ढक्कन बाबा की जय


ढक्कन बाबा की जय ● © (हास्य-व्यंग्य कहानी)


● ढक्कन बाबा की जय ● © (हास्य कहानी)
(मुख्य पात्र : विशाल, हरबंस गुप्ता, अपर्णा, रामेश्वर, संजीव, रश्मि)
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[ १ ]
     एम.ए. पास टेलेंटेड नौजवान विशाल आज अपने जीवन के सबसे अहम इंटरव्यू के लिए कमर कसे बैठा था | आज पास होना उसके लिए उतना ही जरुरी था जितना किसी भूखे के लिए रोटी का टुकड़ा | सामने सोफे पर धँसे फंसे बुजुर्गवार हरबंस गुप्ता ने ज्यों ही पहला प्रश्न उछाला लपक के उससे पहले ही विशाल का जवाब था- "चिंता न करें अंकल अपर्णा मेरे साथ हमेशा सुखी रहेगी | कभी उसे किसी तरह की कमी नहीं होने दूँगा उसके लिए मुझे चाहे कितने ही झंझावातों से गुजरना पड़े"| अंकल ने कुछ यूं घूर के देखा जैसे नजरों ही से कच्चा चबा जायेंगे | क्यों न घूरते सवाल के बिना आया जवाब कौन है जो पसंद कर लेता | हुलिया उनका कुछ यूं रहा- "बिचकी सी आँखें जिनपर रखी कम ऊँचाई की ऐनक जैसे वो आँखों से छोटेपन की शर्त लगा जीतने की फ़िराक में हों, मस्तक पर शंकरी चार आडी लाईनें चेहरे के रुबाब को बढाती ही थीं, ऊपर से नीचे को सपाट आती नासा के अग्र भाग का फैला होना इस प्रकार था जैसे किसी ने धम्म से घूंसा ठांसकर पिचका दी हो, ओंठ सामान्य थे मगर बड़े लम्बुतरे चेहरे में कुछ पतले प्रतीत होते थे और उनका मटमैला गहरा वर्ण उनके लगातार सिगरेट पीने की आदत को दिखाता था जिसे बीते आधे घंटे में पूरी तीन बार सुलगाकर उन्होंने साबित भी किया, नैनों से टपकती धूर्तता पुराने महाजनी के व्यापार को छुपाने में नाकाम रही, मोटे गले से नीचे को आते वक्त कहने को बहुत कुछ था लेकिन ज्यादा नहीं देखकर पेट ही पर अटक जाते हैं जिसकी अचानक आयी ऊँचाई ने ऊपर से आती नजरों की तेज रफ़्तार फिसलन को भी ब्रेक थमा दिए और उस नाशपाती समान धँसके-लटके गोल पेट तक जाकर हुलिए की बयानी को फुल स्टॉप लगा दिया"| अपनी बड़ी बेटी अपर्णा के लिए विशाल को पसंद करने आये थे आज लेकिन उनके लिए प्रश्नोत्तर भी संभवतः व्यापार हुआ करते थे | यूं तो कोई कमी न थी विशाल में परन्तु दो बहनों के होने से प्रश्नों में बेटी के सीक्योर भविष्य की चिंता साफ झलका गये और बदले में विशाल को अपनी नौकरी के लिए दिया पहला इंटरव्यू इससे कहीं ज्यादा सुगम जान पड़ा |
[ २ ]
     मुँह के आगे बिछी टेबल पर छरहरे बदन वाली पच्चीस वर्षीया खूबसूरत कल्पलोक की नायिका सी अपर्णा कागद रूप धर पड़ी नजर आ रही थी और सामने से हिटलरी अंदाज में जिरह | जाने किसे देखूँ किसे जवाब दूँ यह सोचते समझते टेबल व सामने देखने के बीच उलझा जाने कितने सवालों को अजीब लगने वाले जवाबों से शुशोभित करता चला गया | परिणामतः विशाल की अपर्णा से उतनी ही दूरी भी बढती चली गयी | एक सवाल तो इतने कमाल का जिसने होश ही उड़ा दिए उसके | हिसाब लगाकर पिछले पाँच साल की कमाई जोड़कर बोले- "इतना रूपया तो होगा ही तुम्हारे पास? कहीं बैंक में, कैश या किसी और तरह?" सुनकर विशाल को गुस्सा आ गया | तपाक से कहा