गोगी (कचोट-कथा)


गोगी ● © (कचोट-कथा)
(मुख्य पात्र : गोगी, बुआ, जस्सी)

पैदा हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि माँ के साये से छीन उसे किसी शौक़ीन परिवार को सौंप दिया गया | एक गोद से दूसरी तक कुछ हजार रुपयों के बदले यूँ स्थानांतरित हुआ जैसे वह भी घर के राशन जैसा कोई सौदा हो | परन्तु वह तो वही था निराला दुनिया से | माँ ने आदम जात के यहाँ आधा दर्जन जन दिए थे और चूँकि माँ को मनुष्य के साथ अपना सरपरस्त सा समझते व्यवहार करते देखा तो उन्हें भी आदम को पेरेंट्स की तरह समझने की आदत गुलामी के अनबंधे पट्टे पर खुदी मिली | नये परिवार के हाथों स्थानांतरित होना खेल सा ही था उसके लिए |

हर कोई गोद में लिए गोगी (उसका नाम) की आँखों में झांक नयी पहचान बनाने की कोशिश में था | सभी के अपने स्वार्थ थे उसके के होने से मगर गोगी? उसने तो बस गोल छोटी मासूम सी निष्कपट अपनी आँखों पर के पटपटे झपका देने थे | उन भोली आँखों पर जितनी बार नये घर के सदस्य कुर्बान हुए, उतनी ही बार उसकी थूथनी, सर और शारीर पर प्यार भरे सहलाव मिलते चले गए | कुछ समर्पित प्रेमपूरित वाक्यांश नये मिले बाळ-कुक्कुर को नसीब हुए जा रहे थे |

घर आने पर जगह बेशक नयी थी लेकिन मिल रहे दुलार के आगे माँ के स्तन भी भुला बैठा | बच्चों के लिए जैसे एक नया खिलौना आ गया था सो लदे पड़े थे उसपर और ये भाई भी कहाँ कम थे पिल पड़े उन संग | भागता हुआ दादाजी के पाँवों तक जा पहुँचा और आदतानुसार पायजामे पर झूल गया | कुछ समझ ही न आया कि वहाँ ये अचानक दूर यहाँ कुर्सी के पाए तक कैसे आ गिरा? पता चला दादाजी को नफरत थी इस प्राणी से और अपनी नफरत अथवा घृणा दिखाने का इससे कारगर उपाय उन्हें कुछ और न लगा कि फुटबॉल खेलने का अपना शौक पूरा कर लें | उधर कुछ हवा में और कुछ जमीन पर रगड़ता घिसटता निरीह प्राणी कुर्सी के पाए से बड़े जोरों से पसलियों के बल टकराया | मुँह से मिमियाई सी मद्धिम आवाज में चिल्लाया | कूँ कूँ करता उठने की कोशिश भी की लेकिन उठना एकदम से संभव नहीं हुआ | बड़ी तेज दर्द को लहर सी उठ गयी पसलियों और माँस-पेशियों के मध्य | कुछ पल को स्तब्ध सा बैठा फिर लंगड़ाता हुआ जैसे तैसे उठकर जस्सी के पास जा पहुँचा जिसने अब तक सबसे ज्यादा प्यार उंडेला था उसपर | दौडना भूल सहमा सा अब जस्सी की गोद में पनाह ढूँढने की कोशिश में वहाँ से भी गिर पड़ा | आखिर जस्सी खुद भी तो पाँच साल का बच्चा ही तो था |

