कुछ सवाल खुद से (अनजान डायरी के पन्नों से)


कुछ सवाल खुद से ● © (अनजान डायरी के पन्नों से)
(मुख्य पात्र : नायक, जान्हवी, साढ़े तीन फेरे)

सुबह ही से मन में कोई अंजानी सी अनुभूति पैठ जमाए बैठी थी | यूँ तो जान्हवी मेरे मन की समझती थी मगर जानते-मानते होने के बावजूद उसने कभी इसे सीधे से एक्सेप्ट नहीं किया | करती भी कैसे, ज़माने भर के रेस्ट्रिक्शन्स जो पाल रखे थे मन में | उधर मैंने भी कभी जोर नहीं दिया कि वह भी वैसे ही सोचे जैसे कि मेरा सोचना था | उठ तो मैं तडके ही गया था मगर हमेशा की तरह आज बिस्तर छोड़ने की हिम्मत न जुटा पाया और उठते-उठते भी सुबह के दस बजा दिए | करने को काम कुछ था नहीं क्या करता कुछेक मेल्स निबटा दिए, कुछ सोसियल नेट्वर्किंग कर आया फिर टहलकदमी के लिए जरा बाहर की ओर चल दिया |

जाने कहाँ से एक पिल्ला संग संग चलने लगा जैसे कह रहा हो, चिंता न करो जब कोई न होगा तब भी मैं ऐसे ही तुम्हारे साथ कदम मिलाकर चलता दिखूंगा | यह वही नवजात है जिसे यदा-कदा मेरे पाँवों या जूतों के साथ खेलने मिल जाया करता है, हाथों तक तो बेचारे की पहुँच आज तक हो ही नहीं पाई थी | सोसाइटी की अंदरूनी मुख्य सड़क के आखिरी छोर तक आकर पलटकर चल भी दिया कि इतना साथ बहुत हुआ अब सम्हालो अपनी दुनियादारी | आगे मेडिकल वाले ऑटो स्टैंड पर एक नवयुवक मिन्नतें करने में लगा था और उसकी मालकिन (प्रेमिका होकर भी उसके हाव-भाव मालकिन के से ही लग रहे थे सो मालकिन कहना मुनासिब जान पड़ा) उसके साथ कुछ यूँ बिहेव कर रही थी कि मैं उस युवक और अपने साथ आये पिल्ले में कोई बड़ा अंतर नहीं कर पाया | कम से कम वो कुक्कुर अपनी मर्जी से आना-जाना तय तो कर पाया था | उनपर से अपना ध्यान हटा आगे बढ़ गया मैं |

मन में विचार जब तक सतरंगी न हों तो उसके मन होने पर शंशय होने लगता है | विचार कैसे न होते सतरंगी जबकि मैं अपने पास पूरे सवा सेर का ह्रदय लिए बैठा था | अभी हाल ही तो अचानक जान्हवी के व्यवहार में मौसम की तरह बदलाव आया था | नहीं समझ पाया लेकिन इतना तय पा था कि जो कुछ है उसे अपने फेवर में समझ लेना निहायत ही उच्च कोटि का भ्रम होगा | दो दिन पहले ही बात हुई थी जब मैं अपने बिखरे परिवार को नहीं बिखरने देने की अपनी मंशा और कोशिश की संभावनाओं पर बात कर रहा था | उसका सोचना भी कुछ ऐसा ही था लेकिन कुछ बदलाव के साथ कि अगर किसी फौरी सख्ती से मेरे वैवाहिक जीवन में किसी तरह का सकारात्मक बदलाव आ जाने लगे तो इसमें कोई बुराई नहीं | लेकिन मैं इसके पक्ष में नहीं था क्योंकि इतने वर्षों के साथ से अपनी सहचरी को इतना तो जान ही पाया हूँ कि कोशिशों के अंजाम को अनुमानित कर पाता | सुधरने से पहले नहीं आना कहते हुए यदि उसे पीहर के दर्शन करा दिए तो मुझे पता है कि इतने साल पुराना वैवाहिक ढाँचा काँच का सकोरा साबित हो जाना था | अपना सुख तो तिलंजित किये हुए हूँ लेकिन बच्चे के लिए अपने सुख से लापरवाह होना मज़बूरी ही समझो | बच्चे के लिए तो हम ही माँ-बाप हैं फिर चाहे कितना ही प्लस-माइनस क्यों न कर लो लेकिन कोई भी दूसरा विकल्प हमारी जगह भर नहीं पाएगा |

