मिन्नतें..



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गुजर गया जीवन सारा,
मिन्नतें करते,
न मिलना था,
न मिल सका कुछ कभी हमें,

वो तो तुम थे,
जो आये इस जीवन में,
बन बहार का अहसास,

वरना गुजर लिया था,
ठोकरें खाते,
मेरा यह जीवन सारा..

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (27-06-2011)

Photography by :- Jogendra Singh
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Comments

4 Responses to “मिन्नतें..”

27 June 2011 at 7:12 PM

सुंदर अभिव्यक्ति जोगी भाई .... कुछ सहारे जीवन का अहम अंग बन जाते है और जीवन उसके साथ समय हंसीखुशी बीत जाता है और आगे भी उसी लय और भावके साथ .... शुभाकांनाए

1 July 2011 at 3:39 PM

kyon nirasha jhalak rahi hai kavita mein.. aapke swabhav ke viprit hai . shubhkamnaen!

1 July 2011 at 8:57 PM

▬● प्रति भईया , सच है ,,, और उन्हीं सहारों के सहारे सारा जीवन गुजर लेता है........

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1 July 2011 at 8:58 PM

▬● अपर्णा जी , स्वाभाव पर किसी का बस ही कहाँ ......

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