग रहे थे सो मालकिन कहना मुनासिब जान पड़ा) उसके साथ कुछ यूँ बिहेव कर रही थी कि मैं उस युवक और अपने साथ आये पिल्ले में कोई बड़ा अंतर नहीं कर पाया | कम से कम वो कुक्कुर अपनी मर्जी से आना-जाना तय तो कर पाया था | उनपर से अपना ध्यान हटा आगे बढ़ गया मैं |

मन में विचार जब तक सतरंगी न हों तो उसके मन होने पर शंशय होने लगता है | विचार कैसे न होते सतरंगी जबकि मैं अपने पास पूरे सवा सेर का ह्रदय लिए बैठा था | अभी हाल ही तो अचानक जान्हवी के व्यवहार में मौसम की तरह बदलाव आया था | नहीं समझ पाया लेकिन इतना तय पा था कि जो कुछ है उसे अपने फेवर में समझ लेना निहायत ही उच्च कोटि का भ्रम होगा | दो दिन पहले ही बात हुई थी जब मैं अपने बिखरे परिवार को नहीं बिखरने देने की अपनी मंशा और कोशिश की संभावनाओं पर बात कर रहा था | उसका सोचना भी कुछ ऐसा ही था लेकिन कुछ बदलाव के साथ कि अगर किसी फौरी सख्ती से मेरे वैवाहिक जीवन में किसी तरह का सकारात्मक बदलाव आ जाने लगे तो इसमें कोई बुराई नहीं | लेकिन मैं इसके पक्ष में नहीं था क्योंकि इतने वर्षों के साथ से अपनी सहचरी को इतना तो जान ही पाया हूँ कि कोशिशों के अंजाम को अनुमानित कर पाता | सुधरने से पहले नहीं आना कहते हुए यदि उसे पीहर के दर्शन करा दिए तो मुझे पता है कि इतने साल पुराना वैवाहिक ढाँचा काँच का सकोरा साबित हो जाना था | अपना सुख तो तिलंजित किये हुए हूँ लेकिन बच्चे के लिए अपने सुख से लापरवाह होना मज़बूरी ही समझो | बच्चे के लिए तो हम ही माँ-बाप हैं फिर चाहे कितना ही प्लस-माइनस क्यों न कर लो लेकिन कोई भी दूसरा विकल्प हमारी जगह भर नहीं पाएगा |

हाँ तो दो दिन से जैसी कि उसकी पुरानी आदत है जान्हवी वजूद लगभग संवादहीनता पर आ पहुँचा | अनमने से खानापूर्ति करते से मैसेजेज अथवा बातें उसके बदलाव को अभिव्यक्त कर देने के लिए काफी थे | यूँ मैं इतना समझने लगा हूँ उसे कि उसके बदले व्यवहार का प्रकार देखकर बड़ी आसानी से अंदाजा लगा लिया करता हूँ | जान लेता हूँ आज ऊँट किस करवट बैठा है और उस करवट के नीचे मेरा क्या-क्या दुचल गया या किस तरह के मुद्दे पर मुझे उससे बात करनी चाहिए | आमतौर पर मेरा अनुमान लगभग सटीक ही रहा करता है और यह शायद मेरे उसके साथ बने सच्चे लगाव का नतीजा है जो पिछले डेढ़ साल के दौरान मुझे उससे हो गया | कोशिश तो यही थी कि ऐसे किसी लगाव से अपने आप को दूर रखूं लेकिन जिस तरह अपने उफान के दौरान बाढ़ सारे जमीनी ढलानों और गड्ढों के रिक्त से स्वयं को रिप्लेस करती चली जाती है ठीक उसी तरह पत्नी के साथ उत्पन्न रिक्त व्योम में जान्हवी का अपनी जगह बनाना सिर्फ एक वक्ती बात थी, जोकि उसने बना भी ली |

