प्रेम-प्रतिज्ञा (कटाक्ष कहानी)



प्रेम-प्रतिज्ञा ● © (कटाक्ष कहानी)

बहुत दिन हुए आज की तरह यूँ बैठना नसीब नहीं हुआ था | गहरी गुनगुनी उसांस सी छोड़ते मैंने बालकोनी से नीचे झाँका | कुछ दूर सामने से एक अंकल चले आ रहे थे | कमर पर पतलून तो थी मगर बेल्ट कमर से कहीं ऊपर कदरन पेट के बीच जाकर बाँधे चले आ रहे थे जैसे बुढ़ापे में उनकी कमर ऊपर को सरक आयी हो | इन्हें ही क्यों बल्कि बहुत से बूढों को इस हाल में देख चुका हूँ जिनकी पेंट कमर के बदले पेट पर बंधी दिखाई पड़ती है जैसे कमर पर से पतलून रोक सकने का भरोसा ही उठ गया हो | कितना अजीब होता है यह देखना कि एक समय इंसान नंगा पैदा होकर पहली कच्छू पाँवों से चढाता है, फिर धीरे-2 यह सफर कमर तक आकर रुक जाता है | पूरी जवानी कमर के भरोसे रह अचानक पतलून कुछ और ऊपर को सरक आती है जैसे पहली जगह रहती तो फिर प्राकृतिक वेशभूषा में आना न पड़ जाये कहीं |

इन्ही खन्ना अंकल की बड़ी बेटी सुमन को देख मन ही मन इन्हें ससुरजी का दर्जा देने की इच्छा पनप उठी | लेकिन सुमन थी कि जैसे उसे मतलब ही नहीं था किसी से | गुमसुम नीची नजरों संग आना-जाना उसका जैसे कहीं किसी ने दिमाग के लेवल पर जाकर तालाबंदी कर रखी हो | अपने परिवार संग अभी दो साल पहले ही तो आये थे खन्ना साहब | लेकिन बमुश्किल हफ्ता भर ही गुजरा होगा जब सुमन को पहली बार मेरे होने की अनुभूति करा पाया | हुआ कुछ यूँ था कि मैं बैठा था कॉलोनी की बाउंड्री वॉल पर लोहे के फाटक के किनारे और वहाँ से सुमन का गुजरना हुआ | तभी किसी लफंगे ने कोई जुमला उछाल दिया | जुमला तो न सुन पाया मगर सुमन को जैसे घडों पानी से नहाया पाकर उस मनचले से उलझ पड़ा | वाह ! वो भी क्या धुनाई थी मजा आ गया | दे हाथ, दे लात, धें-धें करते पूरे दस मिनट लगे इस मामले को निबटने में | पता चला तब, जब उस मनचले ने मेरा पुलंदा सुमन ही के सामने बाँध दिया और मुझे अपने कराहते मुँह से स्वरों का विस्फुटन भी पीड़ा का आगमन स्त्रोत जान पड़ने लगा |

मनचला तो चल दिया अपनी राह लेकिन मुझे उठकर जाना कुछ यूँ लगा जैसे दो बार वैष्णो देवी की चढाई लगातार चढने-उतरने के बाद फिर से वही काम करना पड़ जाये | चला था मुरारी हीरो बनने और खुद ही मोहताज बन बैठा | गर सुमन के काँधों का सहारा न मिला होता तो जाने क्या होता मेरा | जैसे तैसे उस कोमला ने घर पहुँचाया लेकिन ये भलमनसाही भी भारी पड़ गयी बेचारी को | मेरी माँ कौनसी कम थी, देखते ही समझ गयी मेरे लच्छनों को | उसके बाद जो म्यूजिक सिस्टम शुरू हुआ तो उसका रुकना किसी के बस में न था | और सुमन? हाय बेचारी! सोच रही होगी वो मनचला दस बार और छेड़ जाये लेकिन ऐसे मददगार कभी ना मिलें | हाय रे! कैसे-2 लांछन सुने और सहन किये होंगे मेरी भोली ने? जाने कब और कैसे निकल भागी ये बात उस बेचारी को समझ तक न आयी होगी | और मैं? बोलने से लाचार अपना सूजा हुआ टेढ़ा मुँह लिए चुपचाप पड़े रहने से ज्यादा कुछ न कर सका |

इतनी कमाल इमेज कभी किसी प्रेमी की न बनी होगी शायद | चंगा हो जाने तक के बाकी सारे दिन अरमानों की लाश लिए करवटें बदलते गुजर गए | उसके बाद भी कुछ दिन सामना करने की हिम्मत ना पड़ी | दसवें दिन पहला काम जिम ज्वाइन करके का था और इक्कीसवें दिन फिर उस लफंगे के सामने खड़ा था | नसीब भी देखो कितना कमाल कि सुमन के देखते हो रहा था ये सब | पर मैं जानता था कि इस बार पहले जैसा कुछ न होना था और इस बार सच में नया करिश्मा हुआ | फिर एक बार ले-दे हुई, धम-धूम-धडाम भी हुई लेकिन एक नये अंदाज में | क्या धाँसू रिजल्ट था | मेरे भगवान मजा आ गया | इस बार कमीने ने मेरी ही पतलून उतार कर मेरे हाथ-पाँव बाँधे और तबियत से तसल्ली से बगल में बैठकर धुनाई की थी | उफ्फ सारा जीवन भी चाहूँ तब भी उस दर्द की याद भुला नहीं पाउँगा | दुष्ट ने हर चोट पर कई-कई चोटें लगायीं | इस बार सुमन ने पास आने की कोई कोशिश नहीं की लेकिन दया के भाव उसके चहरे पर साफ देख पा रहा था | कैसे बताऊँ उसे कि मुझे दया नहीं प्रेम के भाव चाहिए जो गलत रूप बदल उसके चहरे पर अवतरित हो गए थे |

