अंकुरण




परस्पर विपरीत गुणधर्मों का मेल..
एक तरफ है सूखी धरती बंज़र-वीरान..
और है बाढ़ग्रस्त लबालब सोच सी दूजी..
मिलन उनका क्या संभव है..?

बन जाता जल मौत का वायस दोनों ही में..
फिर हो चाहे वह मौत प्यास से..
या होता प्रलय फिर बाढ़ विभीषिका सा..

क्यूँ होता है मानव मन दो भाग बँटा..?
बन बंज़र न उपजाता वह त्रण-मात्र कहीं..
न पनपता बन अतिआर्द्र भी त्रण-मात्र कहीं..

हैं विपरीत पर होता यह आकर्षण हर बार..
न संभाव्य न होता दृष्टिगत यह मेल कहीं..
तथापि "अंकुरण" पाता कोमल भाव निरंतर..

स्थान, स्थिति, अनुभूति हैं सब भिन्न-भिन्न..
है कुछ भान पारिस्थितिक वस्तुस्थिति का भी..
परन्तु है जाने कैसा मोह फंसा द्विपक्षों मध्य..
खिंचे चले आना उनका, बन रहा नियति जैसे..

है बेमेल पर नयनाभिराम सा, मेल द्वि-ध्रुवों का..
जुड़े हों जैसे रक्त-नील वर्ण परस्पर आधे-आधे..
परस्पर विपरीत गुणधर्मों का मेल..

एक तरफ है सूखी धरती बंज़र-वीरान..
और है बाढ़ग्रस्त लबालब सोच सी दूजी..
हाँ कदाचित बन जाये अब एक उपमान नया..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 10 अगस्त 2010 )

Photography by : Jogendra Singh ( Mumbai )


(सामान्य जीवन में अच्छे या बुरे का चरम बहुधा नहीं हुआ करता है.. परन्तु यह भी तो देखिये कि यहाँ मानव मन को अभिव्यक्त किया गया है, जिसकी सोचों का कोई पारावार नहीं होता.. जितना सोच जाये वही कम है.. सीमा बंधन सोचों के लिए बने ही नहीं हैं.. फिर लिखते वक्त मेरे मन में अपने मित्र सी हुई बातचीत थी जिसमे मैंने कहा था कि परस्पर दो विपरीत सोचों वाले लोग किस तरह एक दुसरे से आकर्षित हो लेते हैं, और होने पर जुड़े भी कैसे रह लेते हैं.. तत्पश्चात उसी के आगे पीछे जो विचार मन में आते गए, बस उन्ही को लिखता गया..)
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मैं एक हर्फ़ हूँ



मैं एक हर्फ़ हूँ..
मिले तुम भी एक हर्फ़ बनकर..
साथ जुड़े..
बना इक लफ्ज़..

साथ चले कुछ अरसा हम दोनों..
रंग जीवन के देखे संग संग..
लब, जुबान, वक़्त, जगह..
सब बदले..
तब भी..
न बदला संग हमारा..

जाने क्या हुआ अचानक..
तुम चले एक नयी दिशा को..
बनने भाग इक नयी कहानी का..
रह गया पीछे..
मैं तुम बिन..
पड़ा उसी कहानी में..

ऐ हर्फ़..
मेरे हमराही..
छोड़ मुझे क्यूँ चले गए तुम..
क्यूँ साथ मेरा न भाता तुम्हें..
नयी कहानी, नए अंतरे..
ह्रदय हुलराते अब तेरा..

सोच रहा हूँ..
तलाश रहा हूँ..
नयी सम्भावना..
फिर संग हो जाने की..

आये फिर से कोई..
खोज करे इक नए लफ्ज़ की..
और हो जाये प्रादुर्भाव..
फिर एक नयी कहानी का..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 09 अगस्त 2010 )

Photography by : Jogendra Singh ( Mumbai )

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चाँद की चाहत





चाँद की चाहत करोगे कब तक, न मिले तो बसर करोगे कब तक..
है वक्ती यह कैफियत ज़हन की, होश आने पर खुद पे हँसोगे कब तक..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 08 अगस्त 2010 )


Photography by : Jogendra Singh ( Mumbai)


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बात लबों पर



छुपी छुपी सी है बात लबों पर..
अहसासात भी हैं दबे दबे..

असर हुआ रद्दोबदल का..
कुछ इस क़दर..
कहनी थी तुमसे जो बात..
न पहना सके..
अमली जामा हम उसे..
जद्दोज़हद में है दिल शायद..
बीच इसके..
आकर तुम चले गए..

"कल रात बरसात में..
हुई तुमसे जो बात..
इशारों पर इशारे..
मौला क्या कहूँ..
बात तब भी न कह पाए तुमसे.."

कहना होता भी कैसे..?
सफ़र बचपन से ज़वानी तक..
गुज़रा है मेरा डर-डर के..

क्यूँ न समझ लेती..?
खुद ही तुम इसे..
बात परदे की..
रह जाती परदे ही में..
न तुम कुछ कहो..
न हम कुछ कहें..
बन जाने दो अब कहानी..
अनकही इस बात को..

चाहूँगा जगह अब..
दिन रात तुम्हारे खयालो में..
दे सको दे दो जगह वर्ना..
ज़बरन घुस-पैठ कर जाऊंगा..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 06 अगस्त 2010 )

Photography by : Jogendra Singh ( for both the pictures )
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सोचा न था




सोचा न था कि कभी, विविध पहलु जीवन के, होंगे उजागर इस क़दर कभी..
होंगी साँसें अधर में लटकी, हकीकी दुनिया से ज़ब होंगे वाकिफ यूँ हम कभी..

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 05 अगस्त 2010 )

Photegraphy by : Jogendra Singh http://jogendrasingh.blogspot.com/


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