भूखे का दर्द.. !!


भूख का दर्द..मुझसे न पूछो..क्या होता है !
जाओ चौराहे पर..बने तमाशा मिल जायेंगे !
कुछ लोग बोलियाँ लगाते मिल जायेंगे !
और कुछ खड़े लगवाते होंगे बोलियाँ भूख पर !
वे कहेंगे कम पड़ता है बाबू जी !
कौन सुने भूखे की..एक छोड़ हज़ार खड़े हैं !
दूजा मान रहा उसी दर पर !
शायद उसकी भूख को ज्यादा जल्दी है !
बच्चे उसके जिनका बचपन भूख ही है शायद !
भूख से आगे न जाती सोच-समझ उनकी !
बच्चा गरीब का है.. दूध कहाँ रोटी के भी हैं लाले !
हैं सनाथ फिर भी दिखते क्यूँ अनाथ हैं !
किसी शाम रोज़ देसी शराब के ठीये पर !
मिल जाएगा वही भूखा बाप कहीं !
तब देखो झाँक कर झूमती उन दो आँखों में !
कहाँ ग़ुम हैं अहसास उसकी भूख के दर्द का ?
एक साडी में जीवन काटती बीवी उसकी !
पडौस में मिल रही पानी वाली चाय पर पलते बच्चे !
रईसों के बच्चों के हाथ लगी चीज़ों को घूरते बच्चे !
फिर कूड़ेदान से बीन कर भूख मिटते बच्चे !
दूसरी तरफ उधार ना चुकाने पर पिटता बाप !
झूमता गिरता पड़ता घर लौट के आता बाप !
फिर होने वाला दंगा फसाद हक है उसी भूखे का !
दीन हीन श़क्ल देखी जो तुमने चौराहे पर !
छिपा दर्द भी उनका जाकर कब देखोगे तुम !
नहीं यहाँ सिर्फ एक शकल.. है पूरा कारवाँ यहाँ !
श़क्ल के पीछे श़क्ल छुपी.. पूरा कुनबा भूखा यहाँ !
दिन का दीन बन जाता शेर शाम को !
पड़ी यहाँ संवारने को हैं कहानियाँ कितनी ?
सोचो.. अपना हिस्सा तय कर पाओगे कैसे ?
शायद तब तुम्हे एहसास हो जाये..उस भूखे के दर्द का !!!

__________जोगेंद्र सिंह ( 16 अप्रैल 2010 ___ 08:28 pm )

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(( मेरी मित्र गरिमा ने फेसबुक पर कमेन्ट में कहा था की "Bht bht khub jogi.bht badhiya likha hai apne.bt dnt mind,cnt stop myslf telng u dat m flng dat pic is nt goin acc 2da poem.as far as m getn it,dse r nt dose poor people.dse r da pahaadi log.es kavita mein jin deen heen bhookh se pidit logo ki durdasha ka varnan hai woh ye nahi hai.es poem ke sath apki woh wali pic jo apki h click ki hui hai jisme woh ek nangaa baccha khaane dhoondh raha hai jaayegi.hai naa jogi?apko bura toh nahi laga?"
इस पर मैंने ज़वाब दिया :- @ गिरी.. वो मेरी क्लिक की हुई पिक नहीं थी दोस्त... और पहाड़ी हैं तो क्या ये भूखे नहीं हो सकते...? अभी तुमने भूखे देखे ही कहाँ हैं ! जो नंगों से ज़रा ही ऊपर होते हैं वो शायद अधिक बुरी स्थिति मैं होते हैं... ना तो भीख माँग सकते हैं और ना ही कूड़ा बीन सकते हैं... इज्ज़त के कारण मजबूरी में बस बेबस से पिस जाते हैं बेचारे... किस्से कहें कि आज घर में आता नहीं है रोटी किस्से बनाएं...? सोचना कभी बैठ कर...))
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Comments

One response to “भूखे का दर्द.. !!”

22 April 2010 at 5:49 PM

Jogi
I went through the poem and the note you have written below. You are right, the pain of a beggar and that of a hungry man is different. The beggar has no self respect so he just devours the food, fills his empty belly and leads his life. But a hungry man with self respect burns the midnight oil and gets nothing... just see the pain of this poor fellow... I love the very emotion....

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