बीते वर्षों में जाने कितने चेहरे सामने से आकर चले गए | बहुत सों ने जुड़ने की कोशिशें भी की मगर कभी उनसे खुद को जोड़ नहीं पाया | परन्तु जिस मन को नवपल्लव के अंकुरण के लिए बंजर बनाये बैठा था ठीक वहीं आकर जान्हवी ने एक कच्ची कोंपल उगाकर दिखा दिया जिसे सुबह-ओ-शाम भावनाओं के झारे की आवश्यकता भी आन पड़ी | पृकृति और प्राणी मात्र से अथाह प्रेम रखने वाला मैं कब तक बचता इस नवीन भाव के प्रादुर्भाव से ? बेहद कम समय में उस बंजर में बारिशों और उर्वरकों की मौजूदगी महसूस होने लगी | मजेदार बात यह कि उसने ऐसा कुछ न तो कभी कहा और ना ही कभी दर्शाया क्योंकि उसके मन में ऐसे भावों के लिए कोई जगह न थी | अपने इस मानसिक बदलाव के बारे में उसे बताने में मैंने तनिक भी समय नहीं लगाया | कहते हैं ना कि कह देने की संतुष्टि नहीं कह पाने की सुगबुगाहट से कहीं अधिक विश्रन्तिदायक होती है | चूँकि मुझमें कोई खोट या निकृष्ट स्तरीय स्वार्थ नजर नहीं आया सो जान्हवी ने इसे अच्छी साफ-सुथरी दोस्ती के रूप में एक्सेप्ट कर लिया | दूसरी तरफ मैंने अपने दोनों भावों को एक साथ जिंदगी में जगह दी परन्तु आपस में उनके पूरी तरह सेपरेशन के साथ | इससे हमारी दोस्ती में कहीं कोई फर्क नहीं आया | दिन-ब-दिन हमारी मित्रता बदस्तूर गहराती रही |

उस दिन तो नहीं किन्तु आज मैंने पूछ ही लिया | जो जवाब आया वह अपने आप में सही होकर भी सही नहीं था | दो दिन पहले जो बात हुई उसके हवाले से उसे लगने लगा कि कहीं वो मेरे लिए परेशानी का वायस न बनती चली जाए सो अब उसे मेरी दोहरी भावनाओं में से सिर्फ एक दोस्ती रखनी थी और मेरी दूसरी कोमल अनुभूति के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं था सिवा इसके कि यह समाज की सामान्य स्थितियों में सही नहीं है  जबकि मेरा मानना है हर दौर में इंसान ने सामाजिक कायदे कानून अपनी सहूलियत के अनुसार मैन्युपिलेट किये | चाहे जब अपनी सुविधानुसार अथवा श्रृद्धानुसर तोड़-मरोडकर उन्हें नये रूपों में इस्तेमाल कर लिया | इस मामले में मैं चाहता ही क्या था ? इतना ही ना कि मुझे अपनी कोमल भावनाओं को मन में नहीं रखकर बता देना कहीं श्रेयष्कर लगा | उससे कहा मैंने इस बारे में कि मैं अपने सारे सिद्धांत तज़ तुम्हारे सिद्धांतों को तरजीह दे रहा हूँ, जैसे चाहो इस नाते को तय करो | इसमें परेशानी काहे की ? कहती है उस दिन जो मैंने बिखरे से पड़े अपने घर को तिनका-तिनका कर जोड़े होने की और उसे बिखरने नहीं देने की बात कही उससे उसके अवचेतन पर बड़ा गहरा असर हुआ है और वह नहीं चाहती कि आगे जाकर जीवन में कभी उसकी वजह से मेरा कोई अहित हो लेकिन क्यों भूल जाती है कि हम दोनों ही अपने-अपने घरों में अपनी फैमिलीज के साथ जी रहे हैं | सामान्य तौर पर हमारा मिलना भी कहाँ हुआ करता है ? हम दोनों ही इस दुनिया के सारे सही-गलत भी समझते हैं | कभी कोई सीमा लांघने की इच्छा तक नहीं जागी तो सही-गलत के तराजू पर तौलने के लिए बाकी रह ही क्या जाता है ? एक ऐसा मानसिक रिश्ता जो अपने-अपने माहौल की अनियमितताओं, दुखों, तकलीफों से निजात दिलाता हो मैं उसे कभी गलत नहीं मान सकता |

