अलगाववादी



@ एक सोच @

क्या लगता है..? अलगाववादी सिर्फ आतंकी ही हो सकते हैं, वे भीतर भी भरे हुए हैं, जो अपनी हर बात पर बवाल खड़ा कर अन्यों को तकलीफदेह स्थितियों में पहुंचा देते हैं, फिर चाहे वह जाति व धर्म के नाम पर हो या व्यक्तिगत कुंठा को निकलने जरिया मात्र.....

: जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh )

.
अलगाववादीSocialTwist Tell-a-Friend

आम आदम



@ एक विचार @

अपने और समाज के बीच पिस जाता है आम आदम.. न अपने लिए ही कुछ कर पाता है और न समाज ही को कुछ दे पाता है.. यही है बहुलता से उपलब्ध इंसान की कड़वी सच्चाई.. जो इसके विपरीत हैं वे संख्या में ज़रा से हैं.. उनके होने न होने से कोई बड़ा फर्क नहीं आ जाता..

(..जोगेन्द्र सिंह..)

.
आम आदमSocialTwist Tell-a-Friend

स्वतंत्र-परतंत्र ( सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..? )



  • स्वतंत्र-परतंत्र
  • मात्र-भूमि पर कुर्बान हो होकर दी गयी क्रांतिकारियों की शहादत का अंजाम आज कुछ यूँ नज़र आता है कि पहले गोरे अंग्रेज़ हम पर राज किये जाते थे और अब वाले अंग्रेज़ काले रंग के हैं l मात्र शासक बदला है मगर व्यवस्था बद से बदतर होती चली गयी है l
  • आज़ादी से करीब 63-वर्ष बीत चुके हैं मगर तंत्र कहीं ज्यादा बिगड़ा नज़र आता है l आज भी पुराने लोग कहते नज़र आ जाते हैं कि इससे अच्छा राज तो अंग्रेजों का ही था l तब कम से कम यह दुःख तो न था कि अपने ही खाए जाते हैं l पैदा होने से लेकर पढाई, खेल, एडमिशन, नौकरी, दफ्तर तक़रीबन सभी जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है l जैसे बिन पैसे खिलाये तो आदमी चैन से मर तक नहीं सकता, वहां भी सर्टिफिकेट का खेल शुरू हो जाता है l
  • किसी भी मुद्दे पर बात या बहस करना जितना आसन है उतना ही मुश्किल होता है उसके समग्र समुचित हल तक पहुंचना..और यह कोई एक दिन या एक वर्ष का कमाल नहीं हो सकता बल्कि खुद को इसमें झौंकना होता है जो कि आम तौर पर सामान्य इन्सान अपने बस के बाहर समझते हैं.. या यूँ कहें कि एक आम भारतीय मुसीबतों को झेल-झेल कर इतना पक्का हो चुका है कि उसे अपने मूलाधिकारों तक का भान भी नहीं रहा है..सिस्टम में जितनी गन्दगी है उसे बढ़ावा देकर वह भी आगे की ओर अग्रसर हो लेता है यह सोचकर कि यह तो होता ही है.. इसे कौन रोक सकता है.. फिर चाहे वह रिश्वत देना हो या लेना या चाहे कोई चारा ही चर जाए यहाँ किसी को कोई अंतर नहीं आता..
  • आज सेना जैसा सुरक्षा तंत्र भी इसका अपवाद नहीं रहा l सुनी सुनाई बातें ही नहीं कुछ संपर्को द्वारा भी जान पाया कि इस सर्वाधिक सम्माननीय तंत्र में भी भ्रष्टाचार घुसपैठ बना चुका है l हथियारों का सौदा हो या फौजी रसद का कॉन्ट्रेक्ट सभी जगह पैसे का खेल दिखाई पड़ता है l अक्सर यहीं से राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित गोपनीय दस्तावेज़ बेचते अधिकारीगण पकडे जाते हैं l और भी जाने क्या क्या l
  • जिसे देखो राष्ट्र के नाम आज अपनी भावनाओं को बाँटे जा रहा है lजैसे आज सिर्फ एक ही दिन में सारे सुधार आन्दोलन हो लेंगे l किसी और का मत जो इनकी समझ से परे है या जो इनकी सोचों के विपरीत है इनकी नज़र में वह यक़ीनन एक गद्दार का मत है l जैसे आज राष्ट्र-भक्ति साबित करने के लिए इन्होने सर्टिफाई कोर्स खोल राखा है और जिसने इनसे दीक्षा नहीं पायी वह कॉंग्रेसी या पाकिस्तानियों का पिट्ठू है l
  • जिन मुद्दों को ये लोग उठाते हैं वे भी व्यक्तिगत अहमों के चलते गौण हो जाते हैं या मुद्दे उठाये ही इसीलिए जाते हैं कि कोई थोथी प्रसिद्धि मिल सके l कभी टीवी चैनल पर तोड़-फोड़ कि जाती है तो कभी परप्रान्तियों को भागने के नाम पर उनकी रोज़ी-रोटी पर हमला किया जाता है l अपने प्रान्त के लोगों को क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा पाने को कहा जाता है और खुद के बच्चे इंग्लिश स्कूल में ऐश करते नज़र आते हैं l परप्रांती इनकी पार्टी में भी जगह पाते हैं और उनकी सहायता से उन्हीं को भी भागते नज़र आते हैं l कोई हिन्दू की बात करते हैं और हिन्दू ही उनसे प्रताड़ित दिखाई देता है l

  • कब बंद होंगी ये दोगली नीतियाँ..? एक ही मुद्दे पर अपने लिए कोई और सोच और अन्यों के लिए कोई और ही मानदंड, आखिर क्यूँ..?
  • सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..?

