अंतिम पंक्ति का आदमी



अंतिम पंक्ति का आम आदमी
बेबस.. बेचारा..
राह तक रहा अपनी बारी का
नैनों में स्वप्न संजोये
अगली पंक्ति तक उठ आने का
हो चाहे
राष्ट्र-धज सम्मान समारोह
या
कोई अयोज़न दूजा
लाल बत्ती बिन बत्ती आते लोग
खड़ा वह अंतिम पंक्ति में
कर सकता.. बस दृष्टिपात
नाम को तरसा अपने ही
बिन योगदान जिसके
न बन सका राष्ट्र कोई

राशन की पंक्ति में लगा पड़ा
चिलचिलाती धूप में पसीना बहाता
नित करता प्रतीक्षा
बीत लेता है राशन समय से पहले
अब फिर पंक्ति में खड़ा आम आदम
राशन नहीं दुकान अब बनिए की है
लेता वही सौदा बनिए की दूकान से
दिखता बहुधा पंक्ति बना
दफ्तर बाबू के सामने
चिरौरी करता चक्कर काटता
क्रमशः कम होते गहने अर्धांगिनी के
बन नोट घुस जाते सारे नीचे टेबल के
है इंतजार अब भी पंक्ति सा
बिन पंक्ति महीनों का
उम्र पकने तक फेरे
कोर्ट कचहरी के
पक्ष विपक्षी दोनों
खा उसे जाते प्रहरी क़ानून के

कब तक रहेगा खड़ा..?
अंतिम पंक्ति पंक्ति का आदमी
बनने को पहली पंक्ति का हकदार
उठे उन्हीं से कुछ पहली पंक्ति तक
भूले बैठे हैं अतीत अपना
खड़े ताका करते थे
अंतिम पंक्ति से वे भी कभी
फिर हों वे कुछ नेता या उद्योगपति
है यही नियति
पिछली पंक्ति के इंसान की

अंतिम पंक्ति का इंसान
पहली पंक्ति तक
अब भी है प्रतीक्षारत उन्नयन के लिए
कौन समझेगा पीड़ा
उसके अंतर्मन की
है डाल दिया जाता
हाँसिये पर आम आदम
रह जाता अंतिम
अंतिम पंक्ति का आदमी


_____जोगेंद्र सिंह ( 15 मई 2010_04:42pm )

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Comments

9 Responses to “अंतिम पंक्ति का आदमी”

16 May 2010 at 2:55 PM

//क्रमशः कम होते गहने अर्धांगिनी के
बन नोट घुस जाते सारे नीचे टेबल के //

अंतिम पंक्ति में खडे इंसान की पीड़ा को बहुत मार्मिकता से उकेरा है आपने जोगेन्द्र भाई, इस शसक्त अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार हो !

Julie said...
16 May 2010 at 6:29 PM

Samaj ko aaina dikhaya hai aapki iss rachna ne Jogi jeee... really good job!!! keep writing!!!! best wishes!!!!!
Regards
Julie

17 May 2010 at 1:49 AM

◊▬►► Yograj ji..
nd.....
◊▬►► Julie..
thank you both of you my friends..
i make some changes in dis poem.. so if u can plz watch it again..

Jogi..

Amit Gupta said...
17 May 2010 at 10:51 PM

very nice big brother............!!

18 May 2010 at 6:48 PM

◊▬►► Chhote.. thank you very much.. kam se kam tumne kuchh likha to sahi..

sidharth said...
28 May 2010 at 2:46 PM

BAHUR KHUB...................@

21 May 2011 at 6:19 PM

अंतिम पंक्ति का आदमी थक हार कर आज भी वहीं खड़ा है ... बहुत खूब जोगी भाई

1 July 2011 at 9:02 PM

धन्यवाद ▬● प्रति भईया....... :)

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