जान्हवी ने जिस तरह की भाषा में लिखकर अपनी बात को अभिव्यक्त किया उसका एक आशय यह भी था कि हमारा नाता चाहे रहे ना रहे लेकिन अब उसका कॉन्सेप्ट क्लीयर है उसमें मेरी दूसरी पैरेलल फीलिंग्स के लिए कोई जगह नहीं | मैं पूछता हूँ पहले ही क्या अलग था जो अब नया किये जाती हो ? पहले भी मन के भाव मन ही में गर्दिशें मचाया करते थे और प्रैक्टिकल रिश्ता विशुद्ध दोस्ती का ही था, तुम भी वही कहे जाती हो | आखिर बदलना क्या चाहती हो तुम ? अगर फीलिंग्स झूठी नहीं तो मना कह देने भर से क्या वे समाप्त हो जाएँगी ? कैसे सोच लिया उसने इतने बड़े झूठ की बुनियाद पर मैं अपना रिश्ता खड़ा रख पाउँगा ? यदि उसकी बात मानकर हृदयपटल पर नवांकुरित पल्लवन को बिना खाद-पानी का करके दोस्ती को आगे कर दिखाना है तो यह एक कोरा झूठ होगा | साथ बने रहने के लिए कपट का सहारा पहले कभी न लिया तो अब ही क्या ले लेना था सो साफ जता दिया कि तुमसे बेशक ना जताऊँ मगर अपनी फीलिंग्स को समाप्त कर पाने के सिलसिले में मुझे बेबस ही समझो |

लंबे समय से जान्हवी को मानसिक अर्धांगिनी का दर्जा दिए बैठा हूँ | जब एक रिश्ता तोड़ते नहीं होता तो खुद को इसके साथ बेनाता कैसे कर लूँ ? शुरू ही से संबंधों का पोषण करने के संस्कार पाए हैं | इस सम्बन्ध को क़त्ल-ओ-गारत कर पाने वाले दो हाथ कहाँ से लाऊँ ? विकराल से विकराल परेशानियों में जिस मानसिक अर्धांगिनी ने हर कदम साथ दिया और हर बार तकलीफों का अहसास कम हुआ भी जबकि सात फेरों वाला रिश्ता कहीं नजर तक न आया | अपने हिस्से के साढ़े तीन फेरों का हक झट माँग लिया जाता है लेकिन मेरे हिस्से के साढ़े तीन फेरों के हक को कुछ सवा दो साल पहले दफना चुका हूँ | वो कहते हैं ना कि वादे तो होते ही तोड़ने के लिए हैं | फेरे भी एक तरह से जीवन साथ बिताने का एग्रीमेंट ही तो हैं | उनमें तय हर बात मुद्दतों पहले वादाखिलाफी की बलि चढ गयी | इंसान को मकान से बढ़कर जहाँ घर की अनुभूति चाहिए होती है वहाँ सराय तक का अनुभव न मिला | कैसे न अपनी खुशियाँ तलाशता ? मिलीं मुझे वे सारी खुशियाँ, जान्हवी नाम की ताजा हवा वाली फॉर्म  में | कैसे कर देता अपनी जिंदगी इन नकली खोखले सामाजिक नियमों के हवाले |

जान्हवी की सोच के जवाब में क्या हो सकता है या क्या होना चाहिए या इस बारे में हमारा समाज क्या सोचता है या इस बारे में हमारी फैमिलीज की समझ क्या होगी ? नहीं है इन सवालों के जवाब और ना ही कोई परवाह है मुझे जबकि इस रिश्ते में मुलाकात तक न होती है | फिर बहानों के प्रवाह में कोई कमी क्यों नहीं ? लोगों की सोचें भौतिक अधिक हुआ करती हैं सो उनकी सोचें इस नश्वर शरीर से आगे जा ही नहीं पाती परन्तु कौन समझाये उन नामाकूलों को जिनमें खुद जान्हवी तक शरीक हुए बैठी है |

इस कहानी को यहीं विराम देता हूँ कि असल जिंदगी में इससे आगे क्या होना चाहिए हर इंसान के सिलसिले में यहाँ पृथक-पृथक बातें हो सकती हैं सो एक निश्चित अंजाम केवल उस घटना का हो सकता है जो वाकई कहीं घटी हो जबकि इस कहानी का अंत कैसे तय किया जाए जबकि सर्कम्सटेंसेज दो अलग-2 बसे घरों सॉरी सरायों के हों ? जाने कब क्या हो जाए ? साथ रहने की ख्वाहिश तो दिवा-स्वप्न ही कहलायेगी | लेकिन अंजाम को नयी आ रही हर दूसरी घटना के साथ अपने बदलाव के दौर से गुजरना पड़ेगा | अतएव बेशक एक नजर में मेरी यह कहानी, एक कहानी से ज्यादा किसी इंसान की डायरी के पन्ने सी लगे लेकिन सबसे बड़ा सच यही होगा कि संभवतः इसका कोई सटीक अंत नहीं हो सकता | पाठक स्वयं अपनी श्रृद्धा का उपयोग करे तो बेहतर |

चौधरी जोगिन्दर सिंह Choudhary Jogindar Singh (09-03-2012)
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