कुछ देर पहले के शहंशाहे आलम अब वजह तलाश रहे थे कि ऐसा क्या कर दिया मैंने? दादाजी के पाँवों से जरा खेलना ही तो चाहा था | और तो कुछ आता नहीं था उसे | इसके सिवा करता भी क्या? बोल नहीं सकता था वरना जस्सी होता तो अब तक रो-रोकर घर सर पे उठा लिया होता | रह-रहकर पसलियों में उठने वाला दर्द तकलीफदेह मालूम पड़ता था लेकिन क्या करे अब जस्सी को उससे खेलना जो था सो न उठ पाने और न खेल पाने पर यहाँ भी उसके साथ धक्कम-पेल शुरू हो गई और अंत में वो भी इसे कुछ धौल जमाकर एक ओर को अपनी गुड़ियों के पास चल दिया | पूरी रात कराहों संग गुजरी और सुबह एक कटोरा पतले दूध में चूरी हुई रात की बासी रोटी | बच्चा था, करता भी क्या? मुँह फेर कर नखरे दिखाने में खुद को व्यस्त कर लिया | तभी पीछे से निर्मोही कर्कश आवाज कानों में पड़ी "पड़ा रहने दो ऐसे ही, थोड़ी देर में भूख लगने पर सब खा लेगा"| उसे समझ तो नहीं आयी यह इंसानी भाषा मगर अंदाजे बयाँ से कुछ मतलब पल्ले पड़ गया कि ये जो भी था वो उसके नखरे को लेकर था | उठती टीसों के बीच भूख से बिलबिलाता, उदराग्नि से पीड़ित और नन्हे से दिल वाला मासूम प्राणी कब तक अड़ता, खा लिया मन मारकर |

अब तक उसे समझ आ गया था कि इस घर में अच्छे से रहना है तो हर आवाज पर प्रतिक्रिया देनी होगी अन्यथा मार, डाँट, ठुकाई कुछ भी मिल सकता है | साथ ही बाळमन का क्या करे हसरतें जस्सी से कहीं कम नहीं थीं ऊपर से कॉम्पिटिशन का भाव भी कि मम्मी ने जस्सी को गोद में लिया तो मुझे क्यों नहीं लेती | बदले में होने वाली धक्का मुक्की में मुकाबला कभी बराबरी का रहता तो कभी हड्डियाँ चरमरा जाती थीं | क्यों न चरमराएँ? आखिर एक कुत्ते और उनके घर के इकलौते चश्मो-चिराग का क्या मुकाबला?

इसी बीच कुछेक बार दादाजी से परसादी मिलने के बाद दूर-2 ही रहना श्रेयस्कर जान अपनी जान का दुश्मन बनने से बचा हुआ था | उधर घर में एक विधवा बुआ भी थीं जो हमेशा किसी भी अप्रत्याशित विपदा से उसे बचा लिया करती थीं | जो हर गलती के बाद किसी के कुछ कहने या करने के समय बच्चा है कहकर ढाल बन जाया करती थी | जाने अनजाने इसने भी उन्हें अपनी माँ का दर्जा हाँसिल करा दिया | दोनों माँ-बेटे घंटों बतियाते, बतियाते तो क्या वो कहतीं और ये पूँछ हिलाकर प्रत्युत्तर देता | थोडा ऊधम भी किया करते | लेकिन जस्सी के आने पर बुआ का बस भी ज्यादा नहीं चलता था आखिर असली मालिक तो वही थे और ऊपर से वो भी एक बच्चा ही तो था | बड़ी बात यह कि बुआ खुद भी एक आश्रिता ही तो थीं |

एक दिन छत से बड़े जोरों से कूँकूँ की आवाजें आने लगीं जाकर देखने पर पता चला जस्सी जी ने इन्हें पतली सी मुंडेल से उस पर तक जाने की आज्ञा दी थी और नहीं जाने पर ऊपर से एक मंजिल नीचे फेंक दिया था |  गोगी जी नीचे पड़े घिसटते एक तरफ को छाया में जाकर दीवार के जोड़ के पास पड़े तडफडा रहे थे | शायद एक पाँव लाचार हो गया था और गले से निकल रही घुंटी सी चीखें किसी भी भावुक इंसान का ह्रदय दहलाने के लिए काफी थीं | सबसे पहले दादाजी आये और मामले को जाने बिना घबराकर जस्सी को गले लगाया फिर लगे हाल चाल पूछने | डर के मारे जस्सी बाबू ने भी  कुछ न कहा और ये साहब तो मुँह में जुबान रखते ही कहाँ थे जो कुछ कह पाते |

