तुम..


तुम ही तुम बसे हो सर्वस्व में !

तुम भी तुम हो और मैं भी तुम !

तुम्ही से जीवन.. मरण तुम्हीं से !

साँसों में बसा वो नाम तुम्हीं हो !

सुबह का पहला ख्वाब तुम्हीं हो !

साँझ की पहली याद तुम्हीं हो !

पहले हो रब से मेरा रब तुम्हीं हो !

जाओ दिल से तो याद करूँ तुम्हें !

न जाती दिल से वो याद तुम्हीं हो !

_____जोगेंद्र सिंह ( 17 अप्रैल 2010___10:31 pm )

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Comments

4 Responses to “तुम..”

22 April 2010 at 5:41 PM

Jogi
The poem is fabricated with the soft thread of love. Love is everlasting and your poem sings the song of this pure love.

wwwkantonline said...
25 April 2010 at 9:34 PM

nice poem ....

सुन्दर अभिव्यक्ति योगेन्द्र जी........
"उजाले अपनी यादों के हमारे संग रहने दो नाजाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए..."

prakriti said...
29 April 2010 at 7:50 AM

प्रेम-पथ की यात्रा अविराम है
सार्थक लेकिन सदा निष्काम है
प्यार का अभिप्राय चंचलता नहीं,
प्यार अविचल साधना का नाम है।

5 May 2010 at 7:38 PM

@...Aparna ji...@
@...Prakriti dee...@
@...Kant...@
thanx to all for appreciation...

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