Khamoshi Kab Tak?




खामोश कब तक?

खामोश निगाहों से तकता रहूँ मैं कब तक ?
आकर कब वे जुबान देंगे मेरी ख़ामोशी को ?
साकत कब तक घूरता रहूँ उस दगरे को ?
जिस दगरे पर जाने के तेरे निशान बने हैं..... :-(

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh...

(2012-10-13)

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रिश्ते (सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?)




रिश्ते (सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?)



सुबह का अख़बार यूँ तो देखने की आदत मरहूम हो चुकी थी फिर भी कभी-कभार इस कार्य को भी निबटा लिया करता हूँ | पत्नी को उठना गँवारा न था सो निद्रावती बन लुढकी पड़ी थी | मेरी आँख अख़बार पर मगर जैसे हर्फ़ परवाज किये जाते हों | गड्डमड्ड आपस में उलझे शब्द-वाक्य आँखों को चकराए देते थे | होता है ऐसा भी जब नेत्र किसी एक स्थान पर एकाग्र ना होकर उनका फोकस जैसे वस्तु के पीछे किसी बिंदु पर जाकर बनता हो तो सामने मौजूद चीज कुछ धुँधला जाती है और एक ही चीज को दोनों आँखें अलग-अलग चित्रित कर एक दूसरे पर कुछ इस तरह ओवरलैप करने लग जाती हैं कि दोनों नेत्रों के रेटिना पर बना चित्र डबल सा जान पड़ता है जो यूँ प्रतीत होते हों जैसे उन्हें एक दूसरे पर ठीक से ना रखा गया हो | मेरे साथ भी यही हो रहा था |

ध्यान लगाने की कोशिशें बहुतेरी कीं परन्तु चित्त था कि कुछ दिन पीछे को भागा जाता था | जाने व्यक्तित्व की कमी थी या लयिका की जीवन को कुछ ज्यादा ही बारीकी से छान लेने की आदत परन्तु टेलीफोनिक बात के साथ कंप्यूटर गेम खेलना मुझे भारी गुजर गया | उसे लगा संभवतः मेरी प्रायोरिटी में वह स्वयं न होकर कुछ और ही है मगर उसे कैसे समझाऊँ कि हर चीज ठीक वैसे नहीं होती जैसा हम देखते-समझते हैं | साथ जीते बहुधा ऐसा हो जाया करता है जब हम किसी अजीज से बात करते समय कुछ और भी कर जाते हैं जिससे बेशक उसे इग्नोर्ड लग जाता है जबकि उपरांत इसके भी उस इन्सान की हमारे जीवन में जगह बदली नहीं थी | हाँ इसे कमी या गलती या लापरवाही या सुरक्षा अनुभूति का अतिरेक जरुर कह सकते हैं जिसमें संभवतः उस भाव की अधिकता हो जिसमें एक इन्सान किसी के साथ इतना सुरक्षित महसूसने लग पड़ता है कि अब जो भी है वह हम है, ना कि मैं और तुम | और भूलें, कमियाँ, गलतियाँ इनमें से कोई भी ऐसी नहीं जो हमारे रिश्ते पर हावी हो सके क्योंकि हमारा नाता तो उन सबसे परे, सबसे ऊपर, सबसे बड़ा है | लेकिन भूल जाता है इन्सान कि यही रिश्ते में सुरक्षा की आतंरिक अनुभूति जब तक सामने वाले को ना हो तब तक आप खुद को सुरक्षित कैसे समझ सकते हो? अभी तो डर-डरकर जीना बाकी होता है जाने कब किस बात पर एक ब्रेक मिल जाये?

उसने कहा भी :::
कुछ ज्यादा तो न चाहा हमने...
एक लम्हा माँगा था बस अपने नाम का...
पर वो तंगहाल ...इतना भी न दे सके...

उसे कहा तो नहीं लेकिन मन से निकला :::
तंग बने क्यों एक लम्हा भर मांगते हो,
जबकि नाम तुम्हारे हर लम्हा किये बैठे हैं,
ग़र चुरा भी लिया एक लम्हा अपने नाम पर,
तो क्या इतनी जगह भी दिल से निकाल न पाओगे...?

