कशमकश




कशमकश ● © (एक विचार कहानी)

मुख्य चरित्र : लेखा / प्रवीन / आशीष

सुबह से ही अंदेशों ने घेर रखा था | कितना समझाया आशीष को ओस भरे इस मौसम में नहीं जाओ मगर यहाँ सुनता ही कौन है | बीवी तो जैसे काम करने की मशीन हो | और उसके सिवा कुछ नहीं | कितने चाव से आयी थी मैं इस घर में | आज भी वे दिन याद हैं जब इन्होने मुझे प्रपोज किया और फिर सारे परिवार को मनाते हुए जिंदगी आज यहाँ तक आ पहुँची |कितना फर्क है तब में और आज में | अब जाकर लगता है प्रेम जताना और निभाना दो अलग दिशाओं की विषय-वस्तु है | प्यार की जिस ऊष्मा संग शुरुआत हुई अब कहीं लुकाछिपी के खेल में मशगूल है | एक ऐसा खेल जिसका अंजाम थप्पी तक नहीं पहुँचना | कम से कम मैं तो इतने बरसों के साथ में यही जान पाई हूँ | कोई वजह नहीं लेकिन आपसी वार्तालाप जाने कब-कब खुले वातायन से काफूर हो चुकी खुशबू बन बैठी है |

देखा जाये तो वजहों कि कोई कमी नहीं वह बस मैं ही हूँ जो सब ठीक हो जायेगा कहते हुए अपने मन को समझाने के प्रयास में लगी रहती हूँ | अंजाम में आम पर कोई बौर नहीं आया, और जब आया तो वह था मेरे चुप रह जाने का बसंत | कहीं कुछ नहीं बदला, जो बदला वो मेरे अंतस का मौन था जो पहले से कहीं अधिक गहरा गया था | खाली समय वटवृक्ष की असंख्य अधोगामी मजबूत जटाओं सामान अपने जीवन में भी उग आयी उलझनों की जटाओं के सिरे सुलझाने के प्रयास में खुद उनसे उलझ बैठती हूँ | क्यों? आखिर मेरी ही साथ क्यों? क्यों शुरुआती प्रपोज संग मेरे सपनों को चातक के पर लगाये? क्यों मुझ चातक को मिले परों के बावजूद खुशियों के चन्द्रमा की एक झलक तक को तरसा दिया गया? क्यों मेरे मासूम के लिए लिए जाने वाले फैसलों में मेरी कोई हिस्सेदारी नहीं होती? एक साथ इतने सारे इन क्यों का जवाब तो क्या मिलना था बल्कि कुछ नये क्यों का इंतजाम जरूर करता चला जा रहा था यह जीवन |

महानगर में सुबह वाली नींद से निजात पा सबसे पहले ससुराल की अपनी जिम्मेदारियां निभाना फिर अपने आप को तैयार कर खुद का ऑफिस की ओर धकेला जाना रोजमर्रा की नियति बन चुका था | वही भागम-भाग वही रेलमपेल, घडी की टिकटिक संग आना-जाना और शाम घर आकर फिर वही जिम्मेदारियां अपना मुँह फाड़े नजर आतीं | इस सबसे निबटते खुद की ओर जब पहली नजर जाती तो रात इतनी गहरा चुकी होती कि अपने आप को शैया के हवाले करने के सिवा और कुछ सूझता ही न था | करने को और कुछ था भी कहाँ | आशीष हैं या नहीं हैं इसका अहसास कराये तो उनको मुद्दतें बीत चुकीं | एक बिस्तर, दो प्राणी और दो करवटें जैसे नियति का हिस्सा हों | धीरे-धीरे मुझे भी बायीं करवट की आदत पड़ चुकी और उन्हें मेरी पींठ देखने की | लेकिन कहाँ? पींठ देखने की आदत तो शायद मुझे भी पड़वा दी गयी थी |

