
भोर के धुंधलके संग निकल रहा सूरज..
अहसास करा जाता मेरा उसको..
ख्वाब सजा देता रिक्त-सिक्त से नयनों में..
संज्ञान है उसे मेरे होने का फिर भी..
बैठी है बन अज्ञानी अंधी-बहरी नायिका..
श्रृंगार की मनोकामना से वांछना संग टकटकी लगा..
वह ताकना नायक को नायिका का..
जाने क्या सूझा आज उसे..कहती वह नायक से..
आओ तनिक श्रृंगार कर दो तुम मेरा..
माँग बैठी चाँद, तारे, सूरज सब कुछ..
बेसुरे से कहती..
प्रेम भरे गीतों को भर दो मेरे घुंघरू के भीतर..
कहने लगती रंग दो आँचल मेरा तुम..
प्रेम सुधा बरसाकर करो उसे तुम रतनार..
क्या करूँ..?
सहज उपलब्ध संसाधनों से विरक्ति दिखा..
असहज प्रतीकों से स्वयं को अलंकृत करने की चाह..
सच एक विलग सी काल्पनिक सृष्टि दर्शा जाती है..
कैसे करूँ..? नायक सोच रहा, चाँद-तारे लाने जो हैं..
प्रेम समझ आता है..चाँद, तारे, सूरज जा मैं लाऊँ कहाँ से..?
सुन इतर अपने सपनों से बात मेरी..
हो आक्रोशित..कह उठती वह..
ना लाते तो क्यूँ आते तुम पास मेरे..?
ना कर सकते तो प्रेम का दम क्यूँ भरते हो..?
कर बैठा वादा बेबस बेचारा नायक बेतुकी सी माँगों का..
नायिका जाने किस जनम का निकाल रही है बदला..
माँगा जैसे तुमने शब्दों सह,
क्यूँ न होती संतुष्ट वैसे ही शब्दों का चोला ओढ़..?
हा हन्त..!! क्या होगा कल ? जब ना होगी पूरी माँग उसकी..
ले चला व्यथित मन अपना, हो अगले ताने को प्रतीक्षित..
संज्ञान में भरा है सब उसके, संज्ञा-शून्य बस इक मैं ही हूँ..
क्यूँ न कर लेती वह
काल्पनिक माँग और काल्पनिक उसकी पूर्ती..
वाह रे आधुनिका पर माँग से पुरातनपंथी हिन्दुस्तानी नायिका..
जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 11 जुलाई 2010_11:52 pm )
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