बहरहाल हर बार की तरह इस बार भी मानसिक अलगाव हो गया लेकिन इस बार अलगाव पूरा न होकर आंशिक था जिसका मतलब यह कि हम बात तो करेंगे लेकिन वैसे जैसे किसी जानने वाले के साथ किया करते हैं और कहा कि मुझसे खेलना बंद करो | इधर अपनी जगह सुन्न, साकत, अविचल, अपलक, अकिंचन मैं सामने की ओर बस निहारा गया | कहने को कुछ सूझा नहीं क्या कहता? इतने ब्रेकअप्स देख चुके कि अब कहना समझ ही नहीं आया | मन के भाव चुगली खा रहे थे, जार-जार चीख-चीख कह रहे थे ये नहीं होना है, नहीं होना था, क्यों हो गया? परन्तु कह नहीं पाया | जितना भी कहा उसने सब सुना | चुपचाप, विचार शून्य मस्तिष्क लिए मैं समझ नहीं पाया कैसे उस रिश्ते को पहचान के भाव से देखूँ जिसे कायनात के सबसे खुबसूरत स्थान पर रख देखा था | कह नहीं सका कितनी गहरी और कोमल अनुभूति मन में बसाये बैठा हूँ कि मुँह से निकली हर बात पर डायलॉग का तमगा चिटका दिया जा रहा था | सो कुछ न कहते हुए चुप रह जाना बेहतर समझा | वैसे भी कोई हर बात में जब वफ़ा तलाशने लगे तो कैसे मिले उसे कि हर साँस अपनी जगह है, हर घटना अपनी जगह है, हर वक्त जैसे आप जागे हुए नहीं रह सकते ठीक वैसे ही किसी एक बात को सोचते हुए यह करना चाहिए और यह नहीं, कैसे जी सकता है कोई? और जब तक निश्चिन्तता का अहसास ना हो तब तक किसी रिश्ते को शांत मन कैसे जिए कोई? हर पल मन में समाया भय कि जाने अब कौनसी बात हो जाये जिसे पिन पॉइंट कर नयी गलती या मेरी तरफ से नाता ही झूठा और क्रियेटेड बता दिया जाना है |

क्यों कोई इस डर से मुक्त हो व्यवहृत नहीं हो सकता कि मन मिलने के बाद अब जो भी कमी-बेसी होगी वह मन के नातों के आगे नगण्य हो जाने वाली है सो चिंता न कर बालक तू जी ईमानदारी से अपनी जिंदगी, अपनी जिंदगी (लयिका) के साथ | वह समझेगी और जैसे तूने उसे उसकी हर अच्छाई-बुराई के साथ अपने साथ अंगीकार किया वह भी ऐसे ही तुझसे जुड़ेगी कि तू जैसा है ठीक है, आज पसंद है तो कल नयी सोच क्यों? इसमें यह ठीक नहीं, वह बदलना चाहिए या यह तो सिरे से ही गलत है और यह सोचकर कोई सम्बन्ध छोड़ चल दे कहते हुए कि जो था सब झूठ था, बनावटी था और यह कि जो फिलिंग है ही नहीं जो है ही नहीं उसे माना ही कैसे जाये? यह तो ठीक नहीं ना? हम कोई स्कूल एग्ज़ाम तो नहीं दे रहे जहाँ हर बात नंबरों की कसौटी पर जोखी जाये?

बड़ी देर से कोशिश में था चीजों को समझने की समझ नहीं पाया कि क्यों आखिर इन्सान उन्मुक्त बन जी नहीं सकता? मानता हूँ जब हम जुड़ते हैं तो बहुत सी अनकही बातें, शर्तें भी जुड़ जाती हैं, कई जिम्मेदारियां, कई नये अहसास जुड़ जाते हैं | तो उसमें उथले रूप से हुई बात को देखते हुए अंतर्मन को मिथ्या समझना कहाँ तक ठीक था? सवाल यह भी गलत नहीं कि जब कुछ महसूस होता ही नहीं तो लयिका कैसे उसे माने? इसका तो एक ही जवाब है कि वह देखे टटोलकर अपने मन को और खंगाले इस बात को कि वाकई क्या वह खुद जुडी थी? या बहाव संग साथ भर हो ली थी? क्योंकि हर हाल में यह एक निर्विवाद इंसानी सत्य है, यदि हम वाकई किसी से इतना जुड़ जाएँ जैसे दो जिस्म एक जान तो इस तरह तीखी खंगालती नजर का किसी तरह कोई अस्तित्व हो ही नहीं सकता क्योंकि तीक्ष्ण नजर सिर्फ कमियाँ निकलकर परफेक्शन ढूँढने के लिए हुआ करती हैं ना  कि रिश्ते बनाने / निभाने के लिए | जहाँ मन जुड़े हों वहाँ तो आँखें इस हद तक बंद हो जाने लगती हैं जिसमें असल इंसानी कमियाँ तक ओझल हो जाया करती हैं | और ऐसा ना हो तो इन्सान या तो भगवान है या कोई असम्बद्ध जो तराजू संग लिए घूमता है |