पिछले कुछ समय से इंटरनेट पर अपना वक्त गुजारने लगी हूँ | अबोली आदतों के मध्य अबोली उँगलियों की भाषा अब मुझे बाँधने लगी थी | अपने व्यस्त नित्यकर्म में से कुछ समय निकाल अब जरा खुश होने की नकली कोशिशों में अपने को झौंकने लगी थी | इसी बीच आशीष के तबादले की हवा सी चलने लगी | रूटीन में इससे कोई फर्क नहीं जान मैंने भी इसपर मौन साध लिया | कहती भी क्या? कहने की आदत जो छूट गयी है | कुछ कहने नहीं दिया गया और कुछ मैंने ही छोड़ दिया | शायद घर के भीतर की चीजों से कतराकर चलना अधिक सुलभ लगने लगा है मुझे | तबादला तो आशीष ने रुकवा लिया लेकिन मेरे जेहन में एक नयी बात का तबादला आयातित हो गया कि अब मैं किसी के बिना रहने की कल्पना से भी खुद को अकेली नहीं पति हूँ, या यूँ कहा जाये कि पहले ही इतनी अकेली हूँ कि अकेले हो जाने लायक कुछ लगता ही नहीं | क्या कमाल सिचुएशन है ना? यहाँ रफ़ी दा का गीत बड़ी खूबसूरती से अपनी जगह बना लेता है "सबके रहते लगता है जैसे, कोई नहीं है मेरा" | बहरहाल दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया |

इसी बीच एक नया चेहरा, एक इंसानी चेहरा अनायास ही सामने आ गया | इत्र की बोतल से निकली ताजा खुशबू सा उसका स्वाभाव, बिंदास उसका सोचे बिना कुछ भी बोलते चले जाना, हर स्थिति/ हर बात का हास्यन्तरण तो जैसे उसके बाँए हाथ का काम था | यहाँ तक कि इतने बरसों जो मेरे साथ कभी न हुआ वो अब होने लगा | मुझसे सम्बंधित कोई भी बात जब उसके मुँह से निकलती तो हर बार स्वयं पर हँसने वाली बनने से खुद को कभी नहीं रोक पाई | जाने क्या था कि उसकी कोई भी बात अपने आखिरी सिरे पर जाकर हँसी का फव्वारा छुडा ही देती थी | जाने कितना अरसा गुजर गया एक साथ इतने अधिक समय तक सच्ची हँसी हँसे हुए | यहाँ तो मैं यंत्रचालित उपकरण की तरह से रिएक्शन देने वाली बनती जा रही थी | सामान्य जिंदगी में भी मेरा हँसी पर कोई काबू नहीं है मगर बेवजह इतनी सच्ची और इतनी अधिक मात्रा में? ना, कभी नहीं |

पता नहीं कब बड़े झटके की तरह मुझे पता चला कि उसकी सोचें मेरे लिए कुछ अलग ही तरह से हैं | लेकिन जितना उसे जाना था उससे यह तो तय था की उन सोचों का कोई गलत रूप सामने नहीं आना है लेकिन फिर भी हमेशा ही मैंने उसे समझाने की कोशिशे बनाये रखीं | इस सब के होने पर भी प्रवीन (उसका नाम) के बेसिक नेचर में कोई बदलाव नहीं आया | मैं कभी सोच भी नहीं सकती कि एक इंसान अपने मन के कोमल भावों को और अपनी मित्रता को पूरी तरह अलग-2 करके कैसे रख सकता है लेकिन इस बारे में उसका अपना ही फंडा था | प्रवीन की सोच थी कि अगर अपनी सोचों को ज्यादा गहराने दिया तो ना ये रहेगा और ना ही वो इसलिए मन चाहे कितना ही उकसाए लेकिन प्रत्यक्षतः संतुलित ही रहो जिससे कि जीवनभर यह साथ बना रहे |

सोचते हुए कब रात हो गयी पता ही न चला | सोचा खिडकी खोलकर देखूं आशीष आये या नहीं | लेकिन हिम्मत जवाब दे गयी | कड़ाके की सर्दी में नमीयुक्त आती हवा की सिहरन ने उँगलियाँ अकडा सी दीं | कुछ ही सेकंड्स के फेर में पल्ले बंद हो गए | फिर सोचा फोन करूँ कहाँ हैं और खाने का क्या करना है खायेंगे भी या नहीं | आशीष के आने जाने के बारे में कभी फिक्स नहीं था, जब जी चाह जैसे चाह जी लिए | वैसे भी आज दोस्तों के साथ थे तो देर तो होनी ही थी | मोबाइल पर बात करके शांति पाई और देखा सोचनगर की एक गली फिर खड़ी है अपना मुहाना लेकर | एक तरफ आशीष और दूसरी तरफ ये नयी सोच | अभी तक मेरे मन में किसी तरह की उद्वेलन नहीं थी प्रवीन की इस सोच को लेकर | मुझे यही लगा कि वह अगर अपनी सोचों को स्वयं-रेखित दायरों में बाँधे सकता है और चूँकि मुझे उस पर विश्वास भी है तो और कुछ नहीं लेकिन मेरी तरफ से दोस्ताना कुछ बुरा नहीं |