उसने- "हाँजी है, सारा पैसा थाली में सजाकर रखा है | आपकी बेटी आयेगी तो उसके राज में भी यही काम कर दिखाऊंगा | खाना-पीना, ओढना-पहनना, आना-जाना ये सब खर्चे तो आप दे ही देंगे आकर ! हमें करना ही क्या है? कमाई तो ससुरी सगरी बैंक में ही जानी है"| भड़क गये, कहने लगे- "रामेश्वर जी ! क्या इसी बेइज्जती के लिए आप लड़की वालों को बुलाते हैं ? किसी की कोई इज्जत नहीं क्या ? शरम आनी चाहिए आप लोगों को जो घर आये मेहमान के साथ ऐसी बदजुबानी करवाया करते हैं | और ऐसे बदतमीज बददिमाग लड़के से मैं अपनी बेटी तो क्या कोई अपनी कुतिया भी न ब्याहेगा"| इसके साथ ही फोटो टेबल पर भूल उठकर चल दिए |
[ ३ ]
     सन्नाये से बाप-बेटे उसी मुद्रा में साकत हुए रह गये | शून्य में घूरती विशाल की आँखें पूर्णतः शून्य को नहीं पा सकी थीं | उनमें गर्दिश कर रही थी टेबल पर पड़ी अपर्णा की वह फोटो जिसने पहली नजर का तीर बन दिखाया था | सकता पहले रामेश्वर पर से टूटा, सीधे द्वार को भागे कहीं बच्चू हाथ लग जायें तो कुछ खरी-खोटी सुना आऊँ मगर तक़दीर के खेल उनकी दौड से तेज निकले और हरबंस गुप्ता जी का स्कूटर यह जा और वह जा | हाथी देखते ही एवं उसके गुजरने पर जिस तरह कुत्तों का भौंकना शुरू हो जाता है ठीक वैसे ही रामेश्वर जी के श्रीमुख से अमृतरस बरस रहा था पर सुनता ही कौन था इसे | तिरछे सामने वाले घर की खिडकी फटाक से बंद हुई तब जाकर तन्द्रा लौटी | भीतर आकर दूनी भडकन से फिर शुरू हो गये "नासपीटे, घुस जा इस फोटू में, बाप की इज्जत भरे बाजार लुटाकर कलेजा ठंडा नहीं हुआ जो अब इस कागद की चिंदी पे लट्टू हुए जाता है? ला इधर"| कहते हुए फोटो के चार टूंक यों किये जैसे जीती छोरी को ही चीरे जाते हों | वहीं सामने बैठे विशाल को लगा जैसे फोटो नहीं उसके दिल के टुकड़े चार हुए जा रहे हों |
[ ४ ]
     थोड़ी देर बाद डस्टबिन से बीने गये चारों टुकड़े विशाल के व्यक्तिगत कमरे में मौजूद टेबल की शोभा कुछ यूं बढ़ा रहे थे जैसे वो कोई ऑपरेशन टेबल हो और वहाँ अपर्णा का चिरा हुआ शरीर फिर टाँक दिया जाना हो | कांपते हाथों संग ट्रांसपरेंट टेप का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए फिर जुड गयी अपर्णा और हर्ष से अपना विशाल एकदम बावला हुआ जाता था | कुछ देर पहले का जोश अब ठंडा हो चुका था, उस पर कन्या कुंवारी अधिक भारी प्रतीत होने लगी थी | सम्बन्ध टूट जाने के दुःख ने ऑफिस से तीन दिन बिना खबर दिए गायब करवा दिया | फोन बंद, दिमाग बंद, सब बंद | तीसरे दिन जैसे बिजली का करंट लगा हो ऐसे भागता हुआ सीधे अपने कंप्यूटर पर जा चिपका वह तो शुकर है किसी ने देखा नहीं वरना बिजली से छुड़ाने के बहाने ज्यादा नहीं तब भी दो-चार डंडे तो रसीद हो ही गये होते | फेसबुक, ट्विटर, लिंक्ड-इन, ऑरकुट और जाने कहाँ-2 नहीं छान मारा | वे सारी जानकारियाँ सर्च में इस्तेमाल कर डालीं जो संभावित ससुरजी भूलवश छोड़ गये थे |
[ ५ ]