नमी की कुछ बूँदें कब ढलक आयी पता ही न चला | इसी के साथ याद आया कुछ समय पहले बड़े भईया के साथ किसी वजह से बात का बंद होना | सोचे बैठा था कि अब कभी बात न करूँगा परन्तु तत्क्षण ही मस्तिष्क में आया जिस चीज से स्वयं तकलीफ पा रहा हूँ उसी चीज से अपने भाई को भी तो तकलीफ दे रहा हूँ | जिस बात को तीक्ष्ण नजर और तराजू के पलड़ों संग जीना कह रहा हूँ, खुद भी तो वही किये जाता हूँ अपने ही भाई के साथ | तो कैसे उम्मीद कर सकता हूँ कि जिस काम को सही नहीं समझा वही करते हुए उसके अपने लिए सही होने की उम्मीद पालूं? समझाई गयी सभी बातें याद आयीं और बिना देर किये फोन घनघना दिया | ठीक से बात तो नहीं कर पाया लेकिन बात करना मात्र ही काफी था यह जताने के लिए कि भईया मैं गलत था और यूँ नाते अलग नहीं किये जाते | बात करते भावावेग से आवाज में बदलाव आने लगा | कुछ देर और बात करता तो शायद आवाज बदल जानी थी सो तत्काल विदा ले ली | बगल में श्रीमतीजी अब भी लुढकी पड़ी थीं जिन्हें सोते में क्या जागते में भी कभी किसी अहसास से बावस्ता होना गँवारा न था | और इसीलिए एक घर में रहते भी शायद दो अजनबी आपस में हमसे अधिक भले से रह लेते |

हौले से उठकर हॉल में लगे दीवान पर जा लेटा कि उसे भीगी पलकें दिखाने की कोई तमन्ना दिल में न थी | अख़बार संग ही चला आया था जिसे पढना गब्बर (अम्बाजी के मंदिर के पास पहाड़ पर बने देवी माँ के पदचिन्ह) की चढ़ाई महसूस हुआ | आज कई दिन हुए मनाने के अल्फाज अब भी अकाल की भेंट हो रखे हैं | इतना मनाया पहले कि अब कहने को नया कुछ बाकी ही नहीं | जो बाकी है वह एक हसरत है | काश बिन कहे वो समझ लेते कि अनकहा मनाना भी तो कोई मायने रखता होगा?

रोज सुबह नित्यकर्मों से चर्या शुरू करते जाने कब शाम हो जाती है पता ही नहीं चलता | बहुत सा खाली समय होता है लेकिन तब दिमाग भी खालीपन से शर्त लगा रहा होता है | अजीब सा सूनापन, सब चुप, अबोली सी जिंदगी | और ना ना करते भी अब लयिका के आने से पहले की सी जिंदगी शुरू होती लग रही है | वही अतिरेक हास्य भरा जीवन जाने क्या छुपाता या हँसी के खोखलेपन में समायी अजीब सी एक ख़ामोशी | उग्र, आक्रोश से भरा स्वाभाव कि कोई कुछ बोलकर देखे ऐसा हाल उसका कि ढंग से हत्थे चढ़ा इन्सान महीनों तक किसी और से न अड़े | बे-जरुरी बकवास और भी जाने क्या क्या? कई बार तो जिसने कभी मतलब नहीं रखा वह बीवी भी पूछ गयी, क्या हुआ तुम्हें? अचानक हुआ इतना बदलाव उसे भी हजम नहीं हो पा रहा था | इसीलिए विलग में भी सवाल का लोभ नहीं छोड़ पायी | इधर मेरे मन में बसा सवाल घडी का पेंडुलम बन बारह के सुर निकाल रहा था |

क्या इन्सान अकेला रह पाने का भ्रम पाने के बावजूद सच में अकेला रह पाने योग्य हुआ है? यदि हाँ तो ये भारी-भरकम बदलाव क्यों? क्या कभी इन्सान बिना पलड़ों और बिना सही गलत की सोच, इन सबसे ऊपर उठकर केवल निर्मल संबंधों को जी पायेगा?

