श्यामल मुख


: श्यामल मुख :

होने लगा दृष्टिगत आनन् तुम्हारा..
तिरछा, अल्प सा सामने की ओर..
कुछ घूरता सा..
नज़र आ रहा इक चक्षु तुम्हारा..
दूजा छुपा केश-लता के पीछे..
स्वेत-धवल विशाल चक्षु..
हो रहा शुशोभित श्यामल मुख पर..
है विराजमान धवल पृष्ठ के मध्य ..
नेत्र सितारा तुम्हारा..

ऐसा प्रतीत होता मानो..
किया दृष्टिपात तुमने मुझ ही पर है..
एकटक-निष्कटक सीधा दृष्टिपात..
देख तुम्हें..
सन्न सा संज्ञा शून्य हो गया हूँ मैं..
मूर्ती सा खड़ा मैं अविचल..

ओंठ चुप-चुप से हैं मगर..
लग रहा कुछ कहने को हैं आतुर..
हो रहा प्रतीत ऐसा मुझे..
है दबा रखा ओंठों मध्य कुछ..
आओ.. समझा दो तुम मुझे..
निशब्द की शब्द भाषा..

समायी अनजानी पहचानी सी..
नेत्रों में इक अभिव्यक्ति..
है कामना समझना तुम्हें..
एक ही मुख में क्यूँ हैं इतने भाव..?
आँखें कह रही आक्रोश को..
तथासमय देती उच्छ्रंखल चंचल हँसी का भाव भी..
अनूठा जान पड़ता सम्मिश्रण द्वि-भावों का..

मुख-वसन-केश तीनों श्याम..
श्याम-श्याम का मेल..
मनभावन मनमोहना रूप तुम्हारा..
अवांछित सी वांछना..
खींच लायी मोहे तुमरी ओर..
काहे आता मैं तुम ओर..?
नहीं आना था तिहारे देश..
फिर ऐसा क्या हुआ..?
क्यूँ आया मैं तुम्हारी ओर..?

कर देखे मैंने लाख जतन..
खा देखी ढेरों कसमे भी..
सिफ़र नतीजा पाया तब भी..
उफ़ क्यों देखा मैंने तुम्हें..?
क्यों जोड़ा खुदसे तुम्हें..?
अब ना कहूँ तब भी तुम बिन..
यह जीवन व्यतीत करूँ कैसे अपना..?
एक मन कहता न आओ पास चली जाओ..
नहीं विजित हो पाता मन मेरा..

होकर विलग तुमसे..
लगता मरण ज़ीने से बेहतर..
आ जाओ, अब आ भी जाओ..
हो चुका हूँ पराजित सोच से भी..
कब तक दौड़ूंगा मैं खुद ही से..
अंतर नहीं आता 30 दिवस अथवा 30 बरस से...
राह में तेरी अपना..
कर दिया अर्पित जीवन सारा..
आ जाओ, प्रतीक्षारत हूँ सदैव तुम्हारे लिए..
तुम्हारा..जोगेंद्र सिंह..

Jogendra Singh ( 20 जुलाई 2010_07:07 pm )

Note :- कल एक चित्र देखा जिसका अन्य रूप बहुत पहले ही देख चुका था, यह कविता उसी देखने का परिणाम है.. विचारों में कहीं एक सच्चाई भी दबी पड़ी है.. मन के भाव शायद ऐसे ही होते हैं..
इस रचना के बन जाने के पीछे उस चित्र के आलावा किसी और वज़ह की भागीदारी नहीं है.. वह है ही ऐसा कि उस पर मन कि गहराइयों से पुकार निकले बगैर रह ही नहीं सकती.. Zankari ke liye bata dun ki ye vah chitr nahin hai jise dekh maine apni kavita likhi hai.. That is a real life face..
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Comments

4 Responses to “श्यामल मुख”

20 July 2010 at 7:58 PM

बहुत उम्दा जोगी जी..श्यामलमुख से ये वाणी जंहा सब अर्पित है उसके लिये...

20 July 2010 at 8:12 PM

@ प्रति भैय्या.. विचारों में कहीं सच्चाई भी दबी पड़ी है.. भाव ऐसे ही होते हैं.. कल एक चित्र देखा जिसका अन्य रूप बहुत पहले ही देख चुका था, यह कविता उसी देखने का परिणाम है..

Sudha said...
21 July 2010 at 7:11 PM

Uski pic bhi yahan par lagao..us ek aankh wale prani ki..hahaha.. Like I said, on facebook, its very well written and has a feel-good essence :-) I would love to see who she is.. Must be very beautiful, hai na??!

27 July 2010 at 1:22 AM

@ Sudha.. kiski pic lagaun dost..? vo prani gol hua samjho.. har vastu samne aane ke liye nahin hoti bhai... :)

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