     आखिरकार फेसबुक पर मिली, परन्तु प्रोफाईल फोटो मैच नहीं हो पायी लेकिन जानकारियाँ बाकी सब टिंच लग रही थीं | आव देखा न ताव भेज दी रिक्वेस्ट, नसीब इतना जोरदार तुरंत एक्सेप्ट भी हो गयी | ऑनलाइन जानकर उससे पंचायती भी शुरू हो गयी, सारी जानकारियाँ अपने पहलु पर झाड़ू मारकर अपर्णा के इनबॉक्स में पेल दीं | एक तो बंदा स्मार्ट और ऊपर से ठीक-ठाक जॉब, पूरी तरह इग्नोर कैसे कर देती, पापा का क्या है पहले ही से जानती है कि नंबरी खडूस हैं | बड़ी बहन का रिश्ता ही लगभग बुढ़ापे में प्रवेश करते तय किया था, जाने उसके साथ क्या करते? अपने-अपने कमरों में बंद होने के बाद क्या गुल खिला रहे थे कोई न जान पाया | इधर दोनों घरों में रिश्तों की बाढ़ आ रखी थी मगर अब तक विशाल को अपर्णा का विकल्प सा कुछ नजर नहीं आया | यही हाल हरबंस गुप्ता जी के घर का भी था, कई लड़के देखे लेकिन कोई भी अपनी समूची कमाई रकम बैंक में नहीं दिखा पाया |
[ ६ ]
     अचानक से विशाल को लगने लगा यदि उसका प्रेम (पता नहीं पंचायती को प्रेम कैसे समझ बैठा) नहीं मिला तो रो-रोकर अपनी जान दे देगा | पता चलने पर अपर्णा ने बिना मरे ही उसकी सच्चाई का यकीन कर लिया और प्रेम के भरोसे उसी शाम भिड गयी पिता हरबंस गुप्ता से | ताने-विताने, चुटिया तक खींचकर लंबी कर दी गयी गयी मगर हरबंस जी ने न मानना था न माने | आखिरी हमले के तौर पर घर छोड़ भागकर शादी कर लेने की धमकी पर कुछ नरम पड़े लेकिन अकड अभी बाकी थी, खाते के रुपये देखने की साध पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी | कहने लगे "पूरी ना सही आधी तनख्वाह ही दिखा दे | बनिए की छोरी से ब्याहेगा, पैसे जोड़ना नहीं सीखेगा तो और क्या है जिसके बल शादी पा पायेगा?"
[ ७ ]
     अगला दिन, रामेश्वर जी के घर सुबह ग्यारह बजे का माहौल कुछ इस तरह का था - बाएं सोफे पर पिछली बार ही की तरह धँसे फंसे बुजुर्गवार हरबंस गुप्ता अपने मुँह से धुँए के बगोले उड़ाते नये प्रश्न जड़ते चले जा रहे थे और रामेश्वर जी चुपचाप बिना जवाब दिए अपनी जगह जमे बैठे थे | चेहरा एक ही दिशा में जड़ हो रखा था जैसे कसम खा रखी हो इस चेहरे के सिवा कुछ और है ही नहीं जिसे देखाने की चाहत हो | वहीं विशाल नये सिरे से इंटरव्यू में पास होने की कोशिशों में आज एक बार फिर अपनी तैयारियों को अन्जामित होते देख रहा था | जैसे ही हरबंस गुप्ता ने रिश्ते पर मोहर लगायी रामेश्वर जी के चेहरे और गिरगिट नामक जंतु के सारे बदलते रंग आपस में गड्ड-मड्ड होने लगे | बिना वक्त गंवाए उन्होंने हरबंस जी को हाथ पकड़कर चौखट से बाहर का रास्ता दिखा दिया | अजी मौका कैसे छोड़ देते बदला लेने का, पिछली बार तो जनाब इनके बाहर पहुँचने से पहले ही चम्पत हो लिए थे, अब कोई आकर बचाए इन्हें | हरबंस जी दीन दुनिया से बेखबर बेदिमाग से खिंचे चले जा रहे थे जैसे किसी की नाक पर मुक्का मार दिया जाए तो किस तरह दिमाग कुछ क्षणों के लिए कुंद अथवा निष्क्रिय सा हो जाता है बस उसी तरह हरबंस गुप्ता जी का दिमाग भी संभवतः अंतरिक्ष की किसी निहारिका (आकाश-गंगा) में परवाज करने गया होगा | होश आया तो घर के द्वार पर खड़े शरीर को मानसिक शक्तियों के जोर से बिलकुल