तुम पतवार



तुम पतवार

कोशिश में हूँ
तुम्हें भूल जाने की
निकाल ना सका
तुम्हें मन से..

जाने कब-कब
मेरे हवासों पर
छा जाती हो
तुम आकर..

द्वंद-पूरित
यह जीवनपथ
जाने कितने ही
काँटों-संघर्षों भरा..

तुम्हारी कल्पना संग
उसका हाथ पकड़
तब निकल पाता हूँ
सारे झंझावातों से..

भूलते-भूलते
जाने कब आकर
बस जाती हो
ह्रदय पटल में..

धुंधली आकृति वाली
डबडबाई आँखों से
हो जाती हो समाहित
बन पतवार मेरे जीवन की..

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (05-02-2012)

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Comments

9 Responses to “तुम पतवार”

avanti singh said...
5 February 2012 at 8:45 PM

bahut khubsurat rachna hai

5 February 2012 at 9:51 PM

Prem aisa hi hota hai jisko bhoolna mushkil hota hai ... Jo paar karata hai bhav sagar se ...

5 February 2012 at 10:00 PM

इतना आसान नहीं भुलाना

6 February 2012 at 12:40 PM

गहन ...मर्मस्पर्शी ...
... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

Jogendra Singh said...
6 February 2012 at 1:16 PM

▬● अवंती जी / थैंक्स दोस्त...

Jogendra Singh said...
6 February 2012 at 1:19 PM

▬● दिगंबर जी / हा हा हा , आपने तो भवसागर से ही...

Jogendra Singh said...
6 February 2012 at 1:21 PM

▬● रश्मि जी / सच में आसान नहीं होता भुलाना...

Jogendra Singh said...
6 February 2012 at 1:22 PM

▬● संजय भास्कर जी / आभार दोस्त...

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