हाँ तो दो दिन से जैसी कि उसकी पुरानी आदत है जान्हवी वजूद लगभग संवादहीनता पर आ पहुँचा | अनमने से खानापूर्ति करते से मैसेजेज अथवा बातें उसके बदलाव को अभिव्यक्त कर देने के लिए काफी थे | यूँ मैं इतना समझने लगा हूँ उसे कि उसके बदले व्यवहार का प्रकार देखकर बड़ी आसानी से अंदाजा लगा लिया करता हूँ | जान लेता हूँ आज ऊँट किस करवट बैठा है और उस करवट के नीचे मेरा क्या-क्या दुचल गया या किस तरह के मुद्दे पर मुझे उससे बात करनी चाहिए | आमतौर पर मेरा अनुमान लगभग सटीक ही रहा करता है और यह शायद मेरे उसके साथ बने सच्चे लगाव का नतीजा है जो पिछले डेढ़ साल के दौरान मुझे उससे हो गया | कोशिश तो यही थी कि ऐसे किसी लगाव से अपने आप को दूर रखूं लेकिन जिस तरह अपने उफान के दौरान बाढ़ सारे जमीनी ढलानों और गड्ढों के रिक्त से स्वयं को रिप्लेस करती चली जाती है ठीक उसी तरह पत्नी के साथ उत्पन्न रिक्त व्योम में जान्हवी का अपनी जगह बनाना सिर्फ एक वक्ती बात थी, जोकि उसने बना भी ली |

बीते वर्षों में जाने कितने चेहरे सामने से आकर चले गए | बहुत सों ने जुड़ने की कोशिशें भी की मगर कभी उनसे खुद को जोड़ नहीं पाया | परन्तु जिस मन को नवपल्लव के अंकुरण के लिए बंजर बनाये बैठा था ठीक वहीं आकर जान्हवी ने एक कच्ची कोंपल उगाकर दिखा दिया जिसे सुबह-ओ-शाम भावनाओं के झारे की आवश्यकता भी आन पड़ी | पृकृति और प्राणी मात्र से अथाह प्रेम रखने वाला मैं कब तक बचता इस नवीन भाव के प्रादुर्भाव से ? बेहद कम समय में उस बंजर में बारिशों और उर्वरकों की मौजूदगी महसूस होने लगी | मजेदार बात यह कि उसने ऐसा कुछ न तो कभी कहा और ना ही कभी दर्शाया क्योंकि उसके मन में ऐसे भावों के लिए कोई जगह न थी | अपने इस मानसिक बदलाव के बारे में उसे बताने में मैंने तनिक भी समय नहीं लगाया | कहते हैं ना कि कह देने की संतुष्टि नहीं कह पाने की सुगबुगाहट से कहीं अधिक विश्रन्तिदायक होती है | चूँकि मुझमें कोई खोट या निकृष्ट स्तरीय स्वार्थ नजर नहीं आया सो जान्हवी ने इसे अच्छी साफ-सुथरी दोस्ती के रूप में एक्सेप्ट कर लिया | दूसरी तरफ मैंने अपने दोनों भावों को एक साथ जिंदगी में जगह दी परन्तु आपस में उनके पूरी तरह सेपरेशन के साथ | इससे हमारी दोस्ती में कहीं कोई फर्क नहीं आया | दिन-ब-दिन हमारी मित्रता बदस्तूर गहराती रही |

