जलन



 जलन 

जो ये जलन तुम्हारे नाम-ऐ-कलम पर लिखी होगी,
इस जलन के सदके, हम अपना जीवन गुजार लेंगे..... जोगी (04-02-2012)

हँसी के आगोश में आँसू छिपा जाते हैं,
हम तो अपना ही शीशा तोड़ जाते हैं,
कहते हैं वो क्यों दिल लगाये जाते हो,
चल दिए हम अपना ही दिया बुझाकर... जोगी (04-02-2012)

ख़ामोशी बन जाये जब दिल की जुबाँ ,
कहते हैं तब अंजाम बड़ा दिलकश होता है..... जोगी (04-02-2012)

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Comments

6 Responses to “जलन”

5 February 2012 at 12:24 PM

ख़ामोशी बन जाये जब दिल की जुबाँ ,
कहते हैं तब अंजाम बड़ा दिलकश होता है... तब भाव गहरे जो हो जाते हैं

5 February 2012 at 12:54 PM

गहरे भाव लिए है आपकी रचना ... बहुत अच्छी लगी ...

5 February 2012 at 3:37 PM

जलन से भी किस तरह हम सकारात्मक बने रह सकते है ..इसकी सुन्दर अभिव्यक्ति पढने को मिली....

Jogendra Singh said...
5 February 2012 at 4:00 PM

@ रश्मि जी / सारा खेल ही भावों का है...

Jogendra Singh said...
5 February 2012 at 4:03 PM

@ दिगंबर जी / धम्य्वाद दोस्त...

Jogendra Singh said...
5 February 2012 at 4:05 PM

@ कविता जी / पॉजिटिव - निगेटिव सब हमारे ही तो हाथ में है...

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