किसी दुकानदार ने मेरी पतलून की गांठे खोलीं तब कहीं जाकर अकड़े-दुखते हाथ-पाँव आजादी को महसूस कर पाए | आज कोई कांधा नहीं था सहारे को | मैं इसकी जड़ में अपनी माँ को साफ देख पा रहा था | हाय.. एक टीस सी उठ गयी कमर में जहाँ कुछ ज्यादा ही लातें पड़ी थीं | हाँ तो मैं कह रहा था कि भगवान ऐसी जल्लाद माँ किसी को न दे | बच्चे के प्रेम पर ग्रहण बन बैठी थी | घर जाने पर वही किचकिच, वही बालकोनी में मेरे हमेशा होने पर कसे जाने वाले तंज लेकिन गुस्से में पड़ा माँ का झापड इन सबमें भारी गुजरा जो अभी-2 ठुककर आने पर ठुकी हुई किसी जगह पर ही रसीद हो गया था | कुछ दिन चाहिए थे चल-फिर के लायक बनने के लिए | इस बार माँ के व्यवहार में दया और ममता भी दिखाई दी | दिल से की गयी सेवा का नतीजा मिला | जल्दी ही मैंने खुद को भला चंगा पाया |

नौकरी | हाँ, नौकरी के लिए भी कोशिशें ज़ारी थीं कि कुछ उल्टा सीधा घटित होने पर सुमन के साथ अपना घर बसाने में कोई परेशानी नहीं आये | मिल गयी नौकरी लेकिन छोटी सी | एक कंपनी में सेल्स मैनेजर नाम की पोस्ट थी, सुनकर बड़ा खुश हुआ लेकिन जाकर देखा कि ऐसे मैनेजर भरे पड़े हैं | सेल्समैन का नाम बदलकर मैनेजर रख देने से वैल्यू थोड़े ही बदल जानी थी | एक दिन पहुँच गया सुमन के घर और उसके हाथों में पूरे पाँच हजार रख दिए अपनी पहली तनख्वाह के | तब शांति से बड़ी गर्वीली नजरों से आस पास के माहौल का जायजा लिया | लगता था कुछ मेहमान पहले से मौजूद थे वहाँ | पहली बार किसी ऊँची बंधी पतलून वाले बुड्ढे के हाथों धुनाई करवाने का अनुभव पाया कि मेरे पाँच हजार रुपयों ने सुमन का होता हुआ रिश्ता तुडवा जो दिया था | कुछ ही दिनों के अंतराल में एक साथ इतनी बार और इतने जोरों की धुलाई पहले कभी नसीब नहीं हुई थी मुझे |

बाद में खबर मिली कि सुमन का रिश्ता कहीं तय हो गया है और दो हफ्ते बाद उसकी शादी है | घर पर कार्ड आया लेकिन हिदायत के साथ कि आने की कोशिश नहीं करियेगा | अपनी इन्हीं आँखों के बहती बूंदों संग उसकी विदाई देखी थी मैंने | अरे! कलेजा क्यों ना फट गया मेरा | देवदास बना उसी बालकोनी में जिंदगी के कुछ दिन गुजार गया |

कई दिन बाद आज फिर बालकोनी में बैठकर उत्सुकता से सामने सड़क पर देख रहा हूँ | सामने से एक अंकल चले आ रहे थे | इनकी पतलून कुछ नीचे की ओर थी, शायद बुढ़ापा पूरी तरह हावी नहीं हुआ अभी | ये तिवारी अंकल थे जिनकी कनिष्ठ पुत्री तनया को देखने की कोशिश में इस्तेमाल हो रहा था इस बालकोनी का | लेकिन कसम खाकर कहता हूँ इतना सच्चा प्रेम पहले कभी न हुआ था मुझे | इस बार अपने प्रेम को पाने के लिए जान की बाजी लगनी भी पड़ी तो लगा दूँगा, वैसे भी अब मेरे डोले कुछ ऊपर की ओर बढे दिखाई देने लगे हैं | तनया नजर आयी ही थी कि नीचे से माँ की किचकिच शुरू हो गयी | लेकिन सच कहता हूँ इस बार मेरा प्यार हर बार से भी ज्यादा सच्चा है और इसके लिए मैं उससे बात भी करने की कोशिशों में हूँ | कितना खुशगवार सा लगता है ना अपने ख्यालों संग जीना?

आज बड़ी गहरी नींद आयेगी | दर्दनिवारक दवाइयों का असर जो हो रहा है | तनया भाग गयी थी अपने किसी लफंगे दोस्त के साथ और जाते जाते उसका दोस्त एक बार मुझसे भी मिल गया था | वो क्या बल्कि मैं ही उसे रोकने की गरज से उन दोनों के सामने पहुँच गया था | तीन काम एक साथ हुए, पहला तो तनया के सामने पहली बार मेरा प्रणय निवेदन, दूसरा उसके दोस्त को मेरा ललकारना, और तीसरा उसका मेरे शारीर से यूँ खेलना जैसे मैं कोई बॉक्सिंग किट के साथ खेलता है | लेकिन अब मैं सुधर गया हूँ और मैंने कसम खायी है कि नुक्कड़ वाली सुलेखा के आलावा अब किसी और के बारे में सोचूंगा तक नहीं | चलिए अब शुभरात्रि |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (27-02-2012)

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Comments

One response to “प्रेम-प्रतिज्ञा (कटाक्ष कहानी)”

28 February 2012 at 10:21 AM

जल्लाद माँ न हो तो ज़िन्दगी नहीं बनेगी ...

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