जानता हूँ कई सवाल अनुत्तरित रह जाने के लिए होते हैं लेकिन क्या इस तरह कम करते-करते किसी दिन इन्सान बिना संबंधों के जी पायेगा? क्या होगा तब जब खुद ही से कभी कोई गलती हो जाये? तब खुद को पलड़ों पे बिठा तौल पाने का साहस क्या इन्सान कर पायेगा? जो यह साहस जूता भी लिया तो क्या खुद ही से वह नाता कभी तोड़ पायेगा? सवाल बहुतेरे : उतरदाता कौन?

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh

(2012-09-27)
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चुड़ैलन काकी (कटाक्ष)


चुड़ैलन काकी (कटाक्ष)


आज हमारी चुड़ैल गजब ढा गयी | जाने कब किस तरह एक दिन बगल वाले मैदान से सटे उससे परे वाले कब्रिस्तान से होकर गुजरी और थकन से बावस्ता हो सुस्ताने के लिए वहीँ बनी एक पुरानी कब्र को अपने पृष्ठ भाग से अलंकृत कर बैठीं | दरअसल ये उनके घर आने जाने का शॉर्टकट था वरना घूमकर जरा लम्बा रास्ता भी था जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था | पता नहीं कब लेकिन अब कबर तो घर जैसा लगने लगा है उसे | आना जाना तो लगा ही रहता था लेकिन अजीब तो हम जैसों के लिए था कि आखिर ये कैसे ?

लेकिन असल किस्सा कुछ यूँ हुआ कि आरामपरस्ती कुछ इस कदर हावी हुई कि एक दिन अचानक घर से लायी चादर का किसी खाली कबर में बिस्तर लगाकर लेट गयी और बड़ा सकून मिला | बाद में कबर के मालिक सुक्खा भूत ने बहुतेरी कोशिश कर ली लेकिन है मजाल जो मैडम ने कब्ज़ा छोड़ने के बारे में सोचा भर भी हो !! आज तक बेचारा इंसानी अदालत में इससे केस लड़े जा रहा है और आप तो जानते ही हैं हमारी हिन्दुस्तानी अदालतों को | तारीख पे तारीख बस और क्या | अब तो बेचारा सुक्खा भूत बूढ़ा होकर मरने भी वाला है | और देखना जल्दी ही इन्सान बनकर आयेगा अपने सारे बदले चुका लेने के लिए इस इंसानी चुड़ैल से |

परन्तु अभी मारा नहीं था सुक्खा भूत सो भोगना अब भी बाकी था | एक दिन जा चिपटा एक नेता से कहा निज़ात दिला मुझे इस चुड़ैल से नहीं मैं तेरी ही मत फिर देने वाला हूँ | पहली बार मूर्त रूप भूत देख हुई नेता की सिट्टी-पिट्टी गुम और आनन-फानन में जाने कितने डिपार्टमेंट मय मजमा सारा जमा कब्रिस्तान में नजर आये | चुड़ैल बोली कम नहीं हमारी बिरादरी भी और सीधे अन्ना तक है पहुँच हमारी | सबकी नहीं एक की बैंड बजने लायक स्टिक तो होंगी ही बाबा अन्ना के पास | और सुना है हर दूजे दिन बाबा दाढ़ी भी संग हो सुर मिला लेता है | जाने कैसी जड़ी-बूटी है खाता कि बेसुरा भी सुर उगलने है लग जाता | कहा नेता से कि बेटा क्या समझता है तू कि ये लोग काला धन लाकर लोकपाल लायेंगे ? ना बेटा ना , आज नहीं तो कल तेरी ही लोकसभा में तेरे ही बगल में लोकपाल ही के दम पर बैठे नजर आएंगे |

पापी नराधम तू चिंता ना कर तेरी "चिंता ता चिता-चिता, चिंता ता ता" तो मैं अक्षय ही से करवाने वाली हूँ | सुना है आजकल भगवान बना घूम रहा है | सुना तो ये भी है आज खुद भगवान पे केस इंसानी अदालतों में चलने लगे हैं और सम्मन जाने कैसे स्वर्गलोक तक डिलीवर किये जाते होंगे ? इतना सुनते ही सुक्खा भूत सूखते-सूखते सींक बन किसी झाड़ू का भाग बन खुद को सौभाग्यशाली समझने लगा और नेताजी ने जब नजर पिछड़ी डाली तो सिवा खुद की पिछड़ी और कुछ नजर तक न आया बेचारे को | सर पर पैर रख जो तीतर बने पूरे एक महीने किसी को दर्शन लाभ न दिए महामुनि ने |

