विचित्र प्रेम

कैसी लीला है प्रेम की देखो नयी
आया कैसा अब ज़माना भी नया
करते दखल देखो नभचर भी हैं
दावेदार प्रेम के अब पंछी भी हैं

_____जोगेंद्र सिंह
( 22 अप्रैल 2010__12:52 pm )



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Comments

3 Responses to “विचित्र प्रेम”

22 April 2010 at 5:21 PM

I find the bird jealous here... This pic. suggests so. But the couplet is sweet...

prakriti said...
29 April 2010 at 8:06 AM

अंधकार में से आत संगीत से
थरथर एक रात मैंने देखा
एक हाथ मुझे बुलाता हुआ
एक पैर मेरी ओर आता हुआ
एक चेहरा मुझे सहता हुआ
एक शरीर मुझमें बहता हुआ

Brajesh said...
27 August 2010 at 7:33 PM

achha laga .shubhkamnae!

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