स्वतंत्र-परतंत्र ( सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..? )



  • स्वतंत्र-परतंत्र
  • मात्र-भूमि पर कुर्बान हो होकर दी गयी क्रांतिकारियों की शहादत का अंजाम आज कुछ यूँ नज़र आता है कि पहले गोरे अंग्रेज़ हम पर राज किये जाते थे और अब वाले अंग्रेज़ काले रंग के हैं l मात्र शासक बदला है मगर व्यवस्था बद से बदतर होती चली गयी है l
  • आज़ादी से करीब 63-वर्ष बीत चुके हैं मगर तंत्र कहीं ज्यादा बिगड़ा नज़र आता है l आज भी पुराने लोग कहते नज़र आ जाते हैं कि इससे अच्छा राज तो अंग्रेजों का ही था l तब कम से कम यह दुःख तो न था कि अपने ही खाए जाते हैं l पैदा होने से लेकर पढाई, खेल, एडमिशन, नौकरी, दफ्तर तक़रीबन सभी जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है l जैसे बिन पैसे खिलाये तो आदमी चैन से मर तक नहीं सकता, वहां भी सर्टिफिकेट का खेल शुरू हो जाता है l
  • किसी भी मुद्दे पर बात या बहस करना जितना आसन है उतना ही मुश्किल होता है उसके समग्र समुचित हल तक पहुंचना..और यह कोई एक दिन या एक वर्ष का कमाल नहीं हो सकता बल्कि खुद को इसमें झौंकना होता है जो कि आम तौर पर सामान्य इन्सान अपने बस के बाहर समझते हैं.. या यूँ कहें कि एक आम भारतीय मुसीबतों को झेल-झेल कर इतना पक्का हो चुका है कि उसे अपने मूलाधिकारों तक का भान भी नहीं रहा है..सिस्टम में जितनी गन्दगी है उसे बढ़ावा देकर वह भी आगे की ओर अग्रसर हो लेता है यह सोचकर कि यह तो होता ही है.. इसे कौन रोक सकता है.. फिर चाहे वह रिश्वत देना हो या लेना या चाहे कोई चारा ही चर जाए यहाँ किसी को कोई अंतर नहीं आता..
  • आज सेना जैसा सुरक्षा तंत्र भी इसका अपवाद नहीं रहा l सुनी सुनाई बातें ही नहीं कुछ संपर्को द्वारा भी जान पाया कि इस सर्वाधिक सम्माननीय तंत्र में भी भ्रष्टाचार घुसपैठ बना चुका है l हथियारों का सौदा हो या फौजी रसद का कॉन्ट्रेक्ट सभी जगह पैसे का खेल दिखाई पड़ता है l अक्सर यहीं से राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित गोपनीय दस्तावेज़ बेचते अधिकारीगण पकडे जाते हैं l और भी जाने क्या क्या l
  • जिसे देखो राष्ट्र के नाम आज अपनी भावनाओं को बाँटे जा रहा है lजैसे आज सिर्फ एक ही दिन में सारे सुधार आन्दोलन हो लेंगे l किसी और का मत जो इनकी समझ से परे है या जो इनकी सोचों के विपरीत है इनकी नज़र में वह यक़ीनन एक गद्दार का मत है l जैसे आज राष्ट्र-भक्ति साबित करने के लिए इन्होने सर्टिफाई कोर्स खोल राखा है और जिसने इनसे दीक्षा नहीं पायी वह कॉंग्रेसी या पाकिस्तानियों का पिट्ठू है l
  • जिन मुद्दों को ये लोग उठाते हैं वे भी व्यक्तिगत अहमों के चलते गौण हो जाते हैं या मुद्दे उठाये ही इसीलिए जाते हैं कि कोई थोथी प्रसिद्धि मिल सके l कभी टीवी चैनल पर तोड़-फोड़ कि जाती है तो कभी परप्रान्तियों को भागने के नाम पर उनकी रोज़ी-रोटी पर हमला किया जाता है l अपने प्रान्त के लोगों को क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा पाने को कहा जाता है और खुद के बच्चे इंग्लिश स्कूल में ऐश करते नज़र आते हैं l परप्रांती इनकी पार्टी में भी जगह पाते हैं और उनकी सहायता से उन्हीं को भी भागते नज़र आते हैं l कोई हिन्दू की बात करते हैं और हिन्दू ही उनसे प्रताड़ित दिखाई देता है l

  • कब बंद होंगी ये दोगली नीतियाँ..? एक ही मुद्दे पर अपने लिए कोई और सोच और अन्यों के लिए कोई और ही मानदंड, आखिर क्यूँ..?
  • सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..?