इतना देख अगल-बगल की कुछ कब्रें दहशत ही से वीरान हो गयीं कि ये लंका-मईया तो हमें भी न छोड़ेगी | होना जाना क्या था कब्रिस्तान में वन रूम खोली ने विस्तार पाया और अब फाईव बी.एच.के. के ठाठ मुहैया पूरे खानदान को कराया |

उधर कबर में लटकी चुड़ैलन सोच रही थी कैसा है जमाना आया, क्या नेता क्या भूत सब को हमने है रुलाया | नाम लिया बस गंदाये सिस्टम का और दहशत से खुद पूरा सिस्टम ही झोली में सिमट आया |

जोगेंद्र सिंह सिवायच Jogendra Singh

(26-09-2012)

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ख्वाहिशें : (प्यारी सी जुगलबंदी)


ख्वाहिशें : (प्यारी सी जुगलबंदी)


एक SMS: ख्वाबों खयालों की रातें हैं, कहनी सुननी उनसे कई बातें हैं...

Nayika: आज की मुलाकात बस इतनी...कर लेना बातें चाहे का जितनी...

Nayika: अच्छी नहीं होती है जिद इतनी...देखो हमें है तुमसे प्रीत कितनी...:)(note * dil par naa len)...:D

Jogi: जो ये नोट हटे...और बात सच्ची गर निकले दिल से...तो शायद बात तुम्हारी हम मान लें...

Nayika: बात हमारी क्यों नहीं मान लेते...और जब है इतना ही गुरुर...तो खुद ही क्यों नहीं जान लेते...?

Jogi: हैं तैयार मान जाने को बात तुम्हारी...बाकी रहा कहाँ अब गुरुर भी खुद पर...हो गयी मुद्दतें...बह गया गुरुर भी अब तुमको जानते-समझते...

Nayika: हम भी तो वो कहाँ रहे...जब से हैं तुमसे मिले...

Jogi: जाने क्या थे तुम और क्या थे हम जाने...बस दो जिस्म और दी ही अलग सी जान थे हम...गुजर गयीं मुद्दतें तब जाकर जाना...क्या होता है अहसास दो से एक हो जाने का...

Nayika: अब मौत भी आ जाए तो गम नहीं...कि किसी धडकन बन...रहना आ गया है हमें...

Jogi: वाकई होता है जुडा सा वो अहसास जिसमें जीना हमें बन धडकन किसी और की रहना होता है...हमसे ज्यादा हमारे लिए खुश कोई और ही हो रहने लगता है...

Nayika: हर साँस में वो है...हर अहसास अब उसके दम से है...उसकी उदासी सबब मेरे अश्कों का है...और हर खुशी भी है अब उसी के दम से...

Jogi: जो होने लगे तरंगित ह्रदय के तार किसी के नाम पर...होने लगी झंकृत श्वासें उसी के नाम पर...समझो हुआ हक अपने जीवन से हटकर आधा अब उसी के नाम पर...

Nayika: वही तो फकर है...मुझे अपनी चाहत पर...और मेरी बंदगी भी है...उसी के नाम पर...

Jogi: न जाना मैंने कभी हर्फ़ चाहत के...और न जाना हर्फ़ कोई बंदगी सा...जो जाना है तो बस इतना कि हर अहसास मेरा है गिरवी किसी और के नाम पर...खेल ले फिर चाहे बेक दे (बेच दे)...सारे हक अब हैं ये उसी के नाम पर...

Nayika: उसी चाहत ने...कुछ इस तरह हक अदा किया...बड़े मामूली से इंसान थे...हमें खुदा ही बना दिया...

Jogi: खुदा-खुदा करते देख न सके जाने कब जिगर के वो मालिक बन बैठे...थे पते दो अलग जगहों के...किस कदर देखो आज हम लापता बन बैठे...

Nayika: नजदीकियाँ इस कदर न बढाइये कि...हम खुद को खो दें...भुला कर अपना नाम पता...संग आप ही के हों लें...