बेदम सा पाया | क्यों न होता बेदम? बेइज्जती का जो स्वाद अब तक दूजों को चखाते आये हैं वही अब उनकी अपनी जिव्हा पाए बैठी थी | कुछ कहने की कोशिश करी मगर मस्तिष्क की वे वाली तंत्रिकाएँ अधिक सक्रीय थीं जिनमें निकाले जाने का दृश्य रिपीट मोड में दिखाई दे रहा था | गुस्से और शर्मिंदगी की अधिकता से फूलते-पिचकते नथुनों से निकलती तीव्र वायु के कारण किसी बैल से कम नजर नहीं आ रहे थे, जाने कैसे बस किया वरना साधारण कद काठी वाले रामेश्वर जी का तो सच ही रामपुरी का टिकट कट लिया होता | लिहाजा लौटकर घर को आये और फिर एक बार अपर्णा की चुटिया लंबी कर दी गयी | इस बार छोरी के शरीर के दूसरे अंग भी दरद दे रहे थे | कई अंग भीतरी रूप से आपस में बेताली ताल मिलाये जा रहे थे |
[ ८ ]
     अकड़ी गर्दन लिए रामेश्वर जी ने अन्तःपुर में प्रवेश किया और लगे डींगें हाँकने, किस तरह उस दबंग आदमी की दुर्गत मचाई जिनकी सारा नहीं तो तिहाई शहर अवश्य दबंगई मानता होगा |  विशाल की हिम्मत नहीं पड़ी अन्तःपुर में प्रवेश की वह सीधा सोसाइटी पार्क के पीछे बहने वाले नाले पर रखे लंबे पत्थर वाली पटड़ी पर जा मातम मानाने में व्यस्त हो गया | प्रेम हार चुका था, प्रेमिका के पिता की नाक (इज्जत) बह निकली थी, कुछ दिन पहले अपनी और अपने बाप की नाक से बहते नाले दिखाई न दिए हों मगर ससुरजी की बात ही कुछ और थी | शाम का समय था इसी पटडे पर यार लोगों की बैठक जमा करती थी | नीचे बहता-रुका गंदले पानी को समेटे संकरा नाला और ऊपर तीन से पाँच दोस्त रोजाना हाथों में बोतलें लिए कै-किलबिल में लगे होते | एकाध बार इस नाले की डुबकी लेकर भी घर को जा चुके हैं कि होश का दमन छूटते ही सुध कहाँ रह जाती है | दुर्भाग्य से आज एक ही दोस्त आया था लेकिन माल पूरा था भाई के पास, आते ही शुरू को गये दोनों और दुखड़े को गाने में घंटा निकल गया | पूरे सवा घंटे बाद जब संजीव (दोस्त) ने अपर्णा का नाम सुना तो बगल में बैठे देसी आवारा कुत्ते से बाजी लेते उसके कान खड़े हो गये | कहने लगा- "ये वही अपर्णा है ना जिसका बाप हिटलर की पीढ़ी का है? जो नूतन कॉलेज के लास्ट इयर में पढ़ रही है? जिसके फेसबुक अकाउंट में ताजा फोटो एक बिलौंटी की है?" चमक कर विशाल ने कहा "हाँ-हाँ संजीव, ये वही है"| संजीव ने कहा-"कमीने तू दोस्त नहीं दोस्त के नाम पर कलंक है, पिछले एक साल से मेरा उसके साथ अफेयर चल रहा था, अचानक बोलती है उसे कोई बढ़िया नौकरी वाला लड़का बाप ने देख दिया है | वो लीचड तू निकलेगा मैंने सोचा तक नहीं था"|
[ ९ ]
     "धोखेबाज़, तूने मेरी लौंडिया उड़ाई है और मैं सोचे बैठा था जिस दिन उस नामुराद का पता मिलेगा उसका जीना मारना एक कर दूँगा"| इसी के साथ घूंसे की शक्ल में संजीव का बायाँ हाथ नशे की पिन्नक में झूमते विशाल के कान के ठीक नीचे जबड़े की जड़ में पड़ा | प्रत्युत्तर में गिरते-गिरते भी विशाल ने बाँहों से संजीव की कौली भर ली | क्षणों में दोनों नाले में पड़े कर्दम (कीचड़) संग होली मना रहे थे | लोटपोट होते कितनी कीचड़ आँख-नाक में गयी और कितनी मुँह से थूकनी पड़ी दोनों में से कोई न जान पाया | रोजाना इनके दारू के चखने से बोटियाँ पाने वाले कुत्ते मोती को शायद यह सब पसंद नहीं आया सो उसकी भऊ भऊ की आवाज भी इन दोनों के सुरों में मिलती चली गयी | थोड़ी देर बाद गिरते-पड़ते-लड़खड़ाते निकले बाहर और एक दूसरे को कानों से कीड़े झाड़ने में सक्षम शब्दावली से नवाजते हुए धीरे से उठकर अपने अपने घरों की राह चल दिए |
