दायरे.. ©
Monday, 3 January 2011
- By Unknown
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कविता कोष
दायरे.. ©
कुछ सवाल कुछ ज़वाबों के घेरे में , उलझा जीवनपथ..
सीमित दायरे , दरकता है जीवन उनमें पल-प्रतिपल..
दहकते दावानल, स्वप्नों का होता दोहन उनमें निरंतर..
पल-प्रतिपल , भसम् उठा ख्वाबों की भेंट चढा रहे हम..
चरणों में अर्पित करने लगे , सीमित दायरों भरा जीवन..
चरण उस पथिक के , जिन्हें सहेजा गया है हमारे लिए..
नाम भर का स्वप्न सा है पथिक , अनुभूत जिसे करना..
जैसे उल्लास से सुवासित जीवन , लेता विराम अचानक..
क्यूँ परवश बंधित है मानव मन , बंधन के नाम पर..?
क्यूँ बादल संग न उड़ता फिरता , बावरा ये मानव मन..?
रची-बसी चाहना , ह्रदय कोटर में वीतरागी पखेरू सम..
भरना चाहता हूँ कुलाँचें , उस हरिन सह जो मुक्तक सा है..
डाकिया आता है मेरे द्वार पर , हर दिन नयी कहानी संग..
क्यूँ नहीं कोई कहानी , है जो मुझसे शुरू या हो खतम..?
हर ख्वाब नातों की दहलीज से टकराकर होता चकनाचूर..
ज़बरन जगह बनाती नयी आदतें , बन जाती यहाँ संगी..
मस्तिष्क को दे स्वप्न-निवाला छोड़ जाये , वो आदत..
सालता है गम आदत का , कि चली ना जाये फिर कहीं..
शूल हैं भ्रम आशा भरे , पूरे होने पर यही देते है सुख..
मोडें मुख कैसे ? किसी भी पहलु से, उम्मीद भरा है जीवन..
जब कोई आस नहीं, दबे ढके क्या सच में कोई आस नहीं..?
सुगबुगाहट मस्तिष्क से , रहती निकलती है निरंतर..
संतुष्ट स्वयं को करने , खींच लेते हम कमजोर से दायरे..
रेशे से बनी वही बंदिशें , टूटने पर फंदे सा भान करातीं..
क्यूँ ना खुला छोड़ दें हम मन को , कि बनाने वाले ने..
बनाया है उसे ऐसा ही , स्वच्छंद खग सा गगन विचरता..
कौन होते हैं हम , बंदिशें के जाल उस पर लादने वाले..?
कर हसरतों को भूमिगत जिन्दा कहलाते हैं हम..
कर निर्मित नवीन गढ़ दायरों वाले चहुँ ओर हमारे..
दायरों ने कर रखा है गोल मकडजाल सा सोचों को भी..
बाँध दीना हमने सारा जीवन , बेफिजूल इन सींखचों में..
क्यूँ ना छोड़ दें उसे , मुक्त गगन में फडफडाता हुआ..?
नहीं छटपटाते रहो इन्हीं दायरों में, बेलगाम घोड़े की तरह..
और लग भी जाये कभी लगाम तो , अपने से परे हटकर..
जिए जाओ ताउम्र , और किसी के जीवन दर्शन पे चलकर...
बूढ़े होने तक सोचते फिरना क्या किया , हमने जीवन भर...
मिलेंगे ताले जड़े , दायरों की परिधि पर हर जगह...
कुछ छोटी बड़ी औलाद की खुशियों के आलावा... देखना...
क्या मेरा , क्या तुम्हारा... हश्र यहाँ , होना तो सबका यही है...
जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 03 जनवरी 2011 )
Photography by :- Jogendra Singh
In this Picture :- Me.. (Jogendra Singh)
(Photo clicked by the help of mirror)
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फितरत ::: ©
Thursday, 23 December 2010
- By Unknown
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फितरत ::: ©
आईने पे न शिकन है न किरचें कहीं.. उसे तो बस किसी की फिकर नहीं..
कह देखो शायद सुन ले वो तुम्हें भी.. वर्ना चेहरे बदलना है फितरत उसकी..
__________________जोगी :((
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क्यूँ आज भी..? ©
Wednesday, 22 December 2010
- By Unknown
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क्यूँ आज भी..? ©
कुछ लफ्ज़ कहें तुमसे या तुम हमसे... गया ज़माना हो गया है यह अब... क्यूँ आज भी..
लिपटाये बैठे हैं उन ज़र्द पत्तों को खुद से... सुना है आज फिर से कुछ नाते हवा हो गए हैं...
__________________(जोगी..) ..... :((
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बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©
Tuesday, 21 December 2010
- By Unknown
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बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©
शुरू में गज़ल सी , फिर भटकती लय है क्यूँ जिंदगी......
हर रंग भरा इसमें तुमने , सवाल सी है क्यूँ जिंदगी.......
ज़वाब दिए खुद तुम्हीं ने , फिर अधूरी है क्यूँ जिंदगी.....
माना है डगर कठिन , कदम बहकाती है क्यूँ जिंदगी.....
मंजिल का पता नहीं पर , राह भटकाती है क्यूँ जिंदगी.....
Photography & Creation by :- जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (21 दिसंबर 2010)
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वंदे~मातरम :::
Sunday, 19 December 2010
- By Unknown
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► वंदे~मातरम :::
ये सिर्फ दो शब्द मात्र नहीं हैं जिन्हें जैसे चाहा मुँह खोल कर उगल दिया..... बल्कि इसके मायनों को समझना , उन्हें ह्रदय से अंगीकार करना और फिर इन शब्दों को सार्थक बनाने के लिए मातृभूमि पर हो रही हर गन्दगी से उसे मुक्त करवाने के कार्य पर लग जाना... तब मुँह से वंदे~मातरम निकाला जाना चाहिए.....
► जोगी :)
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