Jogi: न देखो तुम न हम देखें...किस दिल में जाने कौन बसा किस शिद्दत से...कुछ न कहकर चलो बन जायें अजनबी एक दूजे के अरमानों से...

Nayika: ना वो देख पाएंगे...ना हम जता पाएंगे...चलो इसी बहाने...चाहत उनकी...इस जहान से छुपा ले जायेंगे...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh

2012-09-15 (सितम्बर)
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बड़ी हवेली



● बड़ी हवेली ●

(1)
     अपने पुराने स्टडी रूम की खिडकी तले लगी टेबल से मैंने सर उठाकर सामने वाली दीवार पर टंगी बत्तीस साल पुरानी घंटा-घडी को देखा | कुछ ग्यारह बजकर पच्चीस मिनट का समय दिखा रही थी | सैकंड का पतला कांटा नदारद था घंटे का छोटा सलामत और मिनट वाला अपनी उम्र के साथ उम्रदराज हुए बुजुर्ग की हाँईं कुछ टेढ़ा सा प्रतीत होता था | चीजें सभी थीं चाहे जीर्णावस्था में सही मगर चलकर दिखाए इन्हें जमाना हो गया था | अभी कुछ डेढ़ एक साल ही गुजर होगा जब टनटनाकर इसने अपनी आखिरी हुंकार भरी थी | बड़ा साथ दिया इसने मेरा, मुझे याद है आज से तेईस साल पहले तृप्ति के पिताजी इसे हमारी शादी की पंद्रहवीं सालगिरह पर बतौर गिफ्ट लाये थे | सहर्ष ही जिसे हम दोनों ने इस दीवार का हिस्सा बना दिया था | उस समय के हिसाब से शायद घड़ियों के नाम पर जरुर सबसे महँगा तोहफा रहा होगा | होता भी क्यों नहीं तीन गाँव के चौधरी जो थे ससुरजी | और हमारा ही रुतबा कौनसा कम था, साहेब बहादुर का ख़िताब हाँसिल था पिताजी को अंग्रेजी हुकूमत से | दिन-रात का हुक्का पानी चला करता था कभी गोरों का हमारे यहाँ | अपने इलाके के सबसे बड़े धनकुबेर थे पिताजी | आह.. कहाँ गये दिन वो सारे कि अब तक उन उमंगों भरे माहौल को जीने की हसरतें बाकी हैं |
(2)
    अनायास ही सामने का द्वार खुलने से आये चौंधे ने ह्रदय को भी चौन्धियाकर जताया कि बुलावा यथार्थ का भिजवाया हुआ है | आ गये जी कल्पलोक छोड़ क्षणभंगुर हकीकी संसार में जहाँ स्वयं मैं भंगुर हो जाने की उम्र में बैठा सोच रहा था अब कौन आया मुझसे मिलने ? देखा तो क्या पाता हूँ मेरा बरसों पुराना यार खुराना जिसके साथ जाने कितने बरस स्याह-सफ़ेद करते गुजार दिए थे | दौलत बहुत देखी मगर अब वही दौलत औरों के पास जब नजर आती है तो दाँत पीसकर रह जाता हूँ कि क्यों कभी मेरे घर में बरसों पुरानी चीजों के बदलाव की उमर आयी ही नहीं | क्यों मेरी उस पुरानी इम्पाला में सिर्फ हॉर्न ही बजकर रह जाता है ? क्यों मेरे दोनों बच्चे अब मेरे नहीं वरन अपनी जोरुओं के संग रहा करते हैं ?
(3)
     उठा भुनभुनाता हुआ मगर सामने ना पहुंचकर तिरछे लहराता हुआ झौंका खा गया और बायीं दीवार के सहारे रुक पाया | खुराना ने कहा भी था "आ जाऊँगा काके तू ना उठ, अब तेरे बस का नहीं ज्यादा चलना लेकिन तू सुनता ही कहाँ है?" खैर सहारा दे मुझे भी ले आया और चिल्लाकर कहने लगा "ओ, भाभी जी एक चाय कड़क वाली" | अरे काहे की चाय, कल से एक ही थैली दूध घर में आया था उसी की चाय पिए जा रहे हैं पानी मिला-मिलकर, कब समझेगा ये फोकटिया | बिजनेस में एक साथ घटा हुआ था तभी से दोनों फाकों पर जी रहे हैं | काम के नाम पर कुछ बचा नहीं, जमा पूँजी कुछ बना नहीं