[ १० ]
     माँ बोली- "नासपीटे, अब तक तो झूमता ही आता था और अब ये ज़माने भर की कीचड़ भी साथ लाने लगा?" दो झापड ज़माने का मन होकर भी माँ ऐसा करने की हिम्मत न जुटा पायीं, ऐसी विष्ठा से भरे चेहरे को छूने भर की भी इच्छा कौन कर सकेगा? घिन और बदबू से कै आने को थी, अपने नसीब को कोसते हुए नहाने की हिदायद देकर चलती बनीं | नहाते वक्त कई जगहों पर हाथ नहीं फेरा जा रहा था, दर्द भरी ऐंठन से सारा शरीर टूटा जा रहा था | नहाकर सबसे पहले शीशे में निहारा खुदको, अपने सूजे थोबड़े को देख संशय में पड़ गया कि मारा तो मैंने ज्यादा था पर ये परसादी मेरे हिस्से ज्यादा कैसे कैसे आ गयी? बाहर गया तो फिर एक झोंका माँ-बाप के जोड़े के श्रीमुख से निकले प्रवचनों का आया, जिस गति से बाहर आया था दूनी रफ़्तार से भीतर भी समा गया |
[ ११ ]
     कमरा बंद करके विशाल ने फोन लगाकर पूछा जरुरत क्या थी तेरे बाप को एक बार फिर नौटंकी वाले तरीकों से बात करने की? और ये संजीव शुक्ला का क्या चक्कर था तेरे साथ? एक पल को तो अपर्णा सुट्ट खींच गयी लेकिन जवाब तो देना ही था और चोटी का लम्बापन सिर की खाल को हजारों छिद्रों पर से दुखाये जा रहा था सो यह जान कि इस रिश्ते का कोई अंजाम नहीं भड़क पड़ी- "तुमने मुझे खरीदकर कोई लौंडी बांदी बना रखा है क्या जो मैं तुम्हारी हर बात का जवाब दूँ? दो कौड़ी का आदमी और उसके लिए इतनी तकलीफें झेलो? अब झेले मेरी जूती | तेरे बाप की प्रोपर्टी और तेरी नौकरी देखकर तुझे हाँ की थी वरना अच्छी सूरत तो हर गली में एक मिल जाती मुझे | आज के बाद फोन करने की जुर्रत तक न करना वरना कुत्ते छुडवा दूंगी |" इतना बोल काट दिया फोन | अपनी जगह साकत कुछ सोचने से लाचार खड़ा नसीब को कोसने लगा | हाय रे! मेरे ही मत्थे पड़ने थे इत्ते सारे दुष्ट? ओये! नरक मिलेगा सालों, कीड़े पड़ेंगे सबको (भूल गया था कि उनमे एक उसका बाप भी था) |
[ १२ ]
     भरपेट बददुआएं दे चुकने के पश्चात दरवाजा खोलकर स्टोररूम से बेगोन-स्प्रे की बोतल उठा लाया | सुसाइड करूँगा सोचकर ढक्कन खोलकर बोतल मुँह से लगाने का प्रयास किया परन्तु मरने के लिए भी हिम्मत चाहिए होती है, हिम्मत कम होने से अधपका इरादा ढक्कन चाटने जितनी दूरी ही तय कर पाया कि ढक्कन पर भी कभी न कभी बेगोन लिक्विड लगा ही होगा | अरे भईया बिना बोतल हिलाए नया ताजा माल ढक्कन तक जायेगा कैसे? और जो चला भी गया तो तू कोई मच्छर तो है नहीं कि चाट लिया और दुनिया से चट हो लिया? सुसाइड नोट लिखकर दरवाजे के पास उसी बोतल से दबाकर बीचों-बीच रख आया कि कोई आये तो पहले यही देखे |
[ १३ ]
