गुलिस्तान





कहने को तो तुम्हें दे देने थे, यह फूल मगर, ज़माने को यह गवारा न था !!
सूख चुके हैं फूल मगर, अब भी तत्पर हूँ देने को यह गुलिस्तान तुम्हें .. !!

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 25 सितम्बर 2010 )



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Comments

7 Responses to “गुलिस्तान”

26 September 2010 at 1:26 AM

बहुत खुबसूरत के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने ........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
क्या आप भी थर्मस इस्तेमाल करते है ?

26 September 2010 at 1:26 AM

बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने ........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
क्या आप भी थर्मस इस्तेमाल करते है ?

26 September 2010 at 1:43 AM

@ गजेन्द्र जी ,,, शुक्रिया ... :)

26 September 2010 at 11:20 AM

बहुत खूब। शुभकामनायें

26 September 2010 at 10:26 PM

धन्यवाद @ निर्मल जी ... :)

26 September 2010 at 10:27 PM

कैसे हो @ राणा ... छोटे आज बहुत दिन बाद मेरी याद आई ... ?

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