( शहीदों की मजारों को रौशन करने से कुछ हांसिल नहीं होगा..
जो होगा कुछ तो बस उनके सौंपे देश को चमन बनाने से होगा.. )



  • जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 14 अगस्त 2010 )

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Comments

5 Responses to “स्वतंत्र-परतंत्र ( सवाल हैं बहुतेरे, है कोई उत्तरदाता..? )”

15 August 2010 at 6:01 AM

सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिन्दगी एक हवन है वतन के लिए
कह गई फ़ांसियों में फ़ंसी गरदने
ये हमारा नमन है वतन के लिए

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

15 August 2010 at 8:22 AM

सवाल तो बहुत है और जवाब देने भी कोई नहीं आयेगा| हमें ही देना है, जो कुछ करना है हमें ही करना है| स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये|

pratibha said...
15 August 2010 at 8:46 AM

आज सुबह उठते ही सबसे पहले आपके अनुत्तरित प्रश्नों के पढ़ा। जोगेन्द्रजी आपने बिलकुल ठीक कहा है हम प्रश्न तो बहुत उठाते हैं, परंतु उनके उत्तर ढ़ूढ़ने की चेष्टा कभी नहीं करते। इसलिए अक्सर प्रश्न ही बेमानी हो जाते हैं। वर्ष में दो बार शहीदों को याद करना या सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा गा लेने से हिंदुस्तान अच्छा नहीं होगा। हिंदुस्तान को अच्छा बनाने के लिए हम सब को अपने अंतस में झांकना होगा और देखना होगा कि आखिर गलती कहां हुई कि हमारे बुर्जुगों को आज भी अंग्रेजी राज्य की याद सताती है। भ्रष्टाचार रूपी कीड़ा जो देश को तिल-तिल कर चाट रहा है वह सिर्फ गाने गाने से या व्याख्यान देने से नष्ट नहीं होगा। उसके लिए एक नए जन-आंदोलन की जरूरत है। जय हिंद।

pratibha said...
15 August 2010 at 8:49 AM

आज सुबह उठते ही सबसे पहले आपके अनुत्तरित प्रश्नों के पढ़ा। जोगेन्द्रजी आपने बिलकुल ठीक कहा है हम प्रश्न तो बहुत उठाते हैं, परंतु उनके उत्तर ढ़ूढ़ने की चेष्टा कभी नहीं करते। इसलिए अक्सर प्रश्न ही बेमानी हो जाते हैं। वर्ष में दो बार शहीदों को याद करना या सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा गा लेने से हिंदुस्तान अच्छा नहीं होगा। हिंदुस्तान को अच्छा बनाने के लिए हम सब को अपने अंतस में झांकना होगा और देखना होगा कि आखिर गलती कहां हुई कि हमारे बुर्जुगों को आज भी अंग्रेजी राज्य की याद सताती है। भ्रष्टाचार रूपी कीड़ा जो देश को तिल-तिल कर चाट रहा है वह सिर्फ गाने गाने से या व्याख्यान देने से नष्ट नहीं होगा। उसके लिए एक नए जन-आंदोलन की जरूरत है। जय हिंद।

Dilip Shinde said...
15 August 2010 at 11:23 AM

kya kare hamari sarkar mein jo pahale naukarshaha the ve ab rajneta ban gaye hai. Kagaj par vikaas, gareebi ki rekha, aur na palle padnewale aankado ka jaal in sabka ek aisa chitra banaya hai ke use dekhkar Amerika aur urope bhi sharm ke maare kahi jaakar doob jaaye

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