     सबसे पहली नजर पड़ी छोटी बहन रश्मि की जिसने आज तक चैनल को भी पीछे छोड़ दिया और सबसे तेज खबर माँ बाप से कहीं आगे जाकर मौहल्ले तक के दीदार कर आयी | अब क्या था एक तो छोटा शहर ऊपर से लगभग सभी आपस में जानने वाले | जो ताने मिलने शुरू हुए पापियों को नगर भर में कि पूछो मति | बड़ी देर बाद घरवालों को सुधि आयी तो दो-झापड, दो-पुचकार और दो-फोन हॉस्पिटल और पुलिस के नाम हो गये | इधर विशाल साहब अपने स्प्रिंग बेस से बने उछाल वाले गद्दे पर पड़े सोच रहे थे- "मौत का दर्द कैसा होता होगा? कितना तडपन मिलती होगी? मुझे मिलने वाली तड़पन आखिर शुरू कब होगी? कहीं ऐसा न हो कि पता भी न चले और खुदागंज का टिकट कट ले मेरा? हाय मेरा बलिदान व्यर्थ चला जाना है"| उधर इकलौते बेटे को खोने का भय पितृपक्ष को दहलता जा रहा था | उसके बाद शुरू हुआ इलाज का दौर, जो न हुआ उसके इलाज का दौर | जाने क्या अजीब घोल सा पिलाकर सुबह से अब तक का सारा खाया-पीया कै करवा कर निकलवा लिया गया, इतनी उल्टियाँ आयीं जिनमें आँतें तब बाहर को उबल पड़ीं | गले और पिछवाड़े से होकर जाने कैसी-कैसी नलिकाएं पेट तक पहुँचाई जाने लगीं | "हाय! मैंने ढक्कन काहे चाट लिया?" अगले छः घंटों में पेट को दुधारू गाय बना पूरा दुह लिया गया, कुछ न बचा उसमें, आँतें फिर भूख से कुड़कुड़ाने लगीं | बोलने की सोची भी लेकिन दो नलियाँ मुँह में फंसी होने से आवाज निकली जरुर मगर उससे शब्द रचना नहीं हो पायी |
[ १४  ]
     खबर जंगल की आग बनी हरबंस गुप्ता जी के दर पर भी ठोकरें खाने लगी | मान-सम्मान वाले भगत मानुस थे, पहुँच गये हस्पताल इस घोषणा के साथ- "अब यही मेरा दामाद होगा | इतनी सच्ची चाहत और भला कौन दे पायेगा मेरी छोरी को?" अपर्णा भी हैरान-परेशान समझ नहीं पायी क्या प्रतिक्रिया दे इस सब पर | माँ-बाबा भी मिन्ट में रेडी हो लिए शादी के लिए | बेहोश तो हुआ न था लेकिन जैसे ही विशाल ने ये खबर सुनी खुशी से अर्ध-बेहोशी की अवस्था में पहुँच गया | वाह जी वाह, हींग लगी न फिटकरी रंग सतरंगी आयो | अगले कुछ दिनों में सगाई और शादी भी संपन्न हो गयी | घोड़ी दुल्हन के द्वार चढ़ते ही पंडित के कहने पर कुलदेवता को याद करने के बदले जो जयकारा निकला वो था "ढक्कन बाबा की जय हो"| सारे खानदानी भी सोचने लगे ये कैसे कुलदेवता हैं हमारे जिनका नाम आज ही सुनने में आया? ऐसे कुलदेवता कभी किसी ने न सुने थे सो सबकी नजरें अपने ज्ञानकोष को खंगालने लग पड़ीं परन्तु समझ कुछ न आया | इसीलिए कहता हूँ दोस्तों एक-एक ढक्कन हमेशा अपनी जेब में रखा करो क्या जाने कब काम आ जाए?

● जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (18-03-2012)
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Comments

One response to “ढक्कन बाबा की जय”

22 August 2012 at 12:42 PM

हरबंस गुप्ता की हुलिया बयान बहुत ही रोचक |
आपने बहुत चीजों को इस कहानी में समाहित करते हुए उसपर शानदार कटाक्ष किया है ...काबिलेतारीफ|
एकलग पूरी कहानी पढ़ गए...

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