उस दिन तो नहीं किन्तु आज मैंने पूछ ही लिया | जो जवाब आया वह अपने आप में सही होकर भी सही नहीं था | दो दिन पहले जो बात हुई उसके हवाले से उसे लगने लगा कि कहीं वो मेरे लिए परेशानी का वायस न बनती चली जाए सो अब उसे मेरी दोहरी भावनाओं में से सिर्फ एक दोस्ती रखनी थी और मेरी दूसरी कोमल अनुभूति के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं था सिवा इसके कि यह समाज की सामान्य स्थितियों में सही नहीं है  जबकि मेरा मानना है हर दौर में इंसान ने सामाजिक कायदे कानून अपनी सहूलियत के अनुसार मैन्युपिलेट किये | चाहे जब अपनी सुविधानुसार अथवा श्रृद्धानुसर तोड़-मरोडकर उन्हें नये रूपों में इस्तेमाल कर लिया | इस मामले में मैं चाहता ही क्या था ? इतना ही ना कि मुझे अपनी कोमल भावनाओं को मन में नहीं रखकर बता देना कहीं श्रेयष्कर लगा | उससे कहा मैंने इस बारे में कि मैं अपने सारे सिद्धांत तज़ तुम्हारे सिद्धांतों को तरजीह दे रहा हूँ, जैसे चाहो इस नाते को तय करो | इसमें परेशानी काहे की ? कहती है उस दिन जो मैंने बिखरे से पड़े अपने घर को तिनका-तिनका कर जोड़े होने की और उसे बिखरने नहीं देने की बात कही उससे उसके अवचेतन पर बड़ा गहरा असर हुआ है और वह नहीं चाहती कि आगे जाकर जीवन में कभी उसकी वजह से मेरा कोई अहित हो लेकिन क्यों भूल जाती है कि हम दोनों ही अपने-अपने घरों में अपनी फैमिलीज के साथ जी रहे हैं | सामान्य तौर पर हमारा मिलना भी कहाँ हुआ करता है ? हम दोनों ही इस दुनिया के सारे सही-गलत भी समझते हैं | कभी कोई सीमा लांघने की इच्छा तक नहीं जागी तो सही-गलत के तराजू पर तौलने के लिए बाकी रह ही क्या जाता है ? एक ऐसा मानसिक रिश्ता जो अपने-अपने माहौल की अनियमितताओं, दुखों, तकलीफों से निजात दिलाता हो मैं उसे कभी गलत नहीं मान सकता |

जान्हवी ने जिस तरह की भाषा में लिखकर अपनी बात को अभिव्यक्त किया उसका एक आशय यह भी था कि हमारा नाता चाहे रहे ना रहे लेकिन अब उसका कॉन्सेप्ट क्लीयर है उसमें मेरी दूसरी पैरेलल फीलिंग्स के लिए कोई जगह नहीं | मैं पूछता हूँ पहले ही क्या अलग था जो अब नया किये जाती हो ? पहले भी मन के भाव मन ही में गर्दिशें मचाया करते थे और प्रैक्टिकल रिश्ता विशुद्ध दोस्ती का ही था, तुम भी वही कहे जाती हो | आखिर बदलना क्या चाहती हो तुम ? अगर फीलिंग्स झूठी नहीं तो मना कह देने भर से क्या वे समाप्त हो जाएँगी ? कैसे सोच लिया उसने इतने बड़े झूठ की बुनियाद पर मैं अपना रिश्ता खड़ा रख पाउँगा ? यदि उसकी बात मानकर हृदयपटल पर नवांकुरित पल्लवन को बिना खाद-पानी का करके दोस्ती को आगे कर दिखाना है तो यह एक कोरा झूठ होगा | साथ बने रहने के लिए कपट का सहारा पहले कभी न लिया तो अब ही क्या ले लेना था सो साफ जता दिया कि तुमसे बेशक ना जताऊँ मगर अपनी फीलिंग्स को समाप्त कर पाने के सिलसिले में मुझे बेबस ही समझो |

