सिगरेट और आदमी

@..मेरा ख़याल..@
सिगरेट का जीवन इंसानी जीवन से बहुत ज़ुदा नहीं है.. पहले उसे मुँह से लगा फिर टोटा जूते टेल रौंदा जाता है ठीक वही हाल इन्सान का भी है.. पहले पूजा जाता फिर काम निकल जाने के पश्चात् क़दमों तले रौंदा जाता है.. "दर है दो कौड़ी की.. आदमी अब है यही नियति तेरी".....

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह

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Babita Shroff : in such case jogi what should one do ?????............

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : तुम्हारा सवाल मुश्किल है @ बबीता.. ये तो उसी समय की situation पर depended है....

Shailendrasinhji Sarvaiya : Jogisa'b! Ye tumne kadva sach kahe diya, kya yaar, kabhi to juth bola karo, radhekrishna!

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : क्या करूँ ज़नाब झूठ बोलने की कोशिश तो बहुत करता हूँ पर बोल ही नहीं पाता,,,!!

Babita Shroff : bhakti,shakti aur yukti yadi ye teen tantra insaan apnaa le toh usse koi nahin raund sakta,,,.........

Jogendra Singh जोगेंद्र सिंह : अपना अपना सोचना है @ बबीता.. भगवान कृष्ण ने कोई यूँही शंख बजा कर कलयुग का आह्वान नहीं किया था.. आज सच से बड़ा झूठ है.. ईमानदारी से बड़ी भ्रष्टाचार की नियत है.. आज बाली से विजित होने के लिए राम को नाकों चने चबाने पड़ते हैं फिर भी राम नहीं जीत पाता, क्योंकि पहले की तरह आज के राम के हाथों में धनुष चलने का अधिकार नहीं है, और अदालतों में राम की फकीरी नहीं रावण के सोने की पूछ है..

Babita Shroff ‎@jogi very true jogi fr such revolutions we need to work in a group ek akela insaan kuchh nahin kar sakta isiliye hum kahte hai na ki ''SANGCHHATVAM''need to be together....

राजेश शर्मा यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
भावार्थ : यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और... मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥

Braj Kishore Singh उपमा-उपमेय की अद्भूत छटा.
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Comments

3 Responses to “सिगरेट और आदमी”

31 July 2010 at 7:19 PM

अच्छी और सच्ची प्रस्तुती,शानदार तब और होता जब सिगरेट की जगह कोई और उदहारण प्रस्तुत किया गया होता ...

31 July 2010 at 7:25 PM

दोस्त समाज को हम उसके वास्तविक रूप में स्वीकार क्यूँ नहीं करना चाहते..? कि सिगरेट को अस्पर्श्य माना जाता है केवल इसीलिए..? होता तो कुछ इसी प्रकार है, बस घटनाक्रम बदलता रहता है..

आप सुझाएँ कुछ नया.......

Udan Tashtari said...
31 July 2010 at 8:07 PM

अब जो नियति है उससे क्या लड़ें..जब तक पूजे जायें तब तक खुश हो लें और क्या!!

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