तुम पूछों और मै न बताऊँ


तुम पूछों और मै न बताऊँ, जीवन में अभी ऐसे हालात नहीं !

हुआ ही क्या है ज़रा दिल ही तो टूटा है कोई पहाड़ तो नहीं !

अब दिल ना दुखाओ तुम अपना यह मेरी अक्सर की बात है !

कभी अगर स्वप्न संजो भी लूँ तुम्हें पाने का..मेरा हक है यह !

किसी मानुष का अपने ख्वाबों पर भी भला बस चला है कहीं ?

सकून नज़रों का बन..मचलती हो स्वप्न-लोक की दुनिया में !

पलक झपकते आना-जाना तुम्हारा नींद-ओ-हवासों का फर्क है !

इसी से लगती नींद प्यारी.. दिखते बाकी सब हवास गलीज़ हैं !

__________जोगेंद्र सिंह ( 24 अप्रैल 2010__03::25 )


( यह कविता मेरे निजी जीवन के अपने खुद के अनुभव पर है...)
( प्रेरणा स्वरुप पहली पंक्ति की आधी लाइन कहीं से ली गयी है...)

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Comments

4 Responses to “तुम पूछों और मै न बताऊँ”

Rakss Web said...
24 April 2010 at 5:43 PM

Very Nice Sir Ji.............:)

24 April 2010 at 6:10 PM

The poem is a sad note of one's life. But one cannot live the whole life lingering between dreams. Dreams are short lived. You are a poet of Hopes. Then why this dejection is reflected here?

5 May 2010 at 1:06 PM

thanx ◊▬►► Rakss...
thanx ◊▬►► Aparna ji... reason for dejection is dat dis is a different flavour of life...

28 November 2010 at 8:25 PM

जोगी जी आपकी यह कविता दिल को छु गयी ...खाश तौर पर ये पंग्तियाँ ...
अब दिल न दुखाओ तुम अपना यह मेरी अक्सर की ही बात है ....
किसी मानुष का अपने ख्वाबों पर भी भला बस चला है कभी...
बहुत शुभकामनायें ..

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