पाए, ऊपर से ये पनौती, बड़े बाप की बेटी "तृप्ति" | राज गये पर ठाठ न गये | बाप दारू पीते-पीते यमलोक सिधार गया और बेटों के लक्खन बाप से कुछ कम न थे हो गये धंधे लंबे | इधर महारानी की किटी पार्टीज कम न होंगी | उधार लेकर भी शौक पूरी करेंगी फिर चाहे कुछ भी गिरौ रखना पड़ जाए | नासपीटी अब जाकर समझी है जब एक थैली दूध के सहारे कई दिन गुजारने पड़ते हैं और खाने के लिए बहाने से लोगों के घर मिलने जाना पड़ने लगा है | कभी दो पैसे प्रॉपर्टी कमीशन से मिल गये तो ठीक वरना भिखारी हमसे बेहतर नजर आते हैं |
(4)
     किसी को कह भी नहीं सकते किस दशा में हैं | बड़ी हवेली के मालिक जो हैं | सत्तर की उमर हो चली अब स्वास्थ्य भी कुछ साथ नहीं देता | तृप्ति भी अपने गंठिया और कमर को लेकर हाय-हाय करती नजर आती है | रोजाना किसी न किसी की ठुकुर-सुहाती (मनुहार) करके जीवन की जरूरतें पूरी कर रहे हैं | एक दिन बड़ा बेटा पुरुषोत्तम सिंह दनदनाता आया और बिरादरी में फ़ैल रही बदनामी को लेकर चार बात सुना गया | उसके चले जाने के बाद धीरे से मेरे मुँह से बोल फूटे "इतनी ही चिंता थी अपने मान की तो लोगों से भीख लेने के पहले खुद ही क्यों नहीं दे जाता?" पर सुने कौन? जाने वाला तो फुर्र |
(5)
     दीमक लगी किताबों के कई चट हो चुके कई पन्नों को अज्यूम करके पढ़ना होता था फिर भी पढ़ने की आदत छोड़ नहीं पाया, वो अलग बात है कि सही अज्यूम इसलिए हो पता था कि सारे पन्ने बीते बरसों में जाने कितनी ही बार लगभग कंठस्थ हो रखे थे | बुढिया से ठीक से बन नहीं पायी | शादी के कुछ साल बाद ही से अलग रह रहे हैं जो आज तक चल रहा है | पत्नी सुख क्या होता है ये बात सिर्फ नये शादीशुदा ही बता सकते हैं, पुराना होने पर तो वे भी हसरतों भरी नजर से औरों को बस ताकते भर रह जाते हैं | ऐसा ही कुछ कहना हमारी अर्धांगिनी का भी था फिर जाने कौन सही कौन गलत | बहुधा कहा करता किसी दिन बाहर जाऊँगा तो लौटकर मुँह देखने भी नहीं मिलेगा क्यों करती है इतनी हत्या? हर बार कहती बुढऊ तुम एक बार शहीद होकर तो दिखाओ, एक कतरा भी बहा दिया ना तो मेरा नाम नहीं |
(6)
     आज सुबह से ही मन कुछ विचलित सा हो रहा था | खुराना चला गया लेकिन अपने पीछे कई सारे अबूझ सवाल छोड़ गया | बोला कौन है जो तेरे साथ रहेगा? मान ले भगवान न करे तू अकेला रह गया या तृप्ति भाभी ही अकेली रह गयीं तो कौन होगा जो साथ होगा या काम आयेगा? और जिन्दा रहे तब भी कब तक दूसरों के यहाँ बहाने से पाए चाय-नाश्ते के सहारे पलते रहेंगे? कभी तो लोग दुत्कारेंगे या खुद हम ही नहीं जा पाएंगे कहीं | अशक्त हो जाने के बाद भी कभी माँ-पिताजी की परवाह नहीं की और अब जब अपना समय आया तो वे सारे दिन चलचित्र बन सामने गर्दिश कर गये | बेशक ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन घर के कोने में जरुर रखा था लेकिन ये पुरु और रिपु ने तो खाने तक की सुध नहीं ली | इज्जत के नाम सैंकडों दुहाई दे जाते हैं लेकिन कभी ये न सोचा कैसे पलेंगे दो अशक्त प्राणी |
(7)