लंबे समय से जान्हवी को मानसिक अर्धांगिनी का दर्जा दिए बैठा हूँ | जब एक रिश्ता तोड़ते नहीं होता तो खुद को इसके साथ बेनाता कैसे कर लूँ ? शुरू ही से संबंधों का पोषण करने के संस्कार पाए हैं | इस सम्बन्ध को क़त्ल-ओ-गारत कर पाने वाले दो हाथ कहाँ से लाऊँ ? विकराल से विकराल परेशानियों में जिस मानसिक अर्धांगिनी ने हर कदम साथ दिया और हर बार तकलीफों का अहसास कम हुआ भी जबकि सात फेरों वाला रिश्ता कहीं नजर तक न आया | अपने हिस्से के साढ़े तीन फेरों का हक झट माँग लिया जाता है लेकिन मेरे हिस्से के साढ़े तीन फेरों के हक को कुछ सवा दो साल पहले दफना चुका हूँ | वो कहते हैं ना कि वादे तो होते ही तोड़ने के लिए हैं | फेरे भी एक तरह से जीवन साथ बिताने का एग्रीमेंट ही तो हैं | उनमें तय हर बात मुद्दतों पहले वादाखिलाफी की बलि चढ गयी | इंसान को मकान से बढ़कर जहाँ घर की अनुभूति चाहिए होती है वहाँ सराय तक का अनुभव न मिला | कैसे न अपनी खुशियाँ तलाशता ? मिलीं मुझे वे सारी खुशियाँ, जान्हवी नाम की ताजा हवा वाली फॉर्म  में | कैसे कर देता अपनी जिंदगी इन नकली खोखले सामाजिक नियमों के हवाले |

जान्हवी की सोच के जवाब में क्या हो सकता है या क्या होना चाहिए या इस बारे में हमारा समाज क्या सोचता है या इस बारे में हमारी फैमिलीज की समझ क्या होगी ? नहीं है इन सवालों के जवाब और ना ही कोई परवाह है मुझे जबकि इस रिश्ते में मुलाकात तक न होती है | फिर बहानों के प्रवाह में कोई कमी क्यों नहीं ? लोगों की सोचें भौतिक अधिक हुआ करती हैं सो उनकी सोचें इस नश्वर शरीर से आगे जा ही नहीं पाती परन्तु कौन समझाये उन नामाकूलों को जिनमें खुद जान्हवी तक शरीक हुए बैठी है |

इस कहानी को यहीं विराम देता हूँ कि असल जिंदगी में इससे आगे क्या होना चाहिए हर इंसान के सिलसिले में यहाँ पृथक-पृथक बातें हो सकती हैं सो एक निश्चित अंजाम केवल उस घटना का हो सकता है जो वाकई कहीं घटी हो जबकि इस कहानी का अंत कैसे तय किया जाए जबकि सर्कम्सटेंसेज दो अलग-2 बसे घरों सॉरी सरायों के हों ? जाने कब क्या हो जाए ? साथ रहने की ख्वाहिश तो दिवा-स्वप्न ही कहलायेगी | लेकिन अंजाम को नयी आ रही हर दूसरी घटना के साथ अपने बदलाव के दौर से गुजरना पड़ेगा | अतएव बेशक एक नजर में मेरी यह कहानी, एक कहानी से ज्यादा किसी इंसान की डायरी के पन्ने सी लगे लेकिन सबसे बड़ा सच यही होगा कि संभवतः इसका कोई सटीक अंत नहीं हो सकता | पाठक स्वयं अपनी श्रृद्धा का उपयोग करे तो बेहतर |

चौधरी जोगिन्दर सिंह Choudhary Jogindar Singh (09-03-2012)
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Comments

One response to “कुछ सवाल खुद से (अनजान डायरी के पन्नों से)”

11 March 2012 at 8:17 AM

संबंधों के पोषण के संस्कार... और कहानी के अंत को पाठकों पर छोड़ती लेखक की चेतना सुन्दरता से साथ साथ चलती है.... पढ़ने वाले भी नायक के भाव और घटनाक्रमों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते...!
कहानी के माध्यम से सुन्दर भावयात्रा!

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