आम आदम



@ एक विचार @

अपने और समाज के बीच पिस जाता है आम आदम.. न अपने लिए ही कुछ कर पाता है और न समाज ही को कुछ दे पाता है.. यही है बहुलता से उपलब्ध इंसान की कड़वी सच्चाई.. जो इसके विपरीत हैं वे संख्या में ज़रा से हैं.. उनके होने न होने से कोई बड़ा फर्क नहीं आ जाता..

(..जोगेन्द्र सिंह..)

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Comments

2 Responses to “आम आदम”

DEEPAK BABA said...
20 August 2010 at 10:36 PM

जोगिन्दर जी, अच्छी ट्विट किया है आपने.

एक सोच दी........

22 August 2010 at 2:43 PM

@ दीपक जी, आपका आभार...

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