     बड़ी देर से पेट में कुलबुल सी हो रही थी | उधर तृप्ति भी इसी अवस्था में अपने कमरे में करवटें बदल रही थी जो उसके चरमराते पुराने पलंग की आ रही आवाजों से समझ आ रहा था | जाने कितने अरसे बाद फिर से प्रेम और दयाभाव का प्रादुर्भाव हुआ अपनी अर्धांगिनी के लिए | बड़ा तरस आया बेचारी पर और पहली बार सीधे असल वजह बता किसी से माँगकर भरपेट भोजन की व्यवस्था करने हिलते शरीर के साथ बाहर को चल दिया | हवेली से निकलते ही किसी उद्दंड बालक की साईकिल से टकराते-टकराते बचा | मुझे लगा ही था कि अभी दर अधिक बुरी नहीं हुई है लेकिन जब कई दरों से बैरंग लौटना पड़ा तब जाकर समझ आया कि क्यों आये दिन बेटे अपनी इज्जत का हवाला लेकर दो बात सुना जाते थे |
(8)
     यूँ ही भटकते बड़े चौक तक जा निकला जहाँ सबसे ज्यादा ट्रैफ़िक और चहल-पहल रहा करती है | किनारे से चल ही रहा था कि किसी जल्दबाज के टकरा जाने से मिले धक्के ने पीछे से आ रही किसी गाड़ी से टक्कर का आयोजन करवा दिया | धडाक की आवाज ब्रेक्स की चरमराहट अचानक उठाई चीखें दर्द की गहरी लकीर दिमाग से कमर तक और एकदम से सब घुप्प | निहायत ही बुरी किस्म का सन्नाटा | अपनी जगह खड़े होकर देखता क्या हूँ कि हर कोई मुझसे कुछ दूर देखे जा रहा है और किसी को मेरी पड़ी नहीं जबकि अभी हाल ही ठुका था | फिर जैसे ही उस ओर देखा जहाँ लोग आकर्षित थे एकदम से साकत अपनी जगह सुन्न खड़ा रह गया | नीचे फैलते लहू के छोटे तालाब के ऊपर कोई और नहीं मैं ही पड़ा था निश्छल, साकत, पूरी तरह शांत | चेहरा सड़क से खाक चाटता नजर आ रहा था और अजीब तरीके से ऐंठा शरीर सामने ही तो पड़ा था | बमुश्किल यकीन आया कि वो अब मैं नहीं रहा और ये मैं जाने क्या बन गया हूँ | लोगों से बात करने की कोशिश की परन्तु जैसे किसी ने न देखा न सुना | बाद का घटनाक्रम शांत होकर अपनी आँखों से देखा |
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     गाड़ी बुलाई गयी, छोटा शहर होने से लोगों को पता था सो शहादत गुमनाम नहीं रही और पार्थिव सीधे हवेली पहुँचा दिया गया | बुढिया जो अपने कमरे से कम ही निकलती थी लोगों का सहारा लिए चुपचाप बाहर आयी और एकटक नीचे पड़े मुझपर नजरें टिकाकर वहीं पास बैठ गयी | सीधा करके मुझे चित्त लिटाया गया था और आने वालों की संख्या बढती जा रही थी | पास की दीवार की टेक लगाये एकटक देखती तृप्ति से किसी ने कुछ कहा और प्रतिसाद न पाकर हिलाया तो लद्द से बेजान अपनी जगह पर लुढक गयी | सैंतालीस साला वैवाहिक जीवन खत्म हो जाने के बाद पता चला कि मेरे जाने का गम उसे इतना विकट होगा कि देखते ही देखते परिंदा बाद वह भी मुक्त हो लेगी | वहीं दूसरी तरफ धीमी आवाज में पुरुषोत्तम और रिपुदमन में सह-पत्नी हवेली के बंटवारे को लेकर बहस हो रही थी कि किस तरह बहन को हिस्सा ना देना पड़े और खुद भी आधे से अधिक कैसे पा जायें | सामने ही खुराना खड़ा था मेरा यार | एक उसी के ओठों पर मंद-मृदुल सी मुस्कराहट थी जैसे कह रहा हो "जाओ दोस्त तुमने मेरी बात को सुनकर ऐसा हल निकाल लिया जिसके बाद आने वाली कोई परेशानी तुम दोनों को छू भी न पायेगी"| फिर चुपचाप से आँखों के कोरों पर आयी दो बूंदों को रुमाल में समेटते वहाँ से निकल लिया |

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (30-08-2012)
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