( शहीदों की मजारों को रौशन करने से कुछ हांसिल नहीं होगा..
जो होगा कुछ तो बस उनके सौंपे देश को चमन बनाने से होगा.. )



  • जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 14 अगस्त 2010 )

.
स्वतंत्र-परतंत्र ( सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..? )SocialTwist Tell-a-Friend

शहीदों की मज़ार



शहीदों की मजारों को रौशन करने से हांसिल कुछ नहीं होगा..
जो होगा कुछ तो बस उनके सौंपे देश को चमन बनाने से होगा..

(..जोगी..)
11-अगस्त-2010


.
शहीदों की मज़ारSocialTwist Tell-a-Friend

तिरंगे की दुर्गति



सबसे पहले ll भारत माता को सादर वन्दे ll

► मैं आज सभी भारतीयों से एक बात बांटना चाहता हूँ.. वह यह कि अचानक फेसबुक पर किसी मोहतरमा के द्वारा डाले गए स्टेटस पर मेरे मित्र सत्यव्रत जी की नज़र पड़ी तो उन्होंने इसकी भाषा पर आपत्ति जतायी कि अगर कुछ गलत किया गया है तो उस गलत को जाताने का भी एक सम्माननीय तरीका होता है.. फिर मेरा मानना भी है कि जब बात राष्ट्र-ध्वज की हो रही हो तो आपकी भाषा में और अधिक शालीनता आ जानी चाहिए..

►
उक्त महिला ने अपने स्टेटस में जो लिखा था उसे ब्रेकेट्स में यहाँ ज्यों का त्यों दे रहा हूँ >>>
(( आज देश प्रेम की बाते बरसाती मेंढक की टरटराहट की तरह हो गयी है ! सारा फेसबुक देशभक्ति से रंगा हुआ है ! कुछ अपने प्रोफाइल फोटो में तिरंगा लगा रहे हैं तो कुछ पाकिस्तान को कोसने में लगे है और कुछ फेसबुकियो ने ऐसा बवाल मचाया है आजकल कि वे देश कि सारी समस्याओ का सारा निपटारा अभी फेसबुक पर ही कर के दम लेंगे! इसके ठीक एक दिन बाद ही यानि कि १६ अगस्त और २७ जनवरी को ही हमें तिरंगा कूड़े या सडको पर फेंका हुआ हुआ नज़र आएगा ! ))

► आप सभी से एक सवाल है मेरा कि जिस भी महान विभूति ने ने फेसबुक में ऐसा स्टेटस डाला है उसकी अपनी मंशा क्या रही होगी इसके पीछे, यह तो वही बता सकती है, परन्तु क्या आप में से कोई एक, सिर्फ एक भी मुझे इस बात कि गारंटी दे सकेगा कि ऐसा सच में नहीं होने वाला है..?

► किसी और ने देखा हो या नहीं देखा हो लेकिन अपने बचपन से बचपन से अब तक इस तरह के कुकृत्य देखता आ रहा हूँ मैं..ऊपर वाले की है उन पर जिन्हें ऐसा करते मैं कभी देख नहीं पाया अन्यथा उनकी गत अपेक्षाकृत कहीं अधिक बुरी होती..

► इसका हल किसी इंसान मात्र को कोसने से नहीं निकलने वाला, बल्कि सार्थक हल निकलेगा जब हम ऐसी सफलता पायें जो किसी भी ख़ास दिन जो राष्ट्र के लिए समर्पित हो, पर सार्वजानिक रूप से झंडे का वितरण रोक सके..

► क्या लगता है आप लोगों को..? कोई भी हाथ में देश के सम्मान चिन्ह के रूप में एक झंडा लिए चलता आएगा और कहेगा मैं देश भक्त हूँ तो यह मान लेने लायक बात है..? या सिर्फ ध्वजा हाथ में ले लेना ही राष्ट्र-भक्ति का परिचायक है.. अगर सिर्फ झंडे को हाथ में लेना ही सबूत है तो सारे गद्दार इसे ले लेकर इसकी आड़ में अपनी करतूतों को अंजाम दिए जायेंगे.. कौन रोकेगा उन्हें..

► मेरा यह मानना है कि जिस तरह वर्ष के अन्य दिवसों में राष्ट्र-ध्वज केवल जगह विशेषों पर ही फहराया जाता है ठीक वैसे ही ख़ास दिवसों पर भी होना चाहिए ताकि ध्वज के साथ हो रही कथित संभावित अवमानना से बचा जा सके..

► जो लोग मेरे इस विचार विरोध में आना चाहें, पहले वे बिना ध्वज अपनी राष्ट्र-भक्ति साबित करें फिर ध्वज को हाथ लगाने कि जुर्रत करें..


► ll वन्दे मातरम ll

► जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 11 अगस्त 2010 )


Note :- उपरोक्त लेख पर मेरे फेसबुक प्रोफाईल पर छिड़ी बहस देखना चाहें तो नीचे वाले लिंक पर क्लिक करे >>>
http://www.facebook.com/photo.php?pid=192991&id=100000906045711&ref=fbx_album


.
तिरंगे की दुर्गतिSocialTwist Tell-a-Friend
Related Posts with Thumbnails