दिन बीते, मौसम बदले, साल बदला, नहीं बदला था तो वह था हमारा यह विचित्र सा बहुरंगी सा रिश्ता जिसमें मेरे जीवन के सारे रिक्त भरे से नजर आते थे और फिर भी हमारे बनाये दायरे सकुशल थे | यह नाता अब पहले से अधिक प्रगाढ़ था जिसमें किसी तारक का लालच, कोई स्वार्थ, कोई माँग, कोई भी व्यर्थ बात जो तकलीफ का व्यास बनती नजर नहीं आती थी | इसी सब के बीच प्रवीन अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं से जूझता मुस्कुराता रहा |जिस तरह का जीवन ऊपर वाले ने उसे बख्शा था उसके चलते उसके चेहरे पर की मुस्कराहट और वह उसका बिंदास स्वाभाव हमेशा मेरी समझ से परे रहा | उसे हमेशा अपने सिद्धांतों और बातों के साथ ईमानदार पाया | जो मन में वही मुँह पर, कहीं कोई दुराव या छुपाव नहीं | एक छोटा सा बच्चा कैसा हो सकता है बिलकुल वैसा ही था | छोटी-2 बातों से खुश हो जाना, हर समस्या से कुछ ही समय में उबरकर मुस्कुरा देना, दूसरा अगर दुखी हो तो उसके दुःख का हिस्सा बनते-2 उसका ध्यान परशानी से हटा देना उसके व्यक्तित्व के कुछ पहलू थे |

मेरी समस्या है कि मैं कैसे समझूँ इस नये बदलाव को जो जिंदगी के नानारंगों रंग मेरे हृदयपटल पर दस्तक देता खड़ा है? कई बार चुपके से कोशिश भी कर देखी कि इस सब से परे हट जाऊँ तो कैसा रहे लेकिन वो कहते हैं ना कि जो प्रारब्ध में लिखा हो उसे आसानी से बदलना मुमकिन ही नहीं वरना इस संसार में इतने सारे परिवर्तन होते देखे हैं जिनमें से कई तो ऐसे होते हैं जिनके बारे में पहले कभी दावे तक किये गए थे कि यह तो किसी हाल में न होना लेकिन बाद वाले कालक्रम में उन्हीं बातों को होते देखा है | शायद वे सारी नकार तब तक ही प्रभावी थीं जब तक कि वे हमारे अपने अनुरूप चल रहे जीवन का भाग थीं लेकिन जहाँ परिस्थितिओं ने अपना मुख मोड़ा वहीं चीजों पर से हमारा प्रभाव खत्म होते देर नहीं लगती और हम बेबस से नियति के जाल में जकड़े खड़े रह जाते हैं | फ़िलहाल तो मैंने अपने आप को धारा के प्रवाह पर मुक्त विचरण के लिए छोड़ दिया है देखते हैं आगे क्या लिखा हो | कहते हैं सोच और असल जीवन से जुडी कहानियाँ कभी पूरी नहीं हो पाती हैं | मेरी कहानी भी शायद कुछ इसी तरह की है | बाहर गाड़ी का हॉर्न बाज रहा है जाकर देखूँ आ गए हों तो आज के अपने दायित्वों पर इतिश्री का मार्क लगा दूँ ताकि आज की नींद नसीब हो | आखिर सुबह ऑफिस भी तो जाना है |

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh (14-02-2012)

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Comments

2 Responses to “कशमकश”

Shanti Garg said...
17 February 2012 at 10:51 PM

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Madan Saxena said...
21 November 2012 at 2:28 PM

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी .बेह्तरीन अभिव्यक्ति.शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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