गुस्ताखी और नशा



आँखें तेरी दिल मेरा हो..गुस्ताखी तेरी दुखन मुझे हो..
नशा इश्क का कुछ हो ऐसा, बिन नशे फिर रहा ना जाये..

..जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh.. ( 31 जुलाई 2010 )
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समय खपाई

@..मेरी समझ..@
आज और कल के बीच अधूरे सवाल छोड़ देना अथवा अनायास ही उनका छूट जाना फिर अनसुलझे प्रश्नों के उत्तरों को ठीक उसी प्रकार खोजना जैसे आज तक विद्वान एवं मनीषी मोनालिसा की मुस्कान का रहस्य समझने में लगे हैं.. क्या यह समय खपाई ज़रूरी है..? .....(.....जोगी.....)
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सिगरेट और आदमी

@..मेरा ख़याल..@
सिगरेट का जीवन इंसानी जीवन से बहुत ज़ुदा नहीं है.. पहले उसे मुँह से लगा फिर टोटा जूते टेल रौंदा जाता है ठीक वही हाल इन्सान का भी है.. पहले पूजा जाता फिर काम निकल जाने के पश्चात् क़दमों तले रौंदा जाता है.. "दर है दो कौड़ी की.. आदमी अब है यही नियति तेरी".....

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह

Reactions at my Facebook status :

Babita Shroff : in such case jogi what should one do ?????............

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : तुम्हारा सवाल मुश्किल है @ बबीता.. ये तो उसी समय की situation पर depended है....

Shailendrasinhji Sarvaiya : Jogisa'b! Ye tumne kadva sach kahe diya, kya yaar, kabhi to juth bola karo, radhekrishna!

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : क्या करूँ ज़नाब झूठ बोलने की कोशिश तो बहुत करता हूँ पर बोल ही नहीं पाता,,,!!

Babita Shroff : bhakti,shakti aur yukti yadi ye teen tantra insaan apnaa le toh usse koi nahin raund sakta,,,.........

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : अपना अपना सोचना है @ बबीता.. भगवान कृष्ण ने कोई यूँही शंख बजा कर कलयुग का आह्वान नहीं किया था.. आज सच से बड़ा झूठ है.. ईमानदारी से बड़ी भ्रष्टाचार की नियत है.. आज बाली से विजित होने के लिए राम को नाकों चने चबाने पड़ते हैं फिर भी राम नहीं जीत पाता, क्योंकि पहले की तरह आज के राम के हाथों में धनुष चलने का अधिकार नहीं है, और अदालतों में राम की फकीरी नहीं रावण के सोने की पूछ है..

Babita Shroff ‎@jogi very true jogi fr such revolutions we need to work in a group ek akela insaan kuchh nahin kar sakta isiliye hum kahte hai na ki ''SANGCHHATVAM''need to be together....

राजेश शर्मा यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
भावार्थ : यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और... मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥

Braj Kishore Singh उपमा-उपमेय की अद्भूत छटा.
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सवाल और समस्या


@..उठते सवाल..@
देश के सवाल और समस्या दोनों ही बड़ी किस्म के हैं.. हम, आप या पूरा देश लाख झक मार ले पर ये उच्च कोटि के रंगमंचीय अदाकार (नेतागण) ऐसे नहीं मानने वाले.. उसके लिए कुछ क्रांतिकारी क़दमों की आवश्यकता होती है.. और जैसा कि हम जानते ही हैं कि हर रोज़ एक क्रांति नहीं होती, एक स्वतंत्रता संग्राम जन्म नहीं लिया करता.. सो इन्हें झेले जाओ बस .....
.....(..जोगी..)

सत्येन्द्र कुमार bahut khoob jogindra bhai......
haan ek wyakaranik jaankari chahunga...ki kya सटीकता sahi bhaaw wachak sangya hai???
kripya ispar prakash dalenge...

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह ▬► सत्येन्द्र जी.. आज व्याकरण शायद उतनी बड़ी ज़रूरत नहीं रह गयी है जितनी कि बदलावकारी सोचों का उचित मस्तिष्क तक पहुँच पाना...... :)

सत्येन्द्र कुमार jogi ji soch apni jagah hai aur use jahir karne ka praaroop apni jagah..to jab praroop hi nahi bhala hoga to badlaawkari shabdo ke sanche kitne prabhawi honge ye aboojh nahi..!..haan kisi ek-wishesh ke liye apni daanyi aankh daba lena ham-a...p jaise shabdwanshi ko shobha nahi deta na.....
waise aajtak maine kahin "sateekta "shabd nahi padha tha...sach kahoon to mujhe bhi nahi pata ki ye sahi hai ya galat...
bas aapse jaankari chahi thi ki kya ye rojmarra ki bhasha me upyog ho rha hai....
kripya anyatha na le...

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह ▬► सत्येन्द्र जी.. अच्छा सवाल उठाया है आपने.. जिज्ञासा ज़रूरी है, और होनी भी चाहिए क्योंकि जिज्ञासा ही ज्ञान की ओर जाने वाला पथ है.. लेकिन जानकारी के लिए बता दूँ कि ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनका आविष्कार इसी तरह मनमाने तरीकों से हुआ है.. स्थान...ीय निवासियों के वार्तालाप का अंदाज़ सदियों में भाषा के साथ नए शब्द जोड़ता चलता है.. सो गलत कुछ भी नहीं और मानो तो सब कुछ ही गलत है.. देखें तो कभी हिंदी नाम कि कोई भाषा थी ही नहीं.. इसे कई भाषों का सम्मिश्रण करके व्युत्पन्न कर दिया गया.. तो क्या हम इसे भाषा मानने से ही इनकार कर दें, जबकि विश्व कि आबादी का एक हद से अधिक बड़ा हिस्सा इसी को अपने भावों के आदान-प्रदान का माध्यम बनाये बैठा है..?
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बेलगाम महत्वाकांक्षायें



@ उभरती सोच @
बेलगाम महत्वाकांक्षायें पूरी तरह से वर्तमान युग को सटीकता से परिभाषित करती हैं.. अधूरी असम्भाव्य महत्वाकांक्षाओं से पार पाना आज के दौर में लाईलाज रोग का सा दर्ज़ा पा चुका है.. इनसे पार पाने के बदले इन्हीं के दलदल में और गहरे धँसते जाना बेवकूफों की नियति बनती जा रही है.. कोई नहीं समझता कि वस्तुस्थिति जो आज है कल बदल भी सकती है, तब क्या करोगे..? है कोई ज़वाब..?
.....(..जोगी..)
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