न पुतला माटी का यूँ फ़ना होता



न पुतला माटी का यूँ फ़ना होता ● ©

न अरमान तुम्हें लिख भेजे होते,
न तुम कहते वो आखिरी खत हो,
न मेरा वो खत आखिरी होता,
न जरुरत पहले की होती,
न वो फलसफे बयान होते,
न हम तुम आज साथ होते,
न लिफाफा तकिये में रखा होता,
न होता गीला तकिया मेरा,
न हर्फ़-ऐ-लिफाफा धुंधले होते,
न डाकिया घर आया होता,
न यूँ हम आज रुसवा होते,
न तुम हमसे यूँ खफा होते,
न पुतला माटी का यूँ फ़ना होता...

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (29-02-2012)

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Comments

One response to “न पुतला माटी का यूँ फ़ना होता”

1 March 2012 at 2:20 AM

wo pyar hi kya jo mati ke putle ko faana hone par majbur na kar de.....

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