ज़माने भर का दर्द समेटे मासूम निगाहें दादाजी का चेहरा तक रही थीं कि कोई तो समझो मेरे टूटेपन को लेकिन बिना कुछ जाने समझे चरमराई कमर पर एक और लात रसीद हो गयी यह कहते हुए कि तू ही है सब समस्याओं की जड़, जबसे आया है मुसीबत ही मुसीबत | आज तेरी वजह से हमारा छोरा गिर गया होता | उधर टूटे शरीर पर जान निकालती एक और चोट बर्दाश्त न कर पाने से अधमुंदी पलकों संग जाने कब-2 गोगी बेहोशी में डूब गया | आँख खुली तो गीली पलकें लिए बुआ उसके जख्मों पर दवा लगा रही थीं | मचल-मचलकर सारी कहानी अपनी माँ को सुनाने की कोशिश में कुछ अधिक ही दर्द पा गया | अंत में छोटी-2 आँखों के पोरों से निकली अश्रु धाराओं ने बेबसी की सारी कहानी बयान कर दी | माँ बेटे दोनों गीली आँखों संग एक दूसरे में समा जाने में लगे थे |

कुछ दिनों में चलने लायक तो हो गया लेकिन लंगडाहट जीवन से अभिन्नता बना चुकी थी | जस्सी का अटैचमेंट भी कुछ कम हो गया था | कल ही तो पापाजी रिमोट वाला नया हैलीकॉप्टर लेकर आये थे | कभी मना भी न किया उसने, जहाँ चाहा जस्सी के इशारों की तामील में उड़कर दिखा दिया | लंगड़ा पिल्ला और लंगड़ा घोडा संभवतः एक बराबर होते होंगे सो अब रात बिछौने वाली गद्दी घर के बाहर रखी बोरी में बदल गयी थी | वो बुआ ही थी जिनकी मेहरबानी से अब तक दरवाजा पूरी तरह नहीं छिना था लेकिन गले में चेन वाला उनका मालिकाना हक अब भी बरक़रार था, नसल विदेशी जो थी | सुबह शाम बुआ खाने का बराबर ध्यान रखती थीं |

किसी दिन सभी को कहीं जाना पड़ा तो द्वार पर इसे बाँधकर पडौसी को ताकीद कर गए कि कुछ घूमना और खाने का ध्यान रख ले | सुबह से शाम और शाम से सुबह इसी इंतजार में बीत जाती कि कब कोई आये और दो दाने डाल जाए | कभी मिलता कभी नहीं, प्यास के मारे गला सूख जाता लेकिन दोबारा पानी देने की जहमत किसी ने न उठाई | अक्सर मुँह से लटकती जिव्हा से टपकती बूंदें तक समाप्त हो जाती थीं प्यास के चलते | तीन ही दिनों में गली के कुत्ते से बदतर हालत में पहुँच गया | उन्हें भी कम से कम खाने-पीने को कुछ तो मिल ही जाया करता था | वहीं दूसरी तरफ छत से गिरने का घाव अब बड़ा होता जा रहा था | थोड़ी बहुत दवा लगाने से ज्यादा कभी कोई कोशिश नहीं हुई उसे ठीक करने के लिए |

परिवार के वापस आने पर उसे उतनी खुशी नहीं हुई जितनी कि बुआ को देखकर | टप टप टपकते कोटरों ने सारी बातों का आदान प्रदान कर लिया | कुछ दिन बाद बुआ का सारा सपोर्ट धरा का धरा रह गया और इसे गली का कुत्ता बन जाने के लिए आजादी दे दी गयी | लंबे समय तक अपना दर-बार न भूल पाने के कारण अक्सर उसके दिन रात उसी द्वार पर बीतने लगे लेकिन अब उसकी खोजबीन का दायरा बड़ा होता चला जा रहा था |

नया-2 गली का कुत्ता बना था सो गलियों के दरबारी अदब नहीं जानता था नतीजन हर जगह से काट-काटकर भगाया जाता | एक बार कोई नामाकूल आवारा कुत्ता उसके बाएं कान का परा का पूरा उपरी हिस्सा ही ले उड़ा | सड़ते घावों में गिजगिजाते कीड़ों के साथ गोगी जैसे-तैसे जीने की आदत बना रहा था | जहाँ भी कीड़े काटने लगते वहीं दाँतों से खुजा-खुजाकर खुद से नये बड़े घाव बनाता जाता | बड़ा याद आता उसे अपने घर में बुआ की गोद में बिताया जीवन | एक दिन तो हाथों में सब्जी की थैली लटकाए रास्ते में बुआ नजर भी आ गयी मगर सड़ते बदन का खौफ उन्हें भी दूर रखे हुए था | एक साथ उनकी आँखों में ममता, प्रेम, दया, तरस, घिन और जाने कितने सारे भाव नजर आ गए थे | अपने पास आने की गोगी की कोशिशों को देख जल्दी-2 बढते क़दमों से बुआ ने सीधे घर की राह ली |

एक दिन सड़क पार करते समय सामने से आते साईकिल सवार ने टक्कर मार दी और सम्हल न पाने के कारण सवार अपनी साईकिल समेत पूरे वजन के साथ बायीं करवट से उसपर गिर पड़ा | बायाँ पैडल लगा हुआ नहीं था और पैडल को टिकाने वाली पैडल रॉड ने उसके पेट के किनारे की धज्जियाँ उड़ा दीं | गालियाँ देता अपनी साईकिल उठाकर साईकिल सवार अपने पीछे तड़पन की सारी हदों को पार करते मचलते एक शरीर को छोड़कर चल दिया | पीछे बेसहारा पड़ा पिल्ला जो किसी दिन शहंशाहों की तरह जिया था आज अपने सूखे छितरे हुए घाव-रंजित बदन को सड़क किनारे करने की कोशिश में अपनी ही जगह हिलकर रह जा रहा था | कुछ लोग घेरा डाले खड़े थे जिनकी ओर आस भरी भीगी पलकों से वो बेजुबान तके चले जा रहा था | किसी ने पास आने की जहमत नहीं उठाई सबको उसके शरीर के पुराने और नये मिले घाव दिखाई दे रहा था  | आज इंसान की मदद के लिए कोई नहीं आता तो यह तो महज कुत्ते का एक बच्चा ही तो था |

कुछ कमजोर दिल वाले लोग देख नहीं पाने के कारण कतराकर निकल रहे थे और कुछ भावुक लोग शाब्दिक भावनाओं को अभिव्यक्त करने में लगे थे | "हाय रे कैसे तड़प रहा है" मिसेज मिश्रा ने कहा | "मैं इसके लिए क्या करूँ, इसका दर्द मुझसे नहीं देखा जा रहा है, देखो तो किस कदर बदन ऐंठ रहा है इसका? हाय! कहीं मर न जाए बेचारा |"-आरती जी बोलीं जो अपने आपको समाज सेविका के रूप में देखती थीं | मौहल्ले के किसी बच्चे ने घर पर खबर कर दी | मचलकर बुआ सीधे बाहर को भागी और पीछे से दादाजी ने कहा "अरी! कहाँ भागी जाती है? मैं फोन किये देता हूँ म्युनिसिपैलिटी में|" उधर पहले ही किसी ने फोन कर दिया था | जब तक बुआ पहुँची जीव से निर्जीव में बदले शरीर को प्लायवुड के एक टूटे टुकड़े पर सरका कर गोगी का पार्थिव शरीर गाड़ी में चढ़ाया जा रहा था | बुआ खड़ी सोच रही थीं "क्यों शरीर-शरीर में इतना फर्क होता है? जान सभी में है लेकिन इसको सहायता पहले क्यों न मिली?" फिर अपनी ही मज़बूरी याद करके सिहर उठी जब खुद उन्हें इसके साथ चिपके रहने पर घर से चले जाने की धौंस दी गयी थी | आखिर थीं तो एक आश्रित विधवा ही ना | उनके सामने से हॉर्न देती गाड़ी चली गयी और ये नजर भरकर अपने बेटे को देखना चाहकर भी नहीं देख पायीं | कुछ बाकी न रहा, झुके नयन, भीगी पलकें, कुछ भारी कदम, घर की राह और वही दिनचर्या | कुछ यादें दिल में लिए बुआ चल दीं घर की ओर |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (29-02-2012)
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