झबरू क्या जाने? © (कहानी)


झबरू क्या जाने? ● © (कहानी)
(मुख्य पात्र : झबरू बैल, जानकी गाय, बिरजू, रामदीन)

"अरे ओ बिरजू ! जा, झबरू को जाके बाँध आ" चिल्लाकर कहा रामदीन ने | बडबडाते हुए बिरजू का इंतजार किये बिना ही दडबे की ओर चल दिया "जानकी तो ऐसी न थी, छुटपन में भी काबू में बनी रहती थी और एक उसकी औलाद है कि संपट ही नहीं बैठने देती | हर बार इनके लिए नयी रस्सी लाओ और ये महाराज हैं कि इनकी उछल-कूद कम होने का नाम ही नहीं लेती | पता भी है रस्सी का एक छोटा सा टुकड़ा कितने दाम में मिलने लगा है? एक समय था जब परचूनिया बिना दाम लिए ही रस्सी थमा दिया करता था बदले में चाहे मुट्ठी भर अनाज दे आओ या ना भी दो कोई पूछने वाला नहीं था"| यूँ ही बकते झींकते रामदीन झबरू पड्डे के पास तक जा पहुँचा | देखा मियाँ झबरू रस्सी तुडाये शान से छोटी सी अपनी थूथनी ऊपर किये गर्दन से नीचे लटकने वाली लिबलिबी (खाल) को बिरजू के हाथों सहलवाने का आनंद लिए जाते थे | यह देख खून खौल उठा रामदीन का, अब फिर एक नयी रस्सी लानी पड़ेगी | "हाल ही तो लाया था पूरे पन्द्रह रुपयों के सौदे में और अब फिर से? एक तो बछिया की उम्मीद में ये बैल हाथ आ मारा और ऊपर से हर रोज का इनका चारा-पानी | हे भगवान इससे तो अच्छा ये पैदा ही न होता |" कहते हुए लाठी लेकर पिल पड़ा मासूम पर | "खा जा मुझे नासपीटे, काहे आ मारा बोझ कहीं का | सेर भर रोज तुझे चराओ, नखरे सहो, जाने कितने खरचे भी सहो | पहले ही क्या कम फकीरी थी जो कोढ़ में खाज ये जम भी आ मरा"|

उधर बिलबिलाता हुआ झबरू दडबे में यहाँ से वहाँ और जाने कहाँ-2 उछलता भागता फिर रहा था | कभी पींठ पर सीधे लट्ठ पड़ता तो कभी पसलियों का कीर्तन तो कभी जबड़ा ही जूडी का मरीज बना दिखता | खाल पर बैठी मख्खियों को उड़ाने की सी कोई चाल कामयाब ना हुई कि खाल को झरझरा के ही पड़ते लट्ठ उड़ा देता | ये सब नये नुस्खे थे जो पैदा होने बाद इन कुछ महीनों में उसने सीखे थे | सारे उपाय धराशायी होते देख और तेजी भी से बिदकता सा भागने लगा | बचना तो क्या था बल्कि इस चक्कर में कोने में रखे सानी और खल वाले तीन पक्के मटके और भूसा चरने की एक मढेंनी जरुर चकनाचूर हो गयीं | यह सब देख रामदीन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा | उसके बाद वहशत का जो नंगा नाच हुआ उसने झबरू को दोबारा उठने लायक नहीं छोड़ा |

मन भरने पर नहीं बल्कि पूरी तरह थक चुकने के बाद जाकर आराम की पहली साँस ली उसने | दूसरी तरफ बेचारा झबरू क्या जाने कि ये तो महज एक शुरुआत थी असली पीड़ा का तांडव तो ताजा मिले घावों से लगातार उठती टीसों के रूप में कई दिनों तक झेलना बाकी है | कुछ देर डरा सहमा जस का तस पड़ा रहा उसके बाद जब उठने की पहली कोशिश की तो अपनी ही जगह लद्द से गिर पड़ा | धरती पर आँख खोलने से लेकर अब तक ऐसा कुछ सोचा तक न था लेकिन बिना सोचे हो जाने का असर भी अलग ही होता है | जानवर बुद्धि : आखिर कितना समझती बातों को लेकिन दर्द समझती थी | वजह जानने समझने की कोई कोशिश नहीं की बस दर्द में कराहता-रंभाता अपनी माँ को पुकारता रहा | लेकिन उसके जख्मों को चाटकर साफ करने के लिए माँ नहीं थी | वो बंधी थी उस खूंटे पर जो रामदीन की बाँस के कनाठों वाली खाट के पास वाली मढेंनी के बगल में गडा था |

जानकी इस पूरी पिटाई के बीच अपनी जगह से निकल आने के लिए जाने कितना जोर लगा गयी लेकिन गले की पतली लोहे वाली चेन से निजात नहीं मिल पायी | हर बार मचलते आँखों से बहती गीली लकीरें उसके दिल का हाल साफ बयान किये दे रही थी | वहीं झबरू ने भी गंगा-जमुना से साक्षात्कार पा लिया था | उसे तो पता ही न था आँखों से पानी जैसी कोई गीली चीज निकल भी सकती है | खुश होना, उछालना-कूदना, बिदकना, मस्ती-मजे के सिवा किया ही क्या था अब तक | कुछ देर बाद घिसटते हुए कैसे भी करके पहुँच गया अपनी माँ के पास | उसकी हालत देख जानकी को जैसे समझ ही न आया क्या करूँ | बावली हुई बस उसके जख्मों को चाटने लगी | उसकी आँखों से बहते नाले बेरोकटोक बहिर्गमन में व्यस्त थे |

गाँव का एक गरीब गुरबा परिवार जहाँ स्वयं के भरण पोषण के लिए जद्दोजहद रोजमर्रा का हिस्सा हो वहाँ एक अनुपजाऊ नया जीवन वह भी जानवर के रूप में बोझ बन लद जाए तो अंजाम इससे कम क्या होना था | बड़े होने तक पूरा जीवन सिर्फ चराते ही जाना था इसे | कौन जाने बड़ा होने पर भी कितना काम आता? हर रोज इसे देख रामदीन का सेर भर खून कम हो जाता |

कई दिनों गर्दन उठाकर लिबलिबी सहलवाने की हिम्मत न हुई, उसे लगा शायद इसी वजह से बिरजू के नाम पर उसकी धुनाई हुई थी | बिरजू को झबरू संग खेलने का प्रतिसाद न मिलने के कारण झबरू का इकलौता मित्र भी छिन गया | अब बिरजू फिर गली के नाक पौंछते मिटटी से लिपे-पुते बच्चों के साथ खेलने का आदि हो गया | होता भी क्यों नहीं, जो उसे चाहिए था उसके लिए पुराना स्तरित विलुप्त हो जाने पर नया तो तलाशना ही था, सो तलाश लिया | दिन बीते महीने बीते अब जानकी बूढी हो चली थी | झबरू के बाद जानकी ने सात बछियायें भी दी | माँ बेटे दोनों को कभी समझ नहीं आया जो बछियायें पैदा होतीं वे कुछ महीनों के बाद कभी नजर क्यों नहीं आती थीं | क्या जानें बेचारे कि भविष्य की दुधारू गायों को मनचाहे दाम मिलने पर अलग-अलग घर दिखा दिए जाते हैं | लेकिन झबरू हमेशा यहीं रहा | भगवान ने चार थन जो नहीं बख्शे थे | एक बड़े होते सांड को कौन खरीदना चाहेगा जिसकी काया हमेशा मरियल ही रही |

कुछ साल बीत चुकने पर उसकी खुराक में अचानक ही इजाफा हो गया | पता चला उम्रदराज होते रामदीन ने उसके लिए छकडा बनवा लिया है जिसके आगे बंधकर झबरू मियाँ को घर और खेत के सारे सौदे ढोकर ले जाने होंगे | पहली बार छकड़े के आगे बाँधे जाने तक कुछ नहीं लगा लेकिन सामान लादे जाने पर जब गर्दन और पसलियों पे दोनों तरफ बोझ बढ़ने लगा तब जाकर सुध आयी कि वो बढ़ी हुई खुराक इस बोझे के लिए पूर्व तैयारियाँ थीं | टहनी वाली सटकी के किनारे पे सूत के मुलायम धागे से बंटी रस्सी के अगले सिरे को दो गाँठें बाँधकर कोड़े की तरह इस्तेमाल तय किया गया | शुरुआती हर कदम पर झबरू की पींठ सड़ाक की एक शानदार आवाज का स्वागत करती | पृष्ठ भाग की खाल सिंहर कर रह जाती | लगातार मिल रही सड़ाक-2 से बेहतर चलना को जान छकडा लिए झबरू आगे को बढ़ लिया | कई बार दगरे से गुजरते समय बिछड़ी बहनों से सामना हुआ परन्तु ज़माने बीते बिछड़ने की वजह से कोई किसी को पहचान नहीं पाया |

खाने पर रामदीन का दिया अतिरिक्त ध्यान अब फिर से कम हो गया था कि संभवतः उससे लिए जाने वाले काम की कीमत और मिलने वाले चारे की जंग में बचत नामक अर्थशास्त्र ज्यादा भारी पड़ा | रात दिन की कड़ी मेहनत और सामान्य से कम खुराक से झबरू की काया कुछ अधिक ही दुबला गयी थी | साथ ही बिरजू के कहने पर पिता रामदीन ने ट्रैक्टर किराये पर लेना छोड़कर झबरू का सदुपयोग करने की सोची | "आजकल ट्रैक्टर का किराया कितना महँगा हो चला था? ऊपर से डीजल के भाव तो जान ही लेने पर तुले थे | जे नासपीटी सरकार खा जायेगी जनता को मगर दाम नीचे को नहीं आएंगे"| लिहाजा झबरू अब खेतों और छकड़े दोनों में इस्तेमाल होने लगा था | कई दिनों से खाने के वक्त उसे घर से बाहर कर दिया जाता | भूख लगने पर खेतों के चक्कर लगा आता | हर बार किसी लाठी से मिली नयी चोट या किसी पालतू कुत्ते के काटे के निशान शरीर पर जगह बनाते जा रहे थे | यूँ तो बचपन के बाद ही से बहुधा उसे छोड़ दिया जाता था मगर अब यह हर बार की घटना होने लगी थी | पहले घर लौटने पर बची हुई भूख के नाम पर कुछ चारा मिल जाया करता था लेकिन कुछ दिनों से मढेंनी अकालग्रस्त हो गयी थी | यहाँ तक कि पुराने खाए भूसे के अवशेष तक समाप्त होने लगे थे |

इधर जानकी ज़माने हुए लतिया (दूध न देना) गयी थी | उसका दूध देखे परिवार को कई माह हो गये | पिछली बार भी उसने बहुत कम दूध दिया था | फिर एक दिन कोई कडियल सी मूँछों वाला तहमत पहने आदमी उसकी माँ को जबरन खींचते हुए ले गया | छकडा खींचते समय कई बार इसी आदमी को बाजार में लटकते माँस वाली दुकान में बैठे देखा था तब ही से इसे देख अंजनी सी दहशत होने लगी थी और आज उसकी अपनी माँ जानकी को ये दुष्ट लिए जा रहा था | सहमकर खूंटे के पीछे वाली दीवार से लगकर एकाकार हो जाने की कोशिशों में संलग्न हो गया | उस दिन के बाद अपनी माँ को फिर कभी न देखा झबरू ने |

एक दिन हल खींचते झटके से गिर पड़ा | कोई पत्थर था जिससे अटककर तेजी से चलता झबरू गिर गया था | टखने के बल उस पर गिरने और पत्थर के तीखेपन से घायल खुरों और टखने ने उसका चलना बाधित कर दिया | पहले से ज्यादा चाबुक मिलने लगे परन्तु बिगड़ी चाल फिर कभी सुधर ही नहीं पाई | कई बार की कोशिशों के बाद घर से उसे निकाल बाहर कर दिया गया | गाँव के सारे दगरे और गैलें जानी पहचानी होने से पूरा दिन यहाँ वहाँ पिटते-कुटते पेट भरकर हर शाम चौखट पर आकर सो जाता | दूसरी तरफ उसके घाव अब नासूर बन चले थे साथ ही कई कई दिन बुखार या जाने किस तरह की खुमारी में एक ही जगह पड़ा रहने लगा था | द्वार पर मिलने वाले संभावित परिणाम से आतंकित घरवाले गाँव की सीमा तक खदेड़ आते मगर हर बार की तरह वह फिर उसी दर पर मत्था टेक ही लेता |

एक रात जंगल से आने वाले गेधुए (सियार/ब्रज भाषा का एक शब्द) ने झबरू को गैल में अकेला देख पूरा भम्भोड़ डाला | आवाज सुन लाठियाँ लिए आये गाँववालों ने गेधुए को भगा तो दिया लेकिन इसके नुंचे माँस के टुकड़े कैसे लौटाते जिन्हें जाते जाते भी वह दुष्ट नोंच ले गया था | बिट्टू की ट्रॉली में पटककर गाँव की सरहद पर कूड़े के ढेर के पास ले जा फेंका गया | "झबरू क्या जाने" अब यहाँ से उसके बचे तन को भी नौंच लिया जाना है | रात सियार और दिन में आवारा कुत्तों ने पसलियाँ तक बाहर निकल दीं | दूसरी रात कुत्तों और सियारों के बीच की खींचातानी में जाने कब कब प्राण निकल गये खुद भी न जान पाया |

गाँव का भला चाहने वालों ने फिर उसे उठाकर खेतों से आगे वाले जंगल के मुहाने पर फिंकवा दिया | लेकिन इस बार बिट्टू की ट्रॉली नहीं थी | चमार ने बची-खुची चमड़ी उधेडकर फेंकने का वादा करके उसी रात कई टुकड़े करके अपनी बस्ती में जश्न मना लिया | सुनने में बेशक अजीब और अविश्वसनीय लगे लेकिन असल जिंदगी में मैंने कई बार इस तरह के कर्म वालों के बारे में सुना है जो मरे जानवर की चमड़ी उधेडकर रख लेते और बाकी बचे शरीर को अपने जश्न में इस्तेमाल किया करते हैं | गरीबी की एक दशा ऐसी भी होती है जहाँ सड़ते माँस से परहेज खत्म हो जाता है |

बहरहाल जंगल के मुहाने तक पहुँचा जरुर लेकिन जश्न में शामिल लोगों के सुबह वाले विसर्जन की शक्ल में | उधर उसके पिंजर पर कुत्ते आज भी पिले पड़े थे | विष्ठा खाने वाले कुछ पक्षी जैसे कौव्वे, गिद्ध आदि भी मंडराने लगे | जो जिसके हाथ लगा ले उड़ा | इसी बीच टूथपेस्ट बनाने वाली किसी कंपनी के एजेंट ने चमार से हुए सौदे के बाद आखिरी बचे अवशेष का इंतजाम भी कर लिया | पिंजर का चूरा अब ऊँची बिल्डिंगों वाले घरों के वाशबेसिन में हर रोज सुबह कुल्ले के साथ बह जाना था | कहानीकार के भेस में उस एक इकलौती आँख को मैं तलाशता ही रह गया जिसमें झबरू के लिए नमी की हलकी सी एक चमक तक उभरी हो |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (15-03-2012)
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Comments

3 Responses to “झबरू क्या जाने? © (कहानी)”

15 March 2012 at 2:03 PM

वाह , भाई कहानियों का संग्रह भी प्रकाशित करो... पर यह काहानी कहाँ है...

Jogendra Singh said...
15 March 2012 at 3:13 PM

नूतन , कहानी में करेक्शन कर रहा हूँ....... थोड़ी देर लगेगी , बस फिर पोस्ट किये देता हूँ........

15 March 2012 at 6:01 PM

व्यथित... विचलित कर देने वाली करुण कहानी...! इतना दर्द... इतनी पीड़ा... कि हृदय कराह उठा!
कितना स्वार्थी है न ये जग... प्रतिकार नहीं कर सकते जो उनकी बोटी बोटी नोंच लेता है...!
बेहद मार्मिक कहानी, मूक पात्रों की आवाज़ बनने के लिए कहानीकार की कलम को नमन!

लगता है, कहानी लेखन की विधा में आप पारंगत हैं!
